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Ayodhya to Bengal: राम मंदिर के इतिहास से छेड़छाड़ और मार्क्सवादी षड्यंत्र का पर्दाफाश… श्रीराम के शत्रु कौन?

Summary
इस पॉडकास्ट में अरविंद सिंह अपनी पुस्तक 'इंडियाज रोग हिस्टोरियंस' के माध्यम से चर्चा करते हैं कि कैसे वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या विवाद में तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर राम मंदिर आंदोलन को रोकने का प्रयास किया।

OpIndia के चर्चित पॉडकास्ट शो UnPack with OpIndia के इस विस्तृत एपिसोड में होस्ट नुपुर शर्मा और राहुल रौशन ने लेखक अरविंद सिंह के साथ उनकी पुस्तक India’s Rogue Historians पर गहन चर्चा की। एक घंटे से अधिक लंबे इस पॉडकास्ट में अयोध्या आंदोलन, राम मंदिर विवाद, वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका, नेहरूवादी इतिहास लेखन, पी.वी. नरसिम्हा राव की राजनीतिक रणनीति और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी प्रक्रिया जैसे कई संवेदनशील विषयों पर विस्तार से बातचीत हुई।

पॉडकास्ट की शुरुआत अरविंद सिंह ने इस सवाल से की कि आखिर राम मंदिर निर्माण के बाद भी इस पूरे संघर्ष को दस्तावेज़ित करना क्यों आवश्यक था। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज में एक ऐतिहासिक जड़ता आ गई है, जहां लोग मान बैठे हैं कि मंदिर बन गया, अब आगे बढ़ जाना चाहिए। लेकिन उनके अनुसार यह केवल एक धार्मिक आंदोलन नहीं था, बल्कि भारत के बौद्धिक, कानूनी और वैचारिक संघर्ष का भी हिस्सा था। नुपुर शर्मा और राहुल रौशन ने इस दौरान उनसे पूछा कि आखिर इस संघर्ष का सबसे बड़ा विरोधी कौन था। इस पर अरविंद सिंह ने बताया कि हिंदुओं की सबसे बड़ी चुनौती इस्लामी कट्टरता नहीं, बल्कि भारत का वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग रहा है, जिसने “कंपोजिट कल्चर” और सेक्युलरिज्म के नाम पर हिंदुओं के ऐतिहासिक बोध और आत्मबोध को कमजोर किया।

चर्चा का बड़ा हिस्सा पूर्व प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव की भूमिका पर केंद्रित रहा। आम धारणा के विपरीत अरविंद सिंह ने बताया कि नरसिम्हा राव राम मंदिर आंदोलन के प्रति सहानुभूतिपूर्ण नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि राव सरकार ने वीएचपी के समानांतर “रामालय ट्रस्ट” बनाकर हिंदू संतों और संगठनों के बीच विभाजन पैदा करने की कोशिश की। राहुल रौशन ने जब ६ दिसंबर १९९२ की घटनाओं के कानूनी पक्ष पर सवाल पूछा, तब अरविंद सिंह ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में लंबित फैसले का उल्लेख किया। उनके अनुसार, यदि ४ दिसंबर को अदालत का फैसला समय पर आ जाता तो कारसेवकों को कानूनी रास्ता मिल सकता था और बाबरी ढांचा गिरने से बच जाता।

अरविंद सिंह ने यह भी बताया कि फैसले से ठीक पहले बेंच के मुस्लिम जज के छुट्टी पर चले जाने और केंद्र सरकार के वकील के अदालत में उपस्थित न होने से पूरा मामला टल गया। नुपुर शर्मा और राहुल रौशन ने इस दौरान पूछा कि क्या इसके प्रमाण मौजूद हैं, जिस पर अरविंद सिंह ने विभिन्न कानूनी दस्तावेज़ों और आयोगों की रिपोर्टों का हवाला दिया। उन्होंने यह भी कहा कि ६ दिसंबर की रात को कथित तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से अयोध्या प्रशासन को अस्थायी राम मंदिर हटाने के निर्देश दिए गए थे।

