bareilly-kanwar-yatra

कांवड़ यात्रा पर क्यों बरसे थे पत्थर? 2012 से 2017 तक कैसे कांवड़ यात्रा बनी तुष्टिकरण का सबसे बड़ा शिकार

Summary
यह लेख बरेली में कांवड़ यात्रा के दौरान हुए विवादों, प्रशासनिक रुख, और 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों के बीच बदलते माहौल को समझाता है।

22 जुलाई 2017 की तारीख़ और उत्तर प्रदेश का बरेली ज़िला। सावन झूम रहा है और पूरा भारतवर्ष हर्षोल्लास में है। बरेली के हिंदू भी सावन में शिव की आराधना के लिए कठिन कांवड़ यात्रा निकाल रहे हैं। इसमें कई किलोमीटर तक, कंधे पर कई किलो जल लेकर, नंगे पाँव कठिन अनुशासन में चलने का संकल्प है।

यह यात्रा जिस स्थान से शुरू हुई, वहाँ से आगे बढ़ी तो हिंदू उस यात्रा का स्वागत करने के लिए खड़े हैं। लेकिन जैसे-जैसे यात्रा आगे बढ़ती है, सड़क के दोनों किनारों पर फूल, जल और भोजन की व्यवस्था लिए खड़े हिंदू कम होने लगते हैं। टीका लगाए लोगों के बजाए टोपी पहने हुए लोग दिखने लगते हैं। हिंदू अपनी यात्रा जारी रखते हैं, लेकिन जैसे ही यह यात्रा उस इलाके में पहुँचती है जिसे मुस्लिम बहुल इलाका कहा जाता है, वहाँ मंजर बदल जाता है। हिंदुओं के इस समूह को अचानक से लगता है कि उन्हें घेर लिया गया है। आसपास कुछ पुलिस वाले भी हैं, लेकिन उन्हें अंदाज़ा नहीं हो पाता कि क्या होने वाला है। जब तक कोई कुछ समझ पाता, ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारों के साथ उन मुसलमानों की गलियों, घरों के अंदर और छतों से हिंदुओं पर पथराव शुरू हो जाता है।

एक यात्रा जिसे विघ्नरहित होना था, अचानक उसके ऊपर जैसे कोई रेतीला तूफ़ान गुज़र गया। करीब आधे घंटे तक चले इस हमले के बाद जब पुलिस की Reinforcement आई, तो मंजर दिल दहलाने वाला था। करीब तीस कांवड़िये ख़ून में लथपथ सड़क पर घायल पड़े थे। सड़क ख़ून से लहूलुहान थी, मानो अभी बकरीद की कुर्बानी हुई हो। जिन पुलिस वालों को शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी थी, इस हमले में वे भी नहीं बच सके। करीब छह पुलिस वालों को भी गंभीर चोटें आईं और वे कुछ न कर सके। यह घात लगाकर मुसलमानों के द्वारा तैयारी के साथ किया गया हमला था। इस हमले का समय देखिए, 19 मार्च को उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी थी और बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कुर्सी संभाली थी। महज चार महीनों के भीतर हिंदुओं पर इतना बड़ा हमला कर दिया गया था।

इस हमले के बहुत सरल कारण थे। पहला, हिंदुओं को सड़कों पर निकलने से और उनकी धार्मिक Practices से रोकना। दूसरा, यह दिखाना कि सरकार बदली है, लेकिन हम नहीं बदले; हमारी फ़ितरत और मंसूबे वही हैं। और तीसरा, सरकार बदलने की जो भड़ास थी, उसका प्रकटीकरण। लेकिन मुसलमानों ने जो कहानी सुनाई, उसमें तर्क दिया कि हिंदुओं के DJ की आवाज़ तेज़ हो गई थी, इस वजह से हम लोगों ने पत्थरबाज़ी करके करीब चालीस हिंदुओं और पुलिसवालों को लहूलुहान कर दिया।

