Chapter 1: धर्मांतरण के उदाहरण और जोशुआ
शुरुआत करते हैं राजस्थान के भरतपुर जिले की एक घटना से। पिछले साल की बात है। भरतपुर के एक घर में पुलिस ने रेड मारी और 28 लोगों को गिरफ्तार किया। उस घर में उस समय करीब 100 लोग थे, जो उसी गांव के थे। इन्हें 500 रुपये देकर वहां बुलाया गया था और हर महीने 10000 रुपये का लालच देकर ईसाई धर्म कबूलने का लालच दिया जा रहा था।
आप सोचिये! हर महीने 10000 रुपये किसी गरीब परिवार के लिए एक ठीक-ठाक रकम है। वह गरीब हिन्दू कम से कम एक बार तो जरूर सोचेगा।
एक और घटना है। करीब 3-4 साल पहले आंध्र प्रदेश के एक चर्च के पादरी को गिरफ्तार किया गया। उस एक अकेले व्यक्ति ने आंध्र प्रदेश के 700 गाँवों को क्राइस्ट विलेज बना दिया। यानि 700 गांवों में लगभग हर व्यक्ति को उसने ईसाई बना दिया था।
ऐसी लाखों कहानियां हैं, जिन्हे लिखते-लिखते मैं और पढ़ते-पढ़ते आप थक जाएंगे।
भारत शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ बहुसंख्यक धार्मिक समूह यानी हिन्दुओं के सामने धर्मांतरित होने का खतरा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी कहा है कि अगर धर्मान्तरण की यह गतिविधियां ऐसे ही चलती रहीं, तो एक दिन मजोरिटी इस देश में माइनॉरिटी बन जाएगी।
पहाड़ों से लेकर तटीय इलाकों तक, पूरे भारत में धर्मान्तरण की यह जो बाढ़ आई है, इसका सिर्फ एक ही कारण है और वह है जोशुआ प्रोजेक्ट।
Chapter 2: जोशुआ प्रोजेक्ट क्या है?
आप कल्पना करिये, एक ऐसी किताब की, जिसमे आपके गाँव, आपके परिवार, आपकी भाषा और आपके धर्म इन सब का पूरा डाटा है। लेकिन यह किताब आपके मंदिर में या फिर आपके स्कूल में नहीं रखी, बल्कि अमेरिका के कोलोराडो स्प्रिंग्स में एक संस्था के ऑफिस में रखी हो। और उसी आर्गेनाईजेशन का नाम है जोशुआ प्रोजेक्ट।
इस संस्था की स्थापना 1995 में की गई। इसका दावा है कि यह संगठन बाइबिल के ‘ग्रेट कमीशन’ यानी पूरी दुनिया को ईसाई बनाने के उद्देश्य पर काम करता है। आप ये बात उनकी वेबसाइट पर जाकर देख सकते हैं। ये लोग खुलकर अपना एजेंडा बता रहे हैं।
जोशुआ प्रोजेक्ट के पास एक बहुत बड़ा डेटाबेस है, जो दुनिया भर के लोगों को अलग-अलग समूहों में बांटता है। जिस तरह से भारत में आइडेंटिफिकेशन के लिए अनेक जातियां हैं, उसी तरह जोशुआ ने भी आइडेंटिफिकेशन के लिए दुनिया भर के लोगों को अलग-अलग समूहों में बाँट रखा है। आप जब इनकी ही वेबसाइट पर लिखी हुई बातों को पढ़ेंगे, तो आप पाएँगे कि ये लोग साफ़-साफ़ लिख रहे हैं कि इन्होंने कन्वर्जन के उद्देश्य से लोगों को समूहों में बांटा है। इन्हीं समूहों को लक्षित करके ये धर्मान्तरण करते हैं।
