ताहिर हुसैन दोषी

अंकित शर्मा हत्याकांड: ताहिर हुसैन दोषी, समझिए कैसे रची गई थी दिल्ली के 2020 एंटी हिंदू दंगों की पूरी साज़िश?

Summary
दिल्ली दंगों में मारे गए आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में ताहिर हुसैन समेत कई आरोपियों को दोषी ठहराया गया है। लेकिन क्या यह सिर्फ़ एक हत्या थी या महीनों पहले रची गई बड़ी साज़िश का हिस्सा?

13 जुलाई 2026 को एक खबर आई, जिसने अचानक से वक्त को छह साल पहले ले जाकर खड़ा कर दिया। खबर ये थी कि आम आदमी पार्टी का नेता और पूर्व काउंसलर ताहिर हुसैन एक क़ातिल है और उसने आज से छह साल पहले दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों में इंटेलिजेंस ब्यूरो के कर्मचारी अंकित शर्मा का क़त्ल कम से कम एक दर्जन लोगों के साथ मिलकर किया था। 11 आरोपियों के खिलाफ चल रहे इस मामले की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रवीण सिंह ने ताहिर हुसैन समेत नाज़िम, कासिम, जावेद और अनस को दोषी करार दिया। अदालत ने ताहिर हुसैन को हत्या, दंगा करने से जुड़े आरोपों में दोषी माना। और इस खबर के साथ ही यकायक दिल्ली की 2020 की सर्दियों की तपिश याद आ गई।

तो आइए, आज हम बताते हैं आपको कि कैसे देश के एक कानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करने का बहाना बनाकर दिल्ली और पूरे देश को जलाने की योजना बनाई गई? कैसे दिल्ली पुलिस के जवानों को मुसलमानों ने पीट-पीटकर मार डाला था और कैसे इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कर्मचारी अंकित शर्मा को उनके हिंदू होने की वजह से मुसलमानों की भीड़ ने मारा और फिर उनकी लाश को बगल के नाले में फेंक दिया। चौबीस घंटे तक परिवार वाले इस उम्मीद में थे कि उनका बेटा लौटकर वापस आएगा, लेकिन वापस तो उसकी लाश आई, जिसे देखकर पिता ने कहा कि इसके बदन पर तेजाब डालकर इसकी पहचान तक मिटाने की साज़िश की गई है।

तो ख़ौफ़नाक दौर की शुरुआत 11 दिसंबर 2019 को नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने से होती है। इसके बाद देश के कई हिस्सों में मुसलमानों की ओर से CAA वापस लेने की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली दंगों को लेकर कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई दिल्ली पुलिस की फाइनल रिपोर्ट के मुताबिक, फरवरी 2020 में हुई दिल्ली की हिंसा कोई अचानक भड़की घटना नहीं थी, बल्कि करीब ढाई महीने तक लगातार योजनाबद्ध ढंग से इस पर काम किया गया था। बाकायदा व्हाट्सऐप ग्रुप्स, सोशल मीडिया पर नैरेटिव और ग्राउंड लेवल पर भीड़ के मोबिलाइज़ेशन की योजना बनाकर इसे अंजाम दिया गया था।

इसलिए अगर हमें समझना है कि 25 फ़रवरी को इंटेलिजेंस ब्यूरो के अंकित शर्मा की हत्या मुसलमानों ने कैसे की, तो आपको समझना होगा कि 13 दिसंबर को क्या और कैसे हुआ था। और जो 13 दिसंबर को हुआ, उसी ने 25 फ़रवरी और दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों की नींव रखी।

13 दिसंबर 2019 को करीब 2,000 मुसलमानों की भीड़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया इलाके में इकट्ठा हुई और वहाँ से निकलकर ये भीड़ बिना इजाज़त के संसद की ओर मार्च करने निकली। चूँकि इजाज़त नहीं थी, और संसद कोई मॉल तो है नहीं कि हम दो, हमारे बारह लेकर कोई भी उसकी तरफ़ चला जाए। आख़िरी बार जब कोई बिना इजाज़त के संसद में घुसा था, वह जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी था। इसलिए दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड लगाकर उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन ये भीड़ किसी और मकसद से निकली थी। इनके पास हिंसा फैलाने का पूरा प्लान था। इन्होंने हिंसा शुरू की, जिसमें 25 आम नागरिक और 20 पुलिसकर्मी घायल हुए और साथ ही सार्वजनिक संपत्ति को भी नुकसान पहुँचा।

