हिन्दू जीवन का एक सिद्धांत आपने यदा-कदा सुना होगा। ये सिद्धांत है मनसा, वाचा और कर्मणा। यानी किसी भी व्यक्ति को अपने विचारों, अपनी वाणी और फिर अपने कामों में एक सा ही व्यवहार करना चाहिए। यह हिन्दू दर्शन के आधार जैसा है।
लेकिन ये आधार तो हिन्दुओं का है! क्या हो कि आपके घर के सामने रहने वाला श्रीनिवास तिलक लगाता हो, हिन्दुओं के पैसे से चलने वाले ट्रस्ट में नौकरी करता हो और तिरुपति में श्रद्धा दिखाने का दावा करता हो लेकिन असल में वो सैमुएल हो चुका हो।
क्या हो कि श्रीनिवास के हाथ अब भगवान विष्णु के सामने श्रद्धा से ना जुड़ते हों बल्कि उसके आंसू जीसस के लिए बहते हों। यानी मनसा, वाचा और कर्मणा… तीनों की तिलांजलि दे दी गई हो।
आंध्र प्रदेश: देवभूमि में छिपी ईसाई लहर
जैसा उदाहरण मैंने दिया, ऐसे आज भारत में लाखों लोग हैं। लेकिन एक सूबा ऐसा है जहाँ कितने श्रीनिवास, सैमुएल बन चुके हैं, ये पता ही नहीं चलता। ये सूबा है आन्ध्र प्रदेश। वही आन्ध्र प्रदेश जहाँ तिरुमला की पहाड़ियों पर भगवान विष्णु विराजमान हैं, वही आन्ध्र प्रदेश जहाँ भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग मल्लिकार्जुन है। और वही आन्ध्र प्रदेश जहाँ अब हजारों चर्च हैं… जिसे पिछले 20 सालों में से 11 साल किसी ईसाई CM ने चलाया है। आन्ध्र प्रदेश की चर्चा आज मैं इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि यहाँ पर बढ़ती ईसाई धर्मांतरण की समस्या पर बात नहीं होती। जो आन्ध्र प्रदेश आँकड़ों में हिन्दू बहुल नजर आता है, वहाँ अन्दर ही अन्दर ईसाई बढ़ते जाते हैं लेकिन किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगती।
आँकड़ों से खिलवाड़?
आन्ध्र प्रदेश शायद देश में अकेला ऐसा राज्य है जहाँ सरकारी आँकड़ों में ईसाइयों का नम्बर घटा है। लेकिन क्या सरकारी पन्नों में जो लिखा है वो सही है या फिर जमीन पर सब कुछ बदलता जा रहा है और हमें भनक तक नहीं। बात की शुरुआत करेंगे सरकारी नम्बर्स से।
2011 की जनगणना की मानी जाए तो विभाजित यानी आज के आन्ध्र प्रदेश में ईसाइयों की जनसंख्या मात्र 6.82 लाख है। ये आन्ध्र प्रदेश की पूरी जनसंख्या का केवल 1.3% है। लेकिन क्या सही में ईसाइयों का नम्बर इतना कम है। CPS इंडिया की एक रिसर्च कहती है कि 1911 में आन्ध्र प्रदेश में ईसाइयों की जनसंख्या 3 लाख हुआ करती थी, ये 1971 तक लगातार बढती रही और 14.8 लाख तक पहुँच गई। 1971 में आन्ध्र प्रदेश में 5.3% आबादी ईसाइयों की हो गई। लेकिन यही रिसर्च बताती है कि 1971 के बाद कुछ ऐसा हुआ कि दशक दर दशक ईसाई आबादी गोते खाने लगी और 2011 तक लगभग एक चौथाई ही रह गई। यानी या तो जो लोग ईसाई बने वो वापस हिन्दू बन गए या फिर ईसाइयत अपनाने के बाद भी लोग खुद को हिन्दू बता रहे हैं।
मुखौटा हिन्दू, चेहरा ईसाई
अगर पहली संभावना को ही सच मान लिया जाएगा तो ये बात गले नहीं उतरती की लाखों ईसाई वापस हिन्दू बनते जा रहे हैं और इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं हो रही। आन्ध्र प्रदेश में तो बीते 4-5 दशकों में ऐसा कोई बड़ा घर वापसी कार्यक्रम भी नहीं हुआ जिससे हजारों लाखों ईसाई वापस हिन्दू बनें हों। हाँ 2015 के आसपास कुछ 8000 ईसाइयों के वापस हिन्दू बनने की बात जरूर सामने आई थी लेकिन ये आँकड़ा ऐसे है जैसे ऊँट के मुंह में जीरा।
दूसरी तरफ ये बात इसलिए भी स्वीकार्य नहीं जा सकती क्योंकि आन्ध्र प्रदेश में चर्चों का नम्बर नहीं घटता नजर आता। अलग-अलग रिपोर्ट्स बताती हैं कि आन्ध्र प्रदेश में 6 हजार से 10 हजार के बीच चर्च हैं। तो जहाँ ईसाई घट रहे हैं, वहाँ चर्च में आखिर कौन प्रार्थना करने जा रहा है।
