सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक खबर तेजी से वायरल हो रही थी कि उत्तर प्रदेश में सिर्फ 5 दिनों के भीतर हीटवेव की वजह से 8,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई। यह दावा सुनने में बेहद चौंकाने वाला लगता है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस दावे का आधार क्या था? और क्या वास्तव में इतने लोगों की मौत दर्ज हुई थी?
वायरल दावे की जड़ में कौन-सी स्टडी थी?
इस पूरे दावे का आधार एक रिसर्च पेपर था, जिसका नाम ‘Estimating Heatwave Mortality in India’ है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसी स्टडी का हवाला देते हुए दावा किया कि उत्तर प्रदेश में हजारों लोगों की मौत हुई है।
लेकिन, जब इस स्टडी को विस्तार से देखा जाता है तो पता चलता है कि यह वास्तविक मृत्यु आंकड़ों (Actual Death Data) पर आधारित नहीं थी। बल्कि, यह एक मॉडलिंग और अनुमान (Estimation) पर आधारित अध्ययन था।
10 शहरों के डेटा से 765 जिलों का अनुमान
स्टडी के शोधकर्ताओं ने भारत के केवल 10 शहरों के पुराने डेटा का इस्तेमाल किया। इन शहरों में हीटवेव के दौरान मृत्यु दर का जो पैटर्न देखा गया, उसे जलवायु समानता (Climate Similarity) के आधार पर पूरे देश के 765 जिलों पर लागू कर दिया गया।
यहीं सबसे बड़ी समस्या सामने आती है। किसी जिले की जलवायु भले ही अहमदाबाद या जयपुर जैसी हो, लेकिन वहां की स्वास्थ्य सुविधाएं, आय स्तर, बिजली की उपलब्धता, आवासीय स्थिति और जीवनशैली पूरी तरह अलग हो सकती है। ऐसे में केवल मौसम की समानता के आधार पर मृत्यु दर का अनुमान लगाना कई सवाल खड़े करता है।
इतना ही नहीं, स्टडी ने हीटवेव की परिभाषा भी भारतीय मौसम विभाग (IMD) की आधिकारिक परिभाषा के अनुसार नहीं ली। शोधकर्ताओं ने हीटवेव को ऐतिहासिक तापमान रिकॉर्ड के 97वें परसेंटाइल के आधार पर परिभाषित किया।
18,000 से 43,000 मौतों की रेंज और फिर खबर का गायब होना
इस स्टडी की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि स्वयं शोधकर्ताओं ने लिखा है कि 5 दिनों की हीटवेव के दौरान पूरे देश में अतिरिक्त मौतों की संख्या 18,000 से 43,000 के बीच हो सकती है।
यानी लगभग 25,000 मौतों की अनिश्चितता (Uncertainty Range) मौजूद है। यह कोई छोटा अंतर नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि पूरा निष्कर्ष वास्तविक दर्ज मौतों पर नहीं, बल्कि कई मान्यताओं और सांख्यिकीय अनुमानों पर आधारित था। दूसरे शब्दों में कहें तो कहानी कुछ ऐसी थी—‘अगर ये परिस्थितियां थीं, तो शायद इतनी मौतें हुई होंगी।’
दिलचस्प बात यह भी है कि जिस खबर को सबसे पहले प्रमुखता से चलाया गया था, उसे बाद में India Today ने हटा दिया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब स्वयं स्टडी अनुमान आधारित थी और उसमें इतनी बड़ी अनिश्चितता मौजूद थी, तब उसे अंतिम सत्य की तरह पेश करना कितना उचित था? और यही वजह है कि जब बिना पूरी पद्धति समझे ऐसे दावों को आगे बढ़ाया जाता है, तो आलोचक एक बार फिर मोहम्मद ज़ुबैर को उनके चर्चित सोशल मीडिया उपनाम ‘LKFC’ से याद करने लगते हैं।