इसके दो दिन बाद, 15 दिसंबर को न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी (NFC) इलाके में हिंसा का एक बड़ा दौर देखने को मिला। कई बसों में आग लगा दी गई, बैरिकेड तोड़ दिए गए और इलाके में भारी तोड़फोड़ हुई। दिल्ली पुलिस की फाइनल रिपोर्ट के मुताबिक, JNU के छात्र शरजील इमाम ने 14 दिसंबर को एक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने CAA और NRC वापस लिए जाने तक उत्तर भारत के शहरों में “चक्का जाम” करने की अपील की थी। अगले दिन दिल्ली-मथुरा रोड को उसी प्लान के मुताबिक मुसलमानों की भीड़ ने जाम करने की कोशिश की।

16 दिसंबर को ये दंगाई मुसलमान जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी कैंपस के भीतर चले गए। रिपोर्ट के मुताबिक, वहाँ से पुलिस पर पत्थर और ट्यूब लाइटें फेंकी गईं। बाहर मौजूद उनकी समर्थक, मज़हबी सनक से लैस भीड़ ने भी हिंसा में उनका साथ दिया। इस बवाल में 97 आम नागरिक और 35 पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि पुलिस ने 52 लोगों को हिरासत में लिया। सोचकर देखिए, अभी तक दो दिनों की घटनाओं में पुलिस वाले एकतरफा घायल हो रहे हैं।

इसके बाद इस कथित आंदोलन, जो असल में पूरे देश में हिंसा फैलाने के उद्देश्य से चलाया गया था, उसे कथित तौर पर संगठित तरीके से चलाने के लिए जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी बनाई गई। रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौरान हर्ष मंदर और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ने भी प्रदर्शन स्थल पर भाषण दिए, जो सीधे तौर पर भड़काऊ थे। पुलिस ने भी अपनी जांच में उन बातों को भड़काऊ पाया।

इसी दौरान शाहीन बाग में धरना शुरू हुआ, जहाँ की मेन रोड को मुसलमान महिलाओं और बच्चों का इस्तेमाल करके अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया। इसके बाद इस आंदोलन की आड़ में हिंसा फैलाने की योजना का विस्तार हुआ। 15 जनवरी 2020 से उत्तर-पूर्वी दिल्ली के सात अलग-अलग इलाकों—सीलमपुर, बृजपुरी, चाँद बाग, करदमपुरी, खजूरी खास, भजनपुरा और शास्त्री पार्क—में भी इसी तरह मुसलमानों की भीड़ इकट्ठा की जाने लगी। शाम के समय इन जगहों पर ठीक-ठाक संख्या में मुसलमान इकट्ठा होने लगे और शाहीन बाग में तो हजारों मुसलमान महिलाओं और उनके पूरे परिवार ने पूरा कब्ज़ा कर ही लिया था। बैकग्राउंड में हिंसा की योजना पर काम चल रहा था। दो दिनों में हिंसा करके टेस्ट भी कर लिया गया था कि भीड़ कितनी तैयार है और कितना तैयार किया जाना बाक़ी है।

दिल्ली पुलिस के मुताबिक, सबसे पहले हिंसा की योजना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 24–25 फरवरी 2020 की भारत यात्रा के दौरान लागू करने के लिए बनाई गई थी। दस्तावेज़ के अनुसार, उस समय सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन का बड़ा हिस्सा ट्रंप के अहमदाबाद दौरे में व्यस्त रहने वाला था और इसी वजह से उस समय को हिंसा के लिए चुना गया।

और इंटरेस्टिंग बात एक और देखिए। ये सब कुछ कर मुसलमान रहे थे। NRC के बारे में अफ़वाह से लेकर झूठ मुसलमान फैला रहे थे। दंगा फैलाने का प्लान मुसलमानों का था, लेकिन इस्तेमाल एक यूज़फुल इडियट का किया जा रहा था—चंद्रशेखर आज़ाद।