यह सबको पता था कि यह DJ की समस्या नहीं थी। हिंदू भी कई बार तेज़ DJ से परेशान होते हैं, कांवड़ यात्रा में शामिल लोग भी DJ की आवाज़ ख़ुद कम कर देते हैं। कोई भी सरकार हो, वह शोर मचाने वाले DJ पर रोक लगाने का काम करती है। फिक्स डेसिबल से लेकर फिक्स हाइट और स्पीकर के नंबर तक के सख्त कानून होते हैं। लेकिन DJ के तेज़ होने की वजह से आज तक मैंने नहीं सुना कि कोई हिंदू पथराव कर रहा हो या पुलिस लाठीचार्ज कर रही हो। दरअसल, हमें यह समझना होगा कि 22 जुलाई 2017 को बरेली में जो कुछ हुआ, वह एक दिन या एक साल की घटना नहीं थी। यह कई दशकों तक कुछ स्वघोषित सेक्युलर राजनीतिक दलों की सियासत से खाद-पानी पाकर उग आई नागफनी का नतीजा था।

अगर हम इस्लामिक Radicalization और उसकी Timeline को फॉलो न भी करें, तब भी मैं आपको एक छोटी सी Timeline के ज़रिए पूरी कहानी बताऊँगा कि इस तरह की घटनाएँ क्यों होती हैं, कौन करवाता है, और सबसे बड़ी बात, इसका हल क्या है। तो अगर आपको 2017 समझना है, तो आपको 2012, 2013, 2014-15 और 2016 को समझना होगा।

उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटों में करीब 143 सीटें ऐसी हैं जहाँ मुस्लिम आबादी 25 फ़ीसदी से अधिक है। इनमें सत्तर सीटें ऐसी हैं जहाँ 35 फ़ीसदी मुसलमान हैं और करीब 40 सीटें ऐसी हैं जहाँ 50 फ़ीसदी से ज़्यादा मुसलमान रहते हैं। 2012 का वक्त सोशल इंजीनियरिंग का दौर था। MY समीकरण अल्बर्ट आइंस्टीन के E=mc2 से बड़ा और चमत्कारी फ़ॉर्मूला हुआ करता था। जिन्हें PDA के नारे में MY का मतलब भूल गया हो, उनके लिए बता दें कि M का मतलब मुस्लिम और Y का मतलब यादव होता था, और सपा ने दो दशकों से अधिक की यात्रा में इस फ़ॉर्मूले का पेटेंट अपने नाम करा लिया था। इस समीकरण के बूते उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को पहला पूर्ण बहुमत हासिल हुआ और मुसलमानों ने इस समर्थन के बदले सत्ता का वरदहस्त हासिल किया। आज़म ख़ान जैसे MY समीकरण के X-Factors ने ज़मीन पर अनगिनत छोटे आज़म ख़ान खड़े किए। 2012 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई कथित मुस्लिम बहुल ज़िलों में प्रशासन ने कानून-व्यवस्था का हवाला देकर कांवड़ियों को मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों से गुज़रने से रोका। मेरठ और मुज़फ़्फ़रनगर के हाईवे पर कांवड़ मार्गों में बदलाव किया गया। कई इलाक़ों में पुलिस को High Alert पर रखा गया।