ऐसे में सुई दूसरी आशंका पर घूमती है। और ये है अंडररिपोर्टिंग। यानी यीशु को मानने वाले भी खुद को सरकारी कागजों में हिन्दू बताते हों। ये आशंका ज्यादा मजबूत लगती है। क्योंकि पहचान छुपाने वाले क्रिप्टो क्रिश्चियंस की कहानियां हमारे लिए कोई नई नहीं है।
मंदिरों में घुसे Crypto-Christians
दरअसल, कानूनन अगर कोई हिन्दू दलित ईसाईयत में कन्वर्ट हो जाता है तो उसे आरक्षण जैसे तमाम लाभ मिलना बंद हो जाते हैं। ऐसे में फायदा इसमें ही है कि मन से भले ईसाई हो जाओ लेकिन कागजों में हिन्दू लिखा हो। और आन्ध्र प्रदेश में तो ऐसे क्रिप्टो क्रिश्चियन तिरुपति मंदिर तक में घुसपैठ कर चुके हैं। फरवरी 2025 में ही तिरुपति मंदिर का मैनेजमेंट करने वाले तिरुमला तिरुपति देवस्थानम ने 18 ऐसे कर्मचारी सस्पेंड कर दिए थे जो दूसरे धर्म यानी ईसाईयत का पालन कर रहे थे। बताया गया कि इनमें से अधिकाँश ईसाई थे। जुलाई 2025 में भी 4 ऐसे कर्मचारी सस्पेंड किए थे। नियमों के अनुसार, TTD में वही व्यक्ति काम कर सकता है, जो सनातन में विश्वास रखता हो। अलग अलग समय पर हुई जाँच में TTD को तमाम ऐसे कर्मचारी मिले हैं जो ईसाइयत में कन्वर्ट हो चुके हैं।
लेकिन कहानी 2025 तक नहीं रुकती। 2023 में तो आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने ऐसे ही एक ईसाई की नौकरी वापस करने से इंकार कर दिया था जिसके ऊपर अपना धर्म छुपा कर TTD में नौकरी करने का आरोप था। ग्लोबल हिन्दू हेरिटेज फाउंडेशन जैसी संस्थाएँ तो आशंका जताती हैं कि TTD के भीतर कम से कम 4400 ईसाई काम कर रहे हैं।
अब तक मैं आपसे आन्ध्र प्रदेश के सिर्फ एक संस्थान की बात अब तक बता रहा हूँ जहाँ ईसाइयत की घुसपैठ हुई है। और ये संस्थान ऐसा है जहाँ इतने चेक्स एंड बैलेंसेस हैं। अब अप अंदाजा लगाइए कि आन्ध्र प्रदेश के भीतर क्या स्थिति होगी। आन्ध्र प्रदेश में ईसाई सिर्फ 1% हैं या इससे ज्यादा, ये पता करना थोड़ा मुश्किल काम है। लेकिन एक बार नजर अगर बयानों और तथ्यों पर डाली जाए तो कुछ कुछ तस्वीर साफ़ होती है।
2020 में आन्ध्र प्रदेश की YSRCP के सांसद रामकृष्ण राजू ने खुद ये स्वीकार किया था ईसाई मिशनरियाँ राज्य में बड़े स्तर पर पैसे का लालच देकर धर्मांतरण करवा रही हैं।
जगन का Jesus प्रेम
वैसे जिस पार्टी से रामकृष्ण राजू आते हैं, उसके मुखिया यानी जगन मोहन रेड्डी पर ही राज्य में सरकारी संसाधनों के सहारे ईसाईयत को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है। जगन मोहन रेड्डी ने 2019 में सत्ता में आने के बाद शुरूआती दिनों में ही फैसला किया था कि वह अपने राज्य से जेरुसलम और बैथलेहम जैसी जगहों की यात्रा करने वाले ईसाइयों को 60 हजार की मदद देंगे।
इसके अलावा जगन की ही सरकार ने पादरियों को राज्य में 5 हजार रूपए महीने देने का फैसला लिया था। हास्यास्पद बात यह है कि 5000 की मदद पाने वाले 29 हजार से ज्यादा पादरियों के पास या तो हिन्दू obc या फिर SC होने का प्रमाण पत्र था, यह दावा लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम नाम की एक संस्था ने किया था।
हिन्दुओं की आस्था के साथ मजाक का स्तर जगन की सरकार में यहाँ तक था कि 2019 में तिरुपति जाने वाली बसों पर ईसाइयत से जुड़े विज्ञापन थे। इसे अप्रत्यक्ष तौर पर धर्मांतरण के प्रमोशन के तौर पर देखा गया था कि जहाँ तुम तिरुपति जाते हो तो अपना पैसा खर्च करना पड़ता है और अगर ईसाई बन कर जेरुसलम जाओगे तो सरकार मदद देगी।