फ़िलहाल जोशुआ प्रोजेक्ट 10/40 एजेंडा पर कार्य कर रहा है। यह मैप देखिये। वर्ल्ड मैप का यह हिस्सा, इक्वेटर के नॉर्थ में 10 डिग्री अक्षांश से लेकर 40 डिग्री अक्षांश तक फैला है। जोशुआ प्रोजेक्ट एक तरह से युद्ध स्तर पर इन्हीं इलाकों में काम कर रहा है। 10 से लेकर 40 डिग्री अक्षांश तक फैले होने के कारण ही इस एजेंडे को 10/40 एजेंडा कहा गया। इसे “रेसिस्टेंट बेल्ट” कहा जाता है, क्योंकि यहाँ हिंदू, मुस्लिम और बौद्ध धर्मों का प्रभुत्व है। जोशुआ प्रोजेक्ट इन इलाकों को पूरी तरह ईसाई बनाना चाहता है।
Chapter 3: जोशुआ प्रोजेक्ट का छिपा हुआ उद्देश्य
जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट जब आप देखेंगे, तो ये लोग यह कहते हुए दिखेंगे कि इनका उद्देश्य पूरी दुनिया में प्रार्थना और सेवा को बढ़ाना है। यह सिर्फ ऊपरी बातें हैं। 2004 में जब भारत के कई इलाकों में सुनामी आई थी, तो बड़े स्तर पर ईसाई मिशनरियों ने तथाकथित सेवा का काम किया था। लेकिन उस सेवा के बदले इन्होंने उस पूरे इलाके में न सिर्फ लोगों को ईसाई धर्म में कन्वर्ट किया बल्कि हिंदुओं के प्रति घृणा भी फैलाई।
यहां तक कहा गया कि 2004 की सुनामी इसलिए आई क्योंकि हिंदू मूर्ति पूजा करते हैं। कुछ लोगों ने तो आगे बढ़कर यहां तक कह दिया कि 2004 की सुनामी इसलिए आई क्योंकि हिंदुओं ने 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया था। कई इलाकों से तो यह भी खबर आई कि जिन लोगों ने धर्म परिवर्तन से इनकार कर दिया, उन लोगों तक राहत-बचाव का कोई लाभ मिशनरियों ने नहीं पहुंचाया। यह है इनकी सेवा और प्रार्थना की संस्कृति। सेवा करने का जो इनका दिखावा है, उसके पीछे इनका क्या मकसद है, वो आज पूरी दुनिया में दिख रहा है।
दरअसल, जोशुआ प्रोजेक्ट को अमेरिकी संगठनों से भारी फंडिंग मिलती है। 1995 में जोशुआ प्रोजेक्ट शुरू हुआ, और इसके 3 साल के अंदर 1998 में अमेरिकी सरकार ने यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) की स्थापना की, जो भारत जैसे देशों पर धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर दबाव डालता है।
आप USCIRF की वेबसाइट देखिये। उसमें आपको यह दिखेगा कि अमेरिकी सरकार ने रिलीजियस फ्रीडम के मुद्दे पर भारत को स्पेशल कंसर्न लिस्ट में रखा है। भारत, जिसकी आत्मा में धर्मनिरपेक्षता है, जिसने कभी किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया, जहाँ मेजॉरिटी से ज्यादा अधिकार रिलिजियस माइनॉरिटी के पास है, उस भारत को ये लोग स्पेशल कंसर्न की तरह देखते हैं।
Chapter 4: भारत में जोशुआ प्रोजेक्ट कैसे काम करता है?