और किया ये गया कि 22 फरवरी को चंद्रशेखर आज़ाद से भारत बंद का आह्वान करवाया गया और उसके आधार पर करीब 1,000 मुसलमान, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे, जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के पास सड़क पर बैठ गए और रास्ता जाम कर दिया।

अगले दिन, 23 फरवरी को मौजपुर चौक पर सड़क खुलवाने की मांग को लेकर दूसरी तरफ़ से दिल्ली के आम नागरिकों की भीड़ जुटी। जो लोग दिल्ली को जानते हैं, उनको पता है कि उस रोड के बंद होने की वजह से दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कनेक्टिविटी न सिर्फ़ बाधित होगी, बल्कि रूट डायवर्जन की वजह से पूरा दिल्ली-यूपी का ट्रैफ़िक फँसकर रह जाएगा। ये रोड दिल्ली, शामली और सहारनपुर की भी एक कनेक्टिंग रोड थी। लोग इस रोड को खोले जाने की माँग कर रहे थे, जिनमें अधिकतर हिंदू थे।

मुसलमानों ने पथराव शुरू किया, जिसका जवाब हिंदुओं की तरफ़ से दिया गया। और मुसलमानों ने पूरी योजना ही इसी लिए बनाई थी। देखते ही देखते वेलकम, दयालपुर, उस्मानपुर, भजनपुरा, गोकलपुरी और खजूरी खास तक ये बवाल फैल गया। हालात काबू में लाने के लिए पुलिस ने दोनों तरफ़ की भीड़ पर आँसू गैस के गोले छोड़े और लाठीचार्ज किया।

24 फरवरी की तारीख़ लगने तक मौजपुर चौक के आसपास 5,000 से 10,000 लोगों की भीड़ आमने-सामने थी। यहाँ तक बताया जाता है कि बीच-बीच में गोलीबारी भी हुई। इसी दिन चाँद बाग इलाके में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या भी मुसलमानों की भीड़ द्वारा मॉब लिंचिंग करके की गई और साथ ही दिल्ली पुलिस के डीसीपी अमित शर्मा और एसीपी अनुज कुमार गंभीर रूप से घायल हो गए। वज़ीराबाद रोड पर एक पेट्रोल पंप में आग लगा दी गई और बड़ी संख्या में वाहनों को भी जला दिया गया।

24 और 25 फरवरी की रात हिंसा तेजी से कई इलाकों में फैल गई। गोकलपुरी का टायर मार्केट आग के हवाले कर दिया गया। करावल नगर और मुस्तफाबाद में गोलीबारी की घटनाएँ सामने आईं, जबकि कई इलाकों में दुकानों और शोरूमों में आग लगा दी गई।

25 फरवरी को भी हिंसा जारी रही, लेकिन इस बार मुख्य सड़कों की बजाय शिव विहार, चाँद बाग और गोकलपुरी की अंदरूनी गलियों में झड़पें और आगज़नी की घटनाएँ ज़्यादा देखने को मिलीं। यानी पूरी दिल्ली को दंगों की आगोश में धकेल दिया गया था।

और इसी तारीख़ को इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करने वाले अंकित शर्मा अपने दफ़्तर से वापस अपने घर आ रहे थे। चार्जशीट के मुताबिक, 25 फरवरी 2020 की शाम करीब 5 बजे चाँद बाग पुलिया और उसके आसपास का इलाका हिंसा की चपेट में था। और आम आदमी पार्टी के नेता ताहिर हुसैन के घर की छत से लगातार पत्थर और पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे।

इसी दौरान इंटेलिजेंस ब्यूरो में तैनात अधिकारी अंकित शर्मा, जो खजूरी खास के ई-ब्लॉक में रहते थे और जिनका घर ताहिर हुसैन के घर से कुछ ही दूरी पर था, अपने दफ़्तर से लौट रहे थे। चार्जशीट के अनुसार, वे करीब 4:45 बजे दफ़्तर से लौटकर मेन करावल नगर रोड पहुँचे। उस समय चाँद बाग पुलिया के पास हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पूरी दिल्ली को जलाने की योजना अब क्रियान्वित हो रही थी और पूरे इलाके में तनाव का माहौल था।

