सेशेल्स की यात्रा कर पीएम मोदी ने चीन के सामने खींची लंबी लकीर, समझिए भारत के लिए कितना अहम है ये देश

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भारत लंबे समय से हिंद महासागर में अपनी समुद्री उपस्थिति मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। ऐसे में सेशेल्स जैसे देशों के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को नई दिल्ली अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम हिस्सा मानती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया सेशेल्स यात्रा ने भारतीय विदेश नीति को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। पहली नजर में करीब 1.2 लाख की आबादी और 150 से अधिक द्वीपों वाले इस छोटे से देश की यात्रा सामान्य लग सकती है, लेकिन हिंद महासागर की रणनीतिक राजनीति को समझने वाले विशेषज्ञ इसे भारत की समुद्री नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मान रहे हैं। इसी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी को सेशेल्स का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन” भी प्रदान किया गया।

हालांकि, इस यात्रा को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हुई। विपक्ष के कुछ नेताओं और सोशल मीडिया के एक वर्ग ने इस सम्मान और यात्रा के महत्व पर सवाल उठाए। वहीं, सरकार और विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि यह यात्रा केवल एक द्विपक्षीय दौरा नहीं, बल्कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।

दरअसल सेशेल्स की आजादी के 50 वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि के रूप में अपनी तीन दिवसीय यात्रा पर वहां पहुंचे। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई समझौतों पर चर्चा हुई और भारत ने 175 मिलियन डॉलर के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। इसमें 125 मिलियन डॉलर की क्रेडिट लाइन और 50 मिलियन डॉलर की विकास सहायता शामिल है।

इसके अलावा समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, डिजिटल कनेक्टिविटी, ब्लू इकोनॉमी, जलवायु परिवर्तन और रक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। भारत पहले से ही सेशेल्स को तटरक्षक पोत, हेलीकॉप्टर, प्रशिक्षण और समुद्री निगरानी में सहयोग देता रहा है।

छोटा देश, लेकिन रणनीतिक महत्व बेहद बड़ा

सेशेल्स का कुल क्षेत्रफल भले ही लगभग 455 वर्ग किलोमीटर हो, लेकिन उसका एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक ज़ोन (EEZ) करीब 13.7 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह क्षेत्र हिंद महासागर के उन समुद्री मार्गों के करीब है, जहां से एशिया, अफ्रीका, यूरोप और पश्चिम एशिया के बीच होने वाला बड़ा समुद्री व्यापार गुजरता है। यही कारण है कि भारत, चीन और अन्य वैश्विक शक्तियां इस क्षेत्र को रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं।

भारत लंबे समय से हिंद महासागर में अपनी समुद्री उपस्थिति मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है। ऐसे में सेशेल्स जैसे देशों के साथ रक्षा, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक सहयोग को नई दिल्ली अपनी इंडो-पैसिफिक रणनीति का अहम हिस्सा मानती है।

विश्लेषकों का मानना है कि सेशेल्स में भारत की बढ़ती सक्रियता को चीन की हिंद महासागर रणनीति के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र के कई देशों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। वहीं भारत स्थानीय संस्थाओं के साथ साझेदारी, क्षमता निर्माण और दीर्घकालिक सहयोग के मॉडल पर जोर देता रहा है।

समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य की भू-राजनीति में केवल सैन्य ताकत ही नहीं, बल्कि समुद्री मार्गों, लॉजिस्टिक्स, सूचना तंत्र और साझेदार देशों का नेटवर्क भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। इसी वजह से सेशेल्स भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं में लगातार ऊपर आया है।

सम्मान को लेकर विवाद क्यों हुआ?

प्रधानमंत्री मोदी को दिए गए “गार्जियन ऑफ द ब्लू होराइजन” सम्मान को लेकर भी विवाद हुआ। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने दावा किया कि यह नया सम्मान है और इसका महत्व कम है। वहीं सेशेल्स सरकार के अनुसार यह उसके राष्ट्रीय सम्मान ढांचे के तहत सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल है। इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अलग-अलग दावों के साथ जारी रही।

बता दें कि सेशेल्स देश आकार में भले ही छोटा हो, लेकिन हिंद महासागर की रणनीतिक राजनीति में उसका महत्व अत्यंत बड़ा है। भारत की समुद्री नीति, इंडो-पैसिफिक रणनीति और चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच यह साझेदारी आने वाले वर्षों में और अधिक अहम हो सकती है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा केवल एक औपचारिक राजनयिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक समुद्री और रणनीतिक नीति का महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।

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