यदि भारत में जोशुआ प्रोजेक्ट की बात की जाए, तो भारत के लोगों को भी इसने 2272 समूहों में बांटा है।
इनकी वेबसाइट पर दिए नक़्शे में आपको कई सारे लाल, पीले और कुछ हरे बिंदू भी देखने को मिलेंगे। हरे बिंदू यह बताते हैं कि इन इलाकों में जोशुआ प्रोजेक्ट के तहत लोगों को पूर्ण रूप से ईसाई बनाया जा चुका है। पीले बिंदू यह बताते हैं कि इन इलाकों में अधिकांश लोगों को ईसाई बनाया जा चुका है, बाकी जो बचे हुए लोग हैं, उनको भी देर-सबेर ईसाई बना दिया जाएगा। लाल बिंदू यह बताते हैं कि इन क्षेत्रों में रह रहे समूह यानी जातियां, अभी वास्तविक पहुँच से बाहर हैं, यानी इसमें धर्मान्तरण हो तो रहा है, लेकिन इतने बड़े स्तर पर नहीं हो रहा।
जोशुआ प्रोजेक्ट का काम करने का तरीका बिलकुल सेनाओं की तरह है। ये लोग सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों, जैसे अनुसूचित जातियों और जनजातियों इत्यादि को निशाना बनाते हैं।
जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट पर भारत के सेक्शन में आप देख सकते हैं कि अलग-अलग समूहों में लोगों को बाँटा गया है। भारत की पूरी जनसंख्या को इन लोगों ने 2272 समूहों में बाँटा है।
भारत को जिन समूहों में इन लोगों ने बाँटा है, उनमें से एक ग्रुप है मुंडा। मुंडा जनजाति के बारे में हम सभी जानते हैं कि वह देश की सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है। मुंडा जनजाति की सारी जानकारी जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध है। जिसमें यह बताया गया है कि दुनिया भर में उनकी जनसंख्या लगभग 42 लाख है, जिनमें लगभग 41 लाख जनसंख्या भारत में निवास करती है। यह जनजाति मूल रूप से तो हिंदू है, लेकिन उसमें से 20 प्रतिशत से भी ज्यादा जनसंख्या को इन लोगों ने ईसाई धर्म में धर्मान्तरित करा लिया है।
ऐसी छोटी से लेकर बड़ी जानकारी तक इन लोगों ने भारत की हर जाति के बारे में रखी है। किसकी कितनी जनसंख्या है, उस जनसंख्या के कितने लोगों तक यह लोग अब तक पहुंच पाए हैं, कितने लोग अब तक ईसाई बन चुके हैं। यह सारी चीज आपको इस वेबसाइट पर मिलेगी। भारत की संस्कृति के खिलाफ जो छद्म युद्ध चल रहा था, वह अब छद्म नहीं रहा। अब ये लोग खुलकर सामने आ गए हैं।
आपमें से कई लोगों ने तो इनके काम करने की शैली भी देखी होगी। ये लोग हर गांव में कुछ लोगों को चुनते हैं, उन्हें प्रशिक्षण देते हैं फिर उन्हें लक्ष्य भी देते हैं कि इतने लोगों को आपको धर्मान्तरित कराना है। ये लोग यह काम मुफ्त में नहीं करते, बल्कि धर्मान्तरित करने वाले और कराने वाले, दोनों को ये लोग पैसे भी देते हैं।
दैनिक भास्कर की एक ग्राउंड रिपोर्ट आई थी, जिसके अनुसार मदन तिग्गा नाम के एक ईसाई प्रचारक ने यह बताया कि ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले लोगों को ₹2000 हर महीने मिलते थे, जिसका चेक विदेश से आता था।