बरेली में क्या हुआ? रात करीब आठ बजे अलका होटल के सामने वाली गली में शाहबाद इलाके से कांवड़ की एक टोली निकल रही थी। मुसलमानों ने उनसे साउंड सिस्टम बंद करने को कहा। हिंदुओं ने मना कर दिया। इसके बाद मुसलमानों ने कहा कि सरकार हमारी है और तुम हमारी बात नहीं मानोगे? इतना कहकर मुसलमानों ने कुछ कांवड़ फोड़ दिए। यह बेअदबी से अधिक, सीधे तौर पर हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता पर कुठाराघात था। यह करने वाले वे लोग थे जिनकी ताज़िया का एक मीटर भी कम नहीं हो सकता; बिजली के तार काट दिए जाएँगे, लेकिन ताज़िया नहीं झुकेगा। इधर से हिंदुओं ने प्रतिकार किया और दोनों पक्षों में मारपीट और पथराव शुरू हो गया। पुलिस के पहुँचने के बाद शाहबाद में तो हालात पर काबू पा लिया गया, लेकिन इसी बीच मठ की चौकी इलाके में भी बवाल शुरू हो गया। यहाँ से गुज़र रहे कांवड़ियों का मुसलमानों ने रास्ता रोक दिया क्योंकि यह कथित मुस्लिम बहुल इलाका था। अहमद अली का तालाब वाला मोहल्ला कहते हैं इसे, और यहाँ रहने वाले मुसलमानों ने कांवड़ियों को उधर से जाने देने से रोक दिया। जोगी नवादा के कांवड़ियों की यह टोली भी कछला से गंगाजल लेकर लौट रही थी। हिंदुओं पर एक ही समय में, एक ही ज़िले में हुआ यह दूसरा हमला था। यहाँ गोलीबारी तक हुई। मुसलमान इस कदर हमलावर हो चुके थे कि पुलिस लाचार दिख रही थी।

पिछले साल जब ‘I Love Muhammad’ प्रकरण की वजह से बरेली में बवाल करने की कोशिश हुई थी, तो मैं Ground Report के लिए वहाँ गया था। 2012 की इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी हिंदू ने बताया कि मुसलमानों की भीड़ हिंदुओं और पुलिसवालों दोनों को जान से मारने पर आमादा थी। इस भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक पुलिस वाले ने गोली तक चला दी थी, जिसमें एक मुसलमान व्यक्ति की मौत भी हो गई। सोचकर देखिए, सनक और नफ़रत ने इन्हें क्या बना दिया कि गोली तक खा लेंगे, लेकिन हिंदुओं का DJ नहीं बजने देंगे, उन्हें कांवड़ के लिए रास्ता नहीं देंगे।

2013 आते-आते समाजवादी पार्टी ने पूरे प्रदेश का तापमान बढ़ा दिया था। अखिलेश यादव के CM बनने के साथ ही अगले एक साल में एक दर्जन से ज़्यादा Communal Riots हो चुके थे, जिनमें प्रशासनिक विफलता और वोट बैंक की मनबढ़ता ही सबसे बड़ा मुद्दा थी। 2013 में भी सरकार का रवैया ऐसा ही रहा। पिछली साल के मुसलमानों के Sentiment को भाँपते हुए कई जगहों पर हिंदुओं के DJ बंद करवाए गए, रास्तों में उनके स्पीकर पुलिसवालों ने अपने हाथों से खोल दिए। 2013 में बरेली का उदाहरण फिर देखिए। शाम करीब छह बजे भमोरा के कांवड़िये बदायूँ के कछला घाट से जल लेकर वनखंडीनाथ मंदिर जा रहे थे। कांवड़ियों के साथ ट्रैक्टर-ट्रॉली में भगवान की वेशभूषा में कुछ कांवड़िये नृत्य कर रहे थे, जबकि इससे आगे चल रही गाड़ी में DJ लगा था। कांवड़ियों ने रामगंगा चौकी के पास रुककर फलाहार किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस आई और उसने DJ पर ऐतराज़ जताया। कांवड़ियों ने कहा कि यह हमारी यात्रा का हिस्सा है, हमें जाने दिया जाए। लेकिन यूपी पुलिस अड़ी रही। करीब ढाई घंटे तक बात चलती रही, लेकिन पुलिस टस से मस नहीं हुई क्योंकि उन्हें पता था कि अगर DJ बंद नहीं करवाया, तो ऊपर बैठे सरकार के लोग नाराज़ हो जाएँगे। आखिरकार, हिंदुओं को बड़े दबे मन से पुलिस के दबाव में DJ खुलवाकर रखना ही पड़ा। उस समय की मीडिया इन घटनाओं को कितना रिपोर्ट कर पाती थी, यह भी आप समझ सकते हैं।