दक्षिण की देवभूमि का ईसाई राजपरिवार
अब अगर ईसाइयों की संख्या आन्ध्र प्रदेश में इतनी कम है तो भला उनसे जुड़े इतने मजबूत फैसले कैसे लिए जा रहे हैं। राजनीति में किसी भी समूह के लिए कितने फैसले होंगे ज्यादातर उनके संख्या से तय होता है। आन्ध्र में अगर ईसाई ऐसी स्थिति में नहीं होते तो वह लगातार महत्वपूर्ण फैसलों पर कैसे प्रभाव डाल रहे होते। वैसे जगन मोहन रेड्डी के खुद के धर्म को लेकर विवाद कम नहीं है। जगन मोहन नाम सुनने में हिन्दू लग सकता है लेकिन वह एक ईसाई हैं। उनकी सरकार पर TTD में ईसाई मुखिया नियुक्त करने का आरोप भी लगा था। और सिर्फ जगन ही नहीं बल्कि उनके पिता वाई एस राजशेखर रेड्डी के दौर में भी आन्ध्र को ईसाईयत की तरफ मोड़ने के आरोप लग चुके हैं।
राजशेखर रेड्डी 2004 से 2009 के बीच आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे। 2009 में उनकी एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। 2008 में इकॉनोमिक टाइम्स में लिखा। यह तब लिखा गया था जब YS राजशेखर रेड्डी ने ईसाइयों को जेरुसलम भेजने के लिए सब्सिडी देने का फैसला लिया था। कहते हैं कि उन्होंने राज्य में चर्चों की मरम्मत के लिए भी 1 लाख 50 हजार रूपए देने को मंजूरी दी थी।
बताते हैं कि राजशेखर रेड्डी एक समर्पित ईसाई थे और उनके दादा ईसाइयत में कन्वर्ट हुए थे। राजशेखर रेड्डी तो वो दीवाल भी खत्म करना चाहते थे जिसकी वजह से ईसाईयत में कन्वर्ट हो चुके लोग अपना धर्म हिन्दू लिखते हैं।
राजशेखर रेड्डी सरकार में ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाले हिन्दू दलितों को आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पास किया गया था। यही नहीं बल्कि वह तो कथित मुस्लिम दलितों को भी आरक्षण का फायदा दिलाने चाहते थे। आन्ध्र में ईसाइयत को मजबूत करने का राजशेखर रेड्डी की कॉन्ग्रेस सरकार का तंत्र यहीं तक नहीं रुका हुआ था बल्कि उस पर तो पादरियों को बाकायदा मदद करने के आरोप थे।
राजशेखर रेड्डी के दामाद और YS शर्मिला के पति प्रीचर अनिल कुमार ने राजशेखर रेड्डी के दौर में ही आन्ध्र प्रदेश में ईसाईयत का प्रचार चालू किया था। अनिल कुमार पहले एक ब्राह्मण थे और YS शर्मिला से विवाह के बाद ही वह कन्वर्ट हुए। इसके कुछ सालों बाद वह खुद ईसाईयत का प्रचार करने लगे। राजशेखर रेड्डी की सरकार पर आरोप था कि अनिल कुमार को अपनी धर्मांतरण एक्टिविटी चलाने के लिए सरकारी मशीनरी का सपोर्ट दिया जा रहा है। अनिल कुमार अब भी दुनिया भर में ईसाइयत का प्रचार करते हैं।
कब रुकेगा Conversion
तो जिस राज्य में ईसाईयत में कन्वर्ट होने को पूरा तंत्र समर्थन दे, पादरियों को हजारों का मानदेय दिया जाए, जहाँ हिन्दू धर्मस्थानों में जाने वाली गाड़ियाँ जुड़े विज्ञान ईसाइयत का प्रचार करें और जहाँ कन्वर्ट होने वालों को आरक्षण दिलाने के लिए एडी चोटी का जोर लगा दिया जाए, वहाँ ईसाइयों का नम्बर बीते 50 सालों में घट गया है, यह बात गले नहीं उतरती।
हो सकता है आन्ध्र में 10% ईसाई आबादी, हो सकता है यह 5% हो… या हो सकता है एक चौथाई तक हो लेकिन आन्ध्र प्रदेश में सिर्फ 1.5% क्रिस्चियन रहते हैं…. ये कोई भी तार्किक आदमी मानने से इनकार कर देगा। आन्ध्र प्रदेश की असल सच्चाई क्या है, कितने श्रीनिवास असल में सैमुएल बन चुके हैं… कहाँ तक इन मिशनरियों की घुसपैठ है, ये शायद ही हमें कभी पता लगे। लेकिन एक बात तो तय है, सच्चाई सिर्फ उतनी नहीं है जितनी किसी सरकारी दफ्तर में धूल फांकती फ़ाइल में दिखती है। सच्चाई इस से भी कहीं आगे है, और भी ज्यादा गहरी है।