पॉडकास्ट में सुप्रीम कोर्ट और डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की कानूनी दलीलों पर भी चर्चा हुई। अरविंद सिंह ने कहा कि लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा कि केंद्र सरकार बिना सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के भी गैर-विवादित जमीन हिंदुओं को लौटा सकती थी, लेकिन २००३ के सुप्रीम कोर्ट आदेश ने ऐसा करने पर रोक लगा दी थी। उनके अनुसार, मोदी सरकार द्वारा 2017 में दायर की गई याचिका ही वह निर्णायक मोड़ बनी, जिसने सुप्रीम कोर्ट को मुख्य विवाद की रोजाना सुनवाई शुरू करने के लिए बाध्य किया।

नुपुर शर्मा और राहुल रौशन ने बातचीत के दौरान वामपंथी इतिहासकारों की भूमिका पर भी विस्तार से सवाल किए। अरविंद सिंह ने आरोप लगाया कि कई प्रमुख इतिहासकारों ने अदालत में तथ्यों के बजाय वैचारिक दृष्टिकोण रखा। उन्होंने पुरातत्वविद् धनेश्वर मंडल की तथाकथित “बाढ़ थ्योरी” का जिक्र किया, जिसमें दावा किया गया था कि प्राचीन अयोध्या बाढ़ से नष्ट हो गई थी। अरविंद सिंह ने कहा कि अदालत में जब इस दावे के प्रमाण मांगे गए तो स्पष्ट जवाब नहीं दिया जा सका।

चर्चा के दौरान रोमिला थापर, इरफान हबीब, आर.एस. शर्मा और बिपिन चंद्र जैसे इतिहासकारों का भी उल्लेख हुआ। अरविंद सिंह का आरोप था कि इन इतिहासकारों ने अदालत में प्रत्यक्ष जिरह से दूरी बनाए रखी और उनके सहयोगियों ने स्वीकार किया कि कई दावे व्यक्तिगत “ओपिनियन” पर आधारित थे, स्वतंत्र शोध पर नहीं। राहुल रौशन ने इस दौरान सवाल उठाया कि क्या इतिहास लेखन और राजनीतिक विचारधारा के बीच की रेखा भारत में पूरी तरह धुंधली हो चुकी है। इस पर अरविंद सिंह ने कहा कि स्वतंत्र भारत में इतिहास लेखन का बड़ा हिस्सा वैचारिक एजेंडे से प्रभावित रहा।

पॉडकास्ट में जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक दृष्टि और तथाकथित “नेहरूवादी मानसिकता” पर भी चर्चा हुई। अरविंद Singh ने आरोप लगाया कि नेहरू ने अपनी पुस्तक Discovery of India में महमूद गजनवी और बाबर जैसे आक्रमणकारियों को अपेक्षाकृत नरम दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया और मंदिर विध्वंस के कई ऐतिहासिक प्रसंगों को कमतर करके दिखाया। नुपुर शर्मा ने इस दौरान कहा कि इतिहास की प्रस्तुति ने कई पीढ़ियों की मानसिकता को प्रभावित किया है।

राजनीतिक चर्चा के दौरान अरविंद सिंह ने स्पष्ट कहा कि यदि २०१४ में नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में नहीं आती, तो राम मंदिर का निर्माण संभव नहीं होता। उनके अनुसार मोदी सरकार की कानूनी रणनीति और राजनीतिक इच्छाशक्ति ने सुप्रीम कोर्ट पर समयबद्ध निर्णय का दबाव बनाया। राहुल रौशन ने इस दौरान पूछा कि क्या कांग्रेस कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रास्ते पर लौट सकती है। इस पर अरविंद सिंह ने कहा कि वर्तमान कांग्रेस पूरी तरह वामपंथी और “वोक” विचारधारा के प्रभाव में आ चुकी है और उसके लिए अब हिंदुत्व या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर लौटना लगभग असंभव है।

पूरे पॉडकास्ट में नुपुर शर्मा और राहुल रौशन लगातार अरविंद सिंह से दस्तावेज़ों, कोर्ट रिकॉर्ड और ऐतिहासिक दावों पर सवाल पूछते रहे, जिससे बातचीत केवल वैचारिक न रहकर तथ्यात्मक और कानूनी आयाम भी लेती रही। यह एपिसोड मुख्य रूप से इस दावे के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा कि स्वतंत्र भारत में इतिहास लेखन, राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के एक बड़े हिस्से ने दशकों तक राम मंदिर आंदोलन को रोकने का प्रयास किया और यह संघर्ष केवल धार्मिक नहीं बल्कि वैचारिक व बौद्धिक लड़ाई भी था।

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