अब 2014 में आइए। 2014, मुझे जहाँ तक सूचना है, अपेक्षाकृत शांत रहा क्योंकि लोकसभा के चुनाव थे, जिसकी वजह से कांवड़ यात्रा की शुरुआत के समय तक सुरक्षा व्यवस्था केंद्रीय बलों के हाथों में थी। लेकिन Unreported Sources ये बताते हैं कि लोकल लेवल पर पुलिस को सख्त हिदायत थी कि किसी भी सूरत में DJ की आवाज़ या ‘हर हर महादेव’ के नारों की आवाज़ मुसल्लम ईमान वाले के कान तक नहीं पहुँचना चाहिए। उसी दौर की वह तस्वीर आपको याद होगी कि अज़ान या नमाज़ के वक्त एक पुलिसवाला बाकायदा मंदिर का घंटा पकड़ कर खड़ा है, ताकि नमाज़ में दख़ल न हो जाए।

फिर आया साल 2015, जिसने भारत की राजनीति में तुष्टिकरण के अलग पैमाने क्रिएट किए। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन और प्रधान सचिव (गृह) देबासिस पांडा ने कांवड़ यात्रा की तैयारियों का जायजा लेने के लिए सभी ज़िलों के प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ Video Conference की। इस बैठक के बाद एक फरमान आया। मुख्य सचिव आलोक रंजन ने कहा कि कांवड़ यात्राओं के दौरान DJ सेट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘अक्सर देखा गया है कि DJ सेट के इस्तेमाल से कानून-व्यवस्था भंग होती है। दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 के तहत निर्देश जारी किए गए हैं कि इसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।’

धारा 144 का एक अर्थ वह होता है जो कानून ने बताया है, और एक अर्थ होता है जो प्रशासन बताता है। जिसका सीधा एक मतलब था कि एक सीमा में असीमित अधिकार। यह असीमित अधिकार DJ की आड़ में हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता को कुचलने के लिए दिए गए थे। जगह-जगह पर खुशियों और आनंद के माहौल में निकलने वाली कांवड़ यात्रा किसी मातम की तरह शांत हो गई। और आपको पता है कि यह सब करने का Reward मुख्य सचिव आलोक रंजन को क्या मिला? अखिलेश यादव ने उन्हें अपना सबसे करीबी सलाहकार बनाया। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा का घोषणा-पत्र उन्होंने डिज़ाइन किया, 2024 में समाजवादी पार्टी ने उन्हें अपने टिकट पर राज्यसभा उम्मीदवार तक बना दिया। हिंदुओं के मनोबल को तोड़ने का यह Reward मिला।

कांवड़ यात्रा 26 जनवरी या 15 अगस्त की परेड नहीं थी। इसमें एक पंक्ति में चलने की बाध्यता नहीं होती है। यह साल में कुछ दिनों का ऐसा त्योहार होता है, जिसमें लोग भोले शंकर की आराधना अपने हिसाब से, बिना ज़्यादा नियम-क़ानून में बँधे हुए, एक सामूहिकता के भाव से करते हैं। कहते हैं सावन मास में भगवान विष्णु क्षीर सागर में योगनिद्रा के लिए चले जाते हैं, तब सृष्टि के संचालन की ज़िम्मेदारी भगवान शिव के हाथों में आ जाती है। इसलिए सावन मास में भगवान शिव की पूजा-अर्चना हिंदू समाज जोर-शोर से करता है। लेकिन समाजवादी पार्टी की सरकार ने अपने तुष्टिकरण को साधने के लिए हिंदुओं के इस त्योहार की आत्मा को ही मार दिया था।

जो त्योहार मन को पवित्र करने का था, वह विवादों में बदल गया। एक समय पर कांवड़ लेकर जाना एक परिक्रमा के समान था। बाप अपने बच्चों को कंधे पर बैठाते और यात्रा किया करते थे। लेकिन समाजवादी पार्टी ने इस त्योहार का नाता अनगिनत विवादों से जोड़ दिया। सोचकर देखिए, कौन माँ राजी होगी कि उसका पंद्रह साल का बच्चा एक ऐसी भीड़ में जाए, जिसके ऊपर पुलिस जब चाहे तब धारा 144 में केस दर्ज कर सकती है?

