भारत छोड़ो आंदोलन के पहले बलिदानी: आरएसएस स्वयंसेवक उमाकांत कड़िया की अनसुनी कहानी

Summary
स्मारक पर लिखा है कि उमाकांत मोतीराम कड़िया ने यहीं वीरगति प्राप्त की थी। वे इस आंदोलन के प्रथम बलिदानी थे। उमाकांत कड़िया जैसे स्वयंसेवकों का बलिदान यह सिद्ध करता है कि केवल कांग्रेस ही आजादी की लड़ाई की ठेकेदार नहीं है।

1942 में हुए  गाँधी जी के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के बारे में सबको मालूम है, सबको ये भी पता है कि अंग्रेजों के भारत से भागने से पहले यह सबसे बड़ा जनआंदोलन था, लेकिन क्या आपको यह मालूम है कि इस ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का पहला बलिदानी कौन था? उसका नाम क्या था? वो किस संगठन जुड़ा हुआ था? कहाँ का रहने वाला था और आज तक वो गुमनाम क्यों है?

वो शख्स था एक स्वंयसेवक, उसी आरएसएस का स्वंयसेवक जिसको लेकर वामपंथी और कांग्रेस एजेंडा फैलाते हैं कि इन्होने आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा ही नहीं लिया। इस शख्स का नाम था ‘उमाकांत कड़िया’

आंदोलन के समय उमाकांत कड़िया की उम्र सिर्फ 21 साल थी। वे अहमदाबाद में संघ के शाखा के मुख्य शिक्षक भी थे।भारत छोड़ो आंदोलन में 9 अगस्त 1942 को जब अहमदाबाद में प्रदर्शन शुरू हुआ तो उमाकांत सबसे आगे खड़े थे।

अंग्रेजी क्रूरता के सामने वे डटे रहे। एक युवा में इतनी निडरता देख, एक अंग्रेज ने उन पर गोली चलाई, जो सीधे उनके माथे पर लगी और वहीं उनकी वीरगति हुई। इस तरह उमाकांत भारत छोड़ो आंदोलन में वीरगति पाने वाले पहले शख्स बने।

अहमदाबाद के खाडिया इलाके में जहाँ यह घटना हुई, वहाँ बाद में एक स्मारक बनाया गया। उस स्मारक पर लिखा है कि उमाकांत मोतीराम कड़िया ने यहीं वीरगति प्राप्त की थी। वे इस आंदोलन के प्रथम बलिदानी थे। उमाकांत कड़िया जैसे स्वयंसेवकों का बलिदान यह सिद्ध करता है कि केवल कांग्रेस ही आजादी की लड़ाई की ठेकेदार नहीं है।

यह उस बात की परिचायक है कि जिस संघी शब्द को वामपंथी और कांग्रेसी गैंग ने बाद में गाली बना दिया, वही संघी अंग्रेजों की गोली खाने के लिए सबसे पहले और आगे खड़ा था। जिस संघ को गाँधी जी का दुश्मन बताया जाता है, उसी का कार्यकर्ता गांधीजी के आंदोलन के लिए अपनी जान देने से नहीं पीछे हटा।

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