उसी समय ताहिर हुसैन मुंगा नगर स्थित जामा मस्जिद के पास, यानी चाँद बाग पुलिया के नज़दीक मौजूद था। चार्जशीट के मुताबिक, ताहिर हुसैन भीड़ का नेतृत्व कर रहा था, लोगों को उकसा रहा था और मुसलमानों को हिंदुओं पर हमला करने का कॉन्फ़िडेंस दे रहा था। चार्जशीट के मुताबिक, अंकित शर्मा वहाँ मौजूद हिंदू पक्ष की भीड़ से आगे बढ़े और उनका मकसद दोनों पक्षों को शांत कराना और हालात सामान्य करने की कोशिश करना था।

लेकिन यहीं से सब कुछ अचानक बदल जाता है। चाँद बाग पुलिया की तरफ़ से करीब 20 से 25 दंगाई मुसलमान, जिनके हाथों में पत्थर, लोहे की रॉड, लाठी, डंडे और चाकू जैसे हथियार थे, अंकित शर्मा की ओर बढ़े। चार्जशीट के अनुसार, ताहिर हुसैन के उकसाने पर इन लोगों ने ताहिर हुसैन के घर के सामने ही अंकित शर्मा को पकड़ लिया।

इसके बाद उन्हें घसीटते हुए चाँद बाग पुलिया की तरफ़ ले जाया गया। चार्जशीट के अनुसार, उन्हें मेन करावल नगर रोड पर ई-17, नाला रोड स्थित बनी बेकर्स के सामने, चाँद बाग पुलिया के पास ले जाया गया।

यहीं पर अंकित शर्मा पर धारदार और भारी हथियारों से हमला किया गया। इसके बाद मुसलमानों ने अंकित शर्मा की बेरहमी से पिटाई की, उन पर कई वार किए और उनकी हत्या कर दी।

हत्या के बाद, चार्जशीट के मुताबिक, मुसलमानों की भीड़ ने उनका शव चाँद बाग पुलिया के पास मौजूद नाले में फेंक दिया। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस पूरी घटना का एक वीडियो भी मौजूद है। नीरज कसाना नाम के व्यक्ति द्वारा रिकॉर्ड किए गए वीडियो में शाम 5:39 बजे शव को नाले में फेंकते हुए देखा जा सकता है।

सोचकर देखिए, एक अधिकारी जो अपनी धार्मिक पहचान से आगे बढ़कर वहाँ दंगे को रोकने जाता है, उसके साथ मुसलमानों की भीड़ क्या बर्ताव करती है?

पूरे चौबीस घंटे तक किसी को पता ही नहीं चला कि अंकित शर्मा कहाँ हैं। परिवार वालों को लगा कि कहीं फँसे होंगे, अभी आ जाएँगे। लेकिन हुआ क्या? अगले दिन लाश मिली, क्योंकि कुछ लोगों ने देखा था। अगले दिन तक पुलिस को पता चला कि चाँद बाग पुलिया के पास वाले नाले में एक लाश फेंकी गई है और जब निकाली गई, तो पता चला कि यह लाश अंकित शर्मा की थी।

अंकित शर्मा हत्याकांड की जांच सबसे पहले ताहिर हुसैन के मकान E-7, खजूरी खास, मेन करावल नगर रोड से शुरू हुई। जांच एजेंसियों के मुताबिक, इसी चार मंज़िला इमारत की छत से दंगाइयों ने पत्थर, पेट्रोल बम और एसिड बम फेंके थे। 28 फरवरी 2020 को FSL की टीम ने मकान और आसपास के इलाके का निरीक्षण किया। मकान के सामने से लेकर चाँद बाग पुलिया की ओर आधी दूरी तक बड़ी मात्रा में पत्थर, ईंटें, टूटी काँच की बोतलें, संभवतः पेट्रोल से भरी बोतलें, गोलियाँ और जली हुई सामग्री बिखरी मिली।