अगले दो वर्षों तक उत्तर प्रदेश को एक दंगा-प्रदेश बना दिया गया। समाजवादी पार्टी के पाँच वर्षों के शासनकाल के दौरान 200 से ज़्यादा दंगे हुए। हर दंगा मतलब सिर्फ़ सैकड़ों लोगों का मरना या हज़ारों का पलायन ही नहीं होता। एक गाँव का एक छोटा सा दंगा भी एक बड़े मानस पर क्या प्रभाव डालता है, इसे समझिएगा। समाजवादी पार्टी ने पूरे Tenure के दौरान कमोबेश यही किया। इसका पहला प्रभाव यह हुआ कि हिंदुओं का मनोबल टूटा और जो सामाजिक परंपरा थी, उसे तुष्टिकरण की राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया। दूसरी तरफ़ मुसलमानों को गुब्बारे की तरह फुलाया गया कि देखो, जो तुम चाहते थे, हमारी सरकार वही कर रही है। साल 2016 चुनावी साल था। कांवड़िये ख़ुद को सीमित करके ही चल रहे थे, उन्हें सरकार से कोई उम्मीद नहीं थी। और दूसरी तरफ़ मुसलमान खुश थे कि सरकार तो हमारी तरफ़ है। लेकिन 140 सीटों पर 25 फ़ीसदी की ताक़त रखने का दंभ रखने वाले मुसलमान यह भूल गए कि बाकी 263 सीटों पर 90 फ़ीसदी हिंदू हैं, और जहाँ वे ख़ुद को ताक़तवर कह रहे हैं, वहाँ भी सत्तर फ़ीसदी हिंदू हैं।

यहीं हो गया खेल। 2017 के विधानसभा चुनावों में यही 80-20 की लड़ाई हो गई और पासा पलट गया। उत्तर प्रदेश में किसी को उम्मीद नहीं थी कि भारतीय जनता पार्टी पूर्ण बहुमत की सरकार बना ले जाएगी। सरकार बनी और मामला ही पलट गया। पहले प्रशासन का पहला सवाल होता था कि DJ कितने बजे बंद होगा? मुसलमान नाराज़ तो नहीं हो जाएगा? अब पहला सवाल है, यात्रा सुरक्षित कैसे निकलेगी? कांवड़ियों को कोई दिक्कत न हो। पहले कांवड़ यात्रा को कानून-व्यवस्था की समस्या माना जाता था, अब उसे करोड़ों श्रद्धालुओं की धार्मिक यात्रा मानकर उसकी व्यवस्थाएँ होने लगीं। फ़र्क़ यहीं से शुरू हो गया।

दिक्कत ये हुई कि पहले तो सरकार लाठी और पत्थर बरसाती थी, अब हेलीकॉप्टर से कांवड़ यात्रियों पर फूल बरसा रही है। मुसलमान सरकार का संदेश साफ पढ़ पा रहे थे कि जो श्रद्धालु पहले व्यवस्था के लिए संघर्ष करता था, अब वही राज्य का सम्मानित अतिथि है। DJ को लेकर आज भी नियम हैं, एक निश्चित डेसिबल से ऊपर नहीं बजा सकते, एक निश्चित हाइट से ऊपर नहीं कर सकते, लेकिन वे फैसले दुराग्रह और तुष्टिकरण के नहीं हैं, बल्कि कानून-व्यवस्था के लिए वैज्ञानिक पद्धति के फैसले हैं। अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ को अगर हम सिर्फ़ कांवड़ की तराजू पर ही तौलकर देखें, तो दोनों के पूरे स्टेट को चलाने के Mindset का अंदाज़ा लग जाएगा।

Editorial team:
Production team:

More videos with Anurag Mishra as Anchor/Reporter