पिछले वीडियो में हमने लवणासुर से जुड़ी कुछ रोचक बातें की थीं। जैसे कि लवणासुर के पिता, वह कहाँ रहता था, उसका एक्सटेंडेड फैमिली कौन था, और उसको किसने और कैसे मारा था।
अब उसी प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए आज हम वो रोचक बातें करेंगे जो पिछले वीडियो के अंत में रह गई थीं।
तो सबसे पहले बात करते हैं उस मधुरापुरी के बारे में जो कि शिवजी के परम भक्त, उत्तम दैत्य, और लवणासुर के पिता मधु का निवास स्थान थी। पुत्र लवणासुर के कुकर्मों से त्रस्त होकर जब मधु समुद्र में चला गया, तब से लवणासुर ही उस मधुवन में निवास करने लगा था और वहाँ के लोगों को खूब परेशान करता था।
पर श्री राम के नेतृत्व में शत्रुघ्न जी ने लवणासुर से युद्ध किया और उसका वध किया।
प्रभु श्री राम ने शत्रुघ्न जी को न केवल लवणासुर को मारने का दायित्व दिया, बल्कि वध के बाद मधुरापुरी को ढंग से बसाने की भी ज़िम्मेदारी दी। इसका तात्पर्य यही है कि कोई भी नगर बिना राजा या यूँ कहिए कि एक सही शासक के बिना बिल्कुल दिशाहीन हो जाता है। किसी भी जनसमूह को एक व्यवस्थित नगर के रूप में बसाने से उस समाज की बहुत सी समस्याएँ—जैसे कि म्युनिसिपालिटी, न्याय व्यवस्था—बड़े ही सरल और सुनिश्चित तरीके से हल होती रहती हैं। इससे प्रजा शारीरिक और बौद्धिक रूप से खिलती है, और अध्ययन व शोध में उनकी प्रोडक्टिविटी बढ़ती है।
और यहाँ तो नगर को बसाने वाले शत्रुघ्न जी स्वयं ही सिविल इंजीनियरिंग और टाउन प्लानिंग में निपुण थे। उसमें भी वह तो अयोध्या जैसी एक आदर्श और उत्कृष्ट नगरी में बड़े हुए थे। अपने टैलेंट के साथ-साथ उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से देखा और जिया भी हुआ था कि एक आदर्श नगर में वहाँ के बाज़ार, उद्यान, घर, नदी के किनारे, दिन-प्रतिदिन की जनसमस्याओं का निवारण और न्याय व्यवस्था कैसी होती है।
लवणासुर के वध के पश्चात् अब मधुरापुरी को बसाने का कार्य शत्रुघ्न जी ने आरम्भ किया। शत्रुघ्न जी ने मधुरापुरी जिस तरीके से बसाई, उसका वर्णन इतना भव्य है कि आज के टाउन प्लानर्स को भी कहीं पीछे छोड़ दे।
मधुरापुरी को यमुना के किनारे अर्धचंद्राकार आकार में बसाया गया। मधुरापुरी पूर्ण रूप से सब सुख-सुविधाओं से सम्पन्न थी। किसी भी सिविलाइज़ेशन के लिए जीवन की जो प्राथमिक आवश्यकता होती है, वह होती है नित्य भोजन और वह आता है धान और सब्ज़ियों से। तो सबसे पहले तो मधुरापुरी के लोगों के लिए एग्रीकल्चरल फील्ड्स बनवाए गए जहाँ पर सरलता से खेती हो पाए।
प्रजा के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना एक अच्छे शासक का कर्त्तव्य होता है। इसे समझते हुए शत्रुघ्न जी ने नगर में स्वास्थ्य के लिए उत्तम स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्थाएँ कीं। अच्छा भोजन और स्वास्थ्यालयों के चलते मधुरापुरी के लोग निरोग और तन्दुरुस्त रहते थे, जिसके कारण उनका बाहुबल बेजोड़ था। और यही लोग नगर की सुरक्षा के लिए श्रेष्ठ आर्मी भी बने।
अब बात करते हैं कि मधुरापुरी का टाउन प्लानिंग कैसा था। मधुरापुरी में जनता के लिए सुन्दर और वेल-स्ट्रक्चर्ड घर बनवाए गए। उस नगर में सुन्दर चौराहे थे। नगर में बाज़ारों का स्थान अलग था, यानी कि रेजिडेंशियल और कमर्शियल लोकैलिटीज़ अपनी-अपनी जगह पर थीं। इसके अतिरिक्त शत्रुघ्न जी ने अनेकानेक उद्यान और विहारस्थल यानी कि पार्क और पिकनिक स्पॉट्स भी बनवाए।
जब लवणासुर उस नगर में राज करता था, तब उसने विशाल भवन बनाए थे। कदाचित, उस दैत्य ने अपनी साइज को ध्यान में रखते हुए उनको खूब बड़ा बनवाया था, जो कि आम प्रजा के रहने के काम तो नहीं ही आने वाले थे। शत्रुघ्न जी ने उन विशाल स्ट्रक्चर्स को तुड़वाया नहीं। उन्होंने उन भवनों को पेंट करवा दिया और उनमें अलग-अलग प्रकार के सुन्दर चित्र बनवाए। आज के कॉन्टेक्स्ट में हम ऐसी जगह को म्यूजियम कहेंगे या फिर वहाँ पर गुरुकुल भी चलते होंगे।
मधुरापुरी के बाज़ारों में केवल लोकल्स ही बिज़नेस नहीं करते थे, वहाँ पर दूसरे नगरों और देशों से आए हुए बिजनेसमैन भी अपना व्यवसाय करते थे। तो हमने देखा कि मधुरापुरी में शत्रुघ्न जी ने एग्रीकल्चर, कमर्शियल, हेल्थ, रीक्रेएशन स्पॉट्स, नॉलेज हब्स जैसी छोटी से छोटी चीज़ों को ध्यान में रखते हुए उसे बसाया।
मधुरापुरी को बसाने और उसमें भी उसको सेल्फ़-सस्टेनेबल बनाने में शत्रुघ्न जी को बारह वर्ष लग गए। और यही मधुरापुरी श्री कृष्ण की जन्मस्थली और आज के दिन की मथुरा है। मधुरापुरी से मधुरा और फिर मथुरा बनी।
तो इस तरह से मथुरा को सुन्दर और एक सशक्त नगर के रूप में बसाने के पश्चात् शत्रुघ्न जी वहाँ के सबसे पहले राजा बने। और आने वाले दिनों में यही मथुरा यदुवंशियों की सबसे मुख्य नगरी बनी, जिस भूमि पर उग्रसेन और उनके पुत्र कंस ने भी राज किया और आगे चलकर श्री कृष्ण ने जन्म लिया।





