यूपीए सरकार के दौरान आई एक रिपोर्ट में नक्सलियों को राजनीतिक पार्टी बनाने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट में उनके खिलाफ कड़ा एक्शन लेने से मना किया गया था और उन्हें बसपा, सपा और डीएमके जैसा दर्जा देने की बात कही गई थी। यह सब तब हो रहा था, जब नक्सली लगातार देश के एक बड़े हिस्से में अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे।
मैं आपको एक छोटा सा टास्क देता हूं। आपको अपने दिमाग में एक काल्पनिक स्थिति तैयार करनी है। स्थिति यह है कि भारत के लगभग 20% हिस्से पर एक ‘Armed Guerrilla Insurgent Group’ कब्जा कर लेता है और वहां उसका राज चलता है। वह अपनी अदालतें लगाता है, लोगों से टैक्स वसूलता है, देश की सुरक्षा एजेंसियों को निशाना बनाता है और हमारे जवानों को बेरहमी से मार देता है। इस विद्रोही गुट का मुखिया खुले तौर पर ऐलान करता है कि हम दिल्ली की सत्ता को उखाड़ फेंकेंगे।
आपने यह स्थिति सोच ली होगी, अब जरा विचार कीजिए कि सरकार को इस समस्या का इलाज कैसे करना चाहिए। स्वाभाविक बात है कि इस संकट का समाधान यही होगा कि सरकार इन लोगों पर सख्त एक्शन ले, इन्हें ढूंढकर ढेर करे और आम जनता को राहत पहुंचाए। लेकिन अगर ऐसा न हो और सरकार के लोग ही कहने लगें कि दिल्ली की सत्ता को उखाड़ फेंकने की बात करने वालों को एक पॉलिटिकल मूवमेंट माना जाए, उन्हें कांग्रेस, बसपा और समाजवादी पार्टी जैसा दर्जा दिया जाए, तो आप क्या कहेंगे?
अब आप इस काल्पनिक स्थिति से बाहर निकलिए और हकीकत के धरातल पर आइए। जिस विद्रोही गुट के बारे में आपने अभी सोचा, उसकी जगह अब नक्सलियों को रख दीजिए। ये वही नक्सली हैं जिन्हें 2009 में विज्ञान भवन के एक कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के लिए सबसे बड़ा आंतरिक सुरक्षा खतरा बताया था। लेकिन इसके बावजूद उन्हें पॉलिटिकल मूवमेंट का दर्जा देने की पैरवी की गई। जिस सरकार की बात मैं कर रहा हूं, वह यूपीए की सरकार है और यहीं से मैं आपको एक ऐसा खुलासा बताऊंगा जिससे साफ हो जाएगा कि अब तक नक्सली खत्म क्यों नहीं हुए थे।
सबसे पहले यह जानिए कि उस समय स्थिति कितनी विकट थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जो बयान मैंने आपको बताया, वह ऐसे समय में आया था जब भारत के 126 से भी अधिक जिले माओवादी आतंकवाद की चपेट में थे। तिरुपति से लेकर पशुपति तक कब्जे के लिए वामपंथी हिंसा का तांडव मचा हुआ था। देश के कई हिस्सों में नक्सली अपनी समानांतर सरकार चला रहे थे।
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के एक बड़े इलाके को ‘Red Corridor’ घोषित किया जा चुका था। यहां लोकतांत्रिक भारत की सरकार नहीं, बल्कि वामपंथी आतंकियों की सत्ता चलती थी। माओवादियों के पास अपनी ‘Guerrilla Force’ थी, अपना खुफिया तंत्र और ‘Communication System’ था। टैक्स वसूली से लेकर जन अदालत जैसी कंगारू कोर्ट व्यवस्था वहां काम कर रही थी।
वामपंथी आतंकी दंडकारण्य के जंगलों में ‘Training Centers’ चलाते थे, जहां स्थानीय आदिवासियों को नक्सली आतंकी बनाने के लिए उनका ब्रेनवाश किया जाता था। केवल इतना ही नहीं, माओवादियों ने अपने अवैध हथियारों के कारखाने तक स्थापित कर लिए थे। बिना नक्सलियों की इजाजत के इन इलाकों में परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। माओवादी आतंकी एक तरह से देश के भीतर दूसरा देश चला रहे थे।