इसके अलावा जोशुआ प्रोजेक्ट ने कई चर्च में पादरी भी नियुक्त कर रखे हैं, जिन्हें वे ₹20000 महीने तक सैलरी देते हैं। इनके कई स्कूल चल रहे हैं। उन स्कूलों में प्रिंसिपल्स को ये ₹1,00,000 महीने तक देते हैं। जोशुआ प्रोजेक्ट 4 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को लक्षित करता है। स्कूलों और अनाथालयों में बाइबिल की शिक्षा दी जाती है, ताकि बच्चे छोटी उम्र में ही प्रभावित हो सकें।
Chapter 5: भारत पर जोशुआ प्रोजेक्ट का प्रभाव
भारत में अब तक 6 करोड़ से अधिक लोगों तक जोशुआ प्रोजेक्ट की पहुंच हो चुकी है। और अभी भी हर साल लाखों लोग इस प्रोजेक्ट के प्रभाव में आकर ईसाई धर्म अपना रहे हैं।
भारत में हिंदुओं का धर्मान्तरण तो हो ही रहा है। यह प्रभाव तो सबको दिख रहा है, लेकिन जो चीजे नहीं दिख रही हैं, उन पर प्रकाश डालना बहुत जरूरी है।
जोशुआ प्रोजेक्ट एक बहुत ही शातिर एजेंडे के तहत काम कर रहा है। भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में से अधिकांश राज्यों की आदिवासी परंपराएं आज पूरी तरह से विलुप्त हो चुकी हैं। आदिवासी संस्कृति जो कभी भारत की पहचान हुआ करती थी, आदिवासियों के ग्राम देवता, जिन्हें वे कभी पूजा करते थे, उनकी जगह आज गिरिजाघरों ने ले ली है, पादरियों ने ले ली है। कुछ क्षेत्रों में तो मिशनरियों ने आदिवासी जमीनों पर अवैध रूप से चर्च भी बनाए हैं।
जहां जोशुआ प्रोजेक्ट सीधे तौर पर हिंदुओं को धर्मान्तरित नहीं कर पा रहा, वहां पर यह अप्रत्यक्ष तौर पर हिंदुओं को धर्मान्तरित रहा है। भोले-भाले गरीब हिन्दु, जब अपना हिंदू धर्म छोड़ने को तैयार नहीं हो रहे हैं, तो उनको लालच देकर ये लोग जीसस को ही हिंदू देवताओं का एक अवतार बनाकर पूजने पर मजबूर कर रहे हैं। कई जगहों पर जीसस चालीसा, जीसस आरती और जीसस के मंदिर जैसी चीज़ें भी देखने को मिल रही हैं।
इनका सिर्फ एक ही एजेंडा है कि आप किसी भी तरह से हिंदू धर्म के देवी देवताओं को छोड़कर जीसस को पूजना शुरू करिए, उनको फॉलो करना शुरू करिए। यही कारण है कि हिंदुओं में क्रिप्टो क्रिश्चियन की संख्या भी बढ़ती जा रही है।
भारत में ऐसे अनेक लोग हैं जो नाम से, पहचान से, रहन-सहन से तो हिंदू हैं, लेकिन गुप्त रूप से वे लोग ईसाई बन चुके हैं और ईसाई प्रथाओं का पालन करने लग गए हैं। ये क्रिप्टो क्रिश्चियन लोग किसी भी सरकारी कामकाज के समय धर्म के सामने तो हिंदू लिख देते हैं, लेकिन वास्तव में ये लोग ईसाई होते हैं। भारत पर यह प्रभाव पड़ा है जोशुआ प्रोजेक्ट का। भारत में 80% हिंदुओं का आंकड़ा एक भ्रम के अलावा और कुछ नहीं है।
Chapter 6: जोशुआ प्रोजेक्ट की फंडिंग, जाति जनगणना और मोदी सरकार का रुख
जोशुआ प्रोजेक्ट की जो गतिविधियाँ हैं, उनको चलाने के लिए बहुत पैसे की जरूरत पड़ती है। जोशुआ प्रोजेक्ट को इतने सारे पैसे दुनिया भर के कई संस्थाओं से आते हैं। साउदर्न बैपटिस्ट कन्वेंशन, वर्ल्ड विज़न, बिली ग्राहम इवेंजेलिकल एसोसिएशन जैसी अनेक संस्थाएं हैं, जो छिपे रूप से जोशुआ प्रोजेक्ट को फंड करती हैं।
