इंडोनेशिया के साथ मिलकर भारत अब दुनिया के सबसे बिजी समुद्री व्यापार मार्ग पर अपनी पकड़ मजबूत करने की तैयारी में है। लेकिन कैसे? आइए समझते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समय इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के दौरे पर हैं। इस दौरे की शुरुआत इंडोनेशिया से हुई, जहां दोनों देशों के बीच रक्षा, व्यापार, डिजिटल सहयोग और सबसे अहम सबांग पोर्ट को लेकर चर्चा हुई। इसके साथ ही ब्लू इकॉनमी और पोर्ट डेवलपमेंट में सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दिया गया।
भारत के लिए इंडोनेशिया सिर्फ एक पड़ोसी समुद्री देश नहीं है। इंडोनेशिया ASEAN का फाउंडिंग मेंबर है और ASEAN देशों में भारत का दूसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर भी है। यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की आर्थिक, समुद्री और सप्लाई चेन रणनीति में इंडोनेशिया की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि दोनों देशों के रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
सबांग पोर्ट की चर्चा पहली बार 2018 में तेज हुई थी, जब प्रधानमंत्री मोदी के इंडोनेशिया दौरे के दौरान भारत के अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह और इंडोनेशिया के आचे प्रांत के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाने पर सहमति बनी थी।
इसे सिर्फ सैन्य नजरिए से नहीं देखा जा रहा है। इसका महत्व व्यापार, टूरिज्म, क्रूज़ सर्विस, डाइविंग, वेलनेस टूरिज्म और दोनों देशों के लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने में भी है। इसी दिशा में दोनों देशों ने एक ज्वाइंट टास्क फोर्स बनाई है। इतना ही नहीं, भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया अब Trilateral Maritime Exercise के जरिए भी अपने समुद्री सहयोग को लगातार मजबूत कर रहे हैं।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक और प्रोजेक्ट ने इस पूरी रणनीति को नई दिशा दी है। यह है भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट। यहां एक इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट, गैस और सोलर पावर प्लांट के साथ एक नया आधुनिक शहर विकसित किया जा रहा है।
इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्ट्रेटेजिक लोकेशन है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों के बेहद करीब स्थित है। इसके तैयार होने के बाद भारत को कंटेनर ट्रांसशिपमेंट के लिए कोलंबो, सिंगापुर या मलेशिया के पोर्ट क्लांग जैसे विदेशी बंदरगाहों पर पहले जितनी निर्भरता नहीं रखनी पड़ेगी।
यही वजह है कि अब सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार को राइवल नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सहयोगी के रूप में देखा जा रहा है। जहां ग्रेट निकोबार बड़े कंटेनर जहाजों के लिए ट्रांसशिपमेंट हब बन सकता है, वहीं सबांग पोर्ट जहाजों में ईंधन भरने, लॉजिस्टिक्स, समुद्री सेवाओं और टूरिज्म के जरिए उसे सपोर्ट दे सकता है।
दोनों परियोजनाएं मलक्का स्ट्रेट के बेहद करीब हैं, जहां से चीन के समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ये दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक है, जहां से हर साल लगभग एक लाख से अधिक जहाज गुजरते हैं और वैश्विक समुद्री व्यापार का करीब एक-चौथाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर जाता है। चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भी इसी रास्ते पर निर्भर है।
ऐसे में अगर भारत और इंडोनेशिया इस साझेदारी को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाते हैं, तो दोनों देश हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी आर्थिक और रणनीतिक स्थिति को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।
यही वजह है कि सबांग पोर्ट और ग्रेट निकोबार को सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि भारत की भविष्य की समुद्री रणनीति के दो अहम पिलर के रूप में देखा जा रहा है।