लेकिन यूपीए सरकार इस सब के बावजूद 2008 में उन्हें मुख्यधारा में लाना चाहती थी। साल 2008 में योजना आयोग की सिफारिश पर यूपीए सरकार ने देश में नक्सलवाद की समस्या के समाधान के लिए 16 सदस्यों की एक ‘Expert Committee’ बनाई थी। इस कमेटी का काम भारत सरकार को यह रिपोर्ट सौंपना था कि नक्सलवाद के मुख्य कारण क्या हैं और आदिवासियों की असल परेशानियां क्या हैं। इसके अलावा इस कमेटी का मुख्य काम सरकार को यह सुझाव देना था कि इस वामपंथी आतंकवाद को देश से खत्म कैसे किया जाए।
जिस कमेटी को कांग्रेस सरकार ने देश से नक्सली आतंक के खात्मे की योजना बनाने का काम सौंपा था, क्या आप सोच सकते हैं कि उस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को क्या सुझाव दिए होंगे? आपको जानकर हैरानी होगी कि जो नक्सली देश के खिलाफ हथियार उठाकर लड़ रहे थे, इस कमेटी की रिपोर्ट में उन्हें जल, जंगल, जमीन और न्याय की लड़ाई लड़ने वाला मजलूम क्रांतिकारी बता दिया गया।
इस एक्सपर्ट रिपोर्ट के चैप्टर नंबर 4 के पेज नंबर 59 और 60 पर साफ लिखा है कि नक्सलवाद वास्तव में एक पॉलिटिकल मूवमेंट है, इसलिए सरकार को इसे राजनीतिक रूप से ही डील करना चाहिए। यह पैराग्राफ कहता है कि भले ही ये लोग ताकत के दम पर हमारी सत्ता को उखाड़ फेंकने की बात करते हैं, लेकिन इन्हें बराबरी की लड़ाई लड़ने वाला माना जाए। यही नहीं, नक्सलियों का पक्ष लेते हुए आगे लिखा गया है कि जिन परिस्थितियों ने इस आंदोलन को जन्म दिया है, उन पर ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए, न कि खुद नक्सलियों पर।
इस रिपोर्ट के आने के आस-पास ही पत्रकार राहुल पंडित ने ‘Open Magazine’ के लिए तत्कालीन नक्सली सरगना मुपल्ला लक्ष्मण राव का इंटरव्यू किया था। लक्ष्मण राव उर्फ गणपति ने इस इंटरव्यू में खुलकर कहा था कि कुछ भी हो जाए, हम दिल्ली की सत्ता को उखाड़ जरूर फेंकेंगे।
यानी जिस समय नक्सली इस बात को लेकर पूरी तरह अडिग थे कि वे दिल्ली की लोकतांत्रिक सत्ता को उखाड़ना चाहते हैं, ठीक उसी समय यूपीए सरकार चाहती थी कि इन हथियारबंद नक्सलियों को बातचीत की मेज पर बैठाया जाए और इन्हें आम राजनीतिक पार्टियों जैसा दर्जा दे दिया जाए।
लेकिन यूपीए सरकार का यह भ्रम सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं था। इसी रिपोर्ट में आगे जो लिखा है, उसे आप शब्दशः सुनिए, ‘इस आंदोलन के लक्ष्य राजनीतिक हैं, इसलिए इसका समाधान भी राजनीतिक तरीके से ही होना चाहिए। लोकतंत्र में ऐसे मामलों में सबसे अहम तरीका नेगोशिएशन ही होता है। अगर सरकार बातचीत के जरिए कोई समाधान निकालने की कोशिश करती है, तो इससे उन लोगों का भरोसा बढ़ता है जो खुद को व्यवस्था से अलग-थलग महसूस करते हैं। दुनिया भर में विद्रोह या उग्र आंदोलनों से निपटने के लिए अक्सर यही तरीका अपनाया जाता है, क्योंकि इससे संघर्ष में फंसे आम लोगों को कम से कम नुकसान होता है।’
माओवादी आतंकियों की देश के खिलाफ इस जंग