भारत सरकार ने हालाँकि NGO के विदेशी चंदे पर रोक लगाई है। FCRA क़ानून भारत में विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था, लेकिन FCRA क़ानून जोशुआ प्रोजेक्ट को पूरी तरह से कंट्रोल नहीं कर पाया, क्योंकि जोशुआ को ज्यादातर पैसा हवाला के माध्यम से आता है।
जिन क्रिप्टो क्रिश्चियन की बात मैंने अभी कुछ देर पहले की, वे लोग भी जमीनी स्तर पर जोशुआ प्रोजेक्ट की फंडिंग को मैनेज करते हैं। इसके अलावा जोशुआ प्रोजेक्ट की वेबसाइट पर भी डोनेशन का ऑप्शन है, जहां से उन्हें पूरी दुनिया से दान मिलता है। इसी डोनेशन के आधार पर, विदेशी चंदो के आधार पर, जोशुआ प्रोजेक्ट पूरे भारत में बड़े स्तर पर धर्मांतरण भी कर रहा है।
सरकारी स्तर के प्रयासों को यदि देखा जाए तो मोदी सरकार ने फ्री राशन योजना के तहत एक हद तक आदिवासियों और गरीबों को मुफ्त में राशन देकर उन्हें मिशनरियों के चंगुल में जाने से बचाया है। वैसे तो मुफ्त राशन योजना को सिर्फ खान-पान से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका एक बड़ा प्रभाव देश के आदिवासी इलाकों में और गरीब इलाकों में देखने को मिला है कि केवल चावल की एक बोरी देकर हिंदुओं को धर्मान्तरित करा लेने वाले लोग अब यह काम नहीं कर पा रहे, क्योंकि सरकार सबको मुफ्त में चावल और गेहूं दे रही है।
सरकार के स्तर पर दूसरा प्रयास यह किया गया है कि अनेक ऐसे NGO पर बैन लगाया गया है, जो विदेशी चंदे से भारत में धर्मांतरण का काम करते थे।
हालांकि इन सरकारी प्रयासों के बावजूद अभी भी भारत के अनेक इलाकों में धर्मांतरण हो रहा है और वह सिर्फ इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि धोखाधड़ी करके धर्मांतरण करने वालों के विरुद्ध भारत के पास राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस कानून नहीं है। इसके अलावा अनेक राजनितिक दलों के द्वारा इन्हे संरक्षण भी किया जाता है।
कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि भारत में अनेक राजनीतिक दलों के द्वारा जो लगातार जाति जनगणना कराए जाने की मांग उठी थी, उसके पीछे भी कहीं न कहीं जोशुआ प्रोजेक्ट की फंडिंग जिम्मेदार थी। जोशुआ प्रोजेक्ट ने भारत की सारी जातियों को पहले ही कई समूहों में बांट रखा है। जब इन जातियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और इन जातियों की छोटी से लेकर हर बड़ी जानकारी तक सार्वजनिक होगी, तो जाहिर सी बात है जोशुआ प्रोजेक्ट के लिए वो जानकारियाँ बड़ी महत्वपूर्ण हो जाएँगी।
जाति जनगणना जैसे उपाय, जो सामाजिक न्याय के लिए किये जा रहे हैं, वे जोशुआ प्रोजेक्ट जैसे संगठनों के लिए एक अवसर बन सकते हैं। चाहे हम अनपढ़ हों या विद्वान, हमें इस खतरे को समझना होगा। हमें अपनी परंपराओं को बचाना होगा, अपनी एकता को मजबूत करना होगा और अपने बच्चों को अपनी सांस्कृतिक विरासत की कीमत सिखानी होगी।
सरकार को भी FCRA को और सख्त करना होगा। डिजिटल फंडिंग पर नजर रखनी होगी और जागरूकता अभियान चलाने होंगे। जोशुआ प्रोजेक्ट जैसे संगठनों को रोकने के लिए सिर्फ कानून ही काफी नहीं, इसके लिए एक सामूहिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।