इसके बाद FSL टीम ने चाँद बाग पुलिया के पास स्थित खजूरी नाले का भी निरीक्षण किया, जहाँ से 26 फरवरी को अंकित शर्मा का शव बरामद हुआ था। नाले की दोनों ओर करीब 10 फीट ऊँची दीवार थी और पश्चिमी तरफ़ लोहे की ग्रिल लगी हुई थी। जांच के दौरान नाले की दीवार पर खून के निशान मिले। टीम सीढ़ी के सहारे नाले में उतरी, जहाँ कीचड़ और पानी के बीच खून के धब्बों वाला सीमेंट का एक पत्थर भी मिला। एफएसएल ने दीवार से गॉज़ पर खून का नमूना और खून लगे उस पत्थर को जब्त कर जांच के लिए भेजा। साथ ही, जिस जगह से शव मिला था, वहाँ की मिट्टी और कीचड़ का नमूना भी लिया गया, ताकि उसकी तुलना अंकित शर्मा के कपड़ों पर मिली मिट्टी से की जा सके।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, अंकित शर्मा के शरीर पर कुल 51 चोटों के निशान मिले, जो धारदार और भारी दोनों तरह के हथियारों से किए गए हमलों के थे। पुलिस के मुताबिक, शरीर पर मिली ये 51 गंभीर चोटें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि दंगाइयों ने अंकित शर्मा की बेहद बेरहमी से हत्या की। जांच एजेंसी का दावा है कि अंकित शर्मा की हत्या पहले से रची गई साज़िश के तहत अंजाम दी गई थी।

और अब इसी मामले में सबूतों के आधार पर ताहिर हुसैन और उसके अन्य मुस्लिम साथियों को अदालत द्वारा गुनहगार पाया गया।

और ये सिर्फ़ एक अंकित शर्मा की कहानी हमने आपको बताई है। दिल्ली के एंटी-हिंदू दंगों में कुल 101 पुलिसकर्मी घायल हुए। इस पूरी हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई, 581 लोग घायल हुए, जिनमें 97 लोगों को गोली लगी थी। इसके अलावा प्रभावित थानों में कुल 751 एफआईआर दर्ज की गईं।

और आप जानते हैं कि पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद ताहिर हुसैन ने ख़ुद कई खतरनाक कबूलनामे किए थे। 5 मई 2020 को दर्ज और ताहिर हुसैन द्वारा हस्ताक्षरित डिस्क्लोजर स्टेटमेंट में, जांच एजेंसी के अनुसार, उसने कहा कि CAA के विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उसे जानकारी मिली थी कि CAA के समर्थन में भी रैलियाँ निकलने वाली हैं। इसके बाद उन्होंने कुछ लोगों के साथ बैठक की और CAA समर्थकों को सबक सिखाने की योजना बनाई।

बयान के मुताबिक, ताहिर हुसैन ने अपने ही मकान को हिंसा का केंद्र बनाने का फैसला किया, क्योंकि वह इलाके की सबसे ऊँची इमारतों में से एक था। उसने यह भी कहा कि मकान में पहले से निर्माण कार्य चल रहा था, इसलिए ईंट-पत्थर जमा करने पर किसी को शक नहीं होगा। दंगों से कई दिन पहले ही ईंट, पत्थर और अन्य सामान इकट्ठा किया जाने लगा। दंगों से दो-तीन दिन पहले उसने अपनी लाइसेंसी पिस्टल भी थाने से छुड़वा ली। बयान में यह भी दावा है कि उसने अपने समर्थकों को हर स्थिति के लिए तैयार रहने और इलाके के सरकारी व निजी सीसीटीवी कैमरे तोड़ने के निर्देश दिए, ताकि सबूत न बच सकें।

ताहिर हुसैन ने यह भी बताया कि 24 फरवरी को उनके घर पर उनके भाई शाह आलम समेत कई लोग मौजूद थे और दोपहर में भीड़ ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘मारो-मारो, काफ़िरों को मारो’ के नारे लगा रही थी। और उसने यह सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से किसके इशारे पर किया? ताहिर हुसैन के अपने शब्द हैं कि उमर खालिद ने ताहिर हुसैन को भरोसा दिलाया था कि दंगों की तैयारी और आयोजन के लिए इस्लामिक संगठन पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) आर्थिक मदद देने के लिए तैयार है। तुम्हें बस दंगा करने और काफ़िरों का क़त्ल करने पर ध्यान देना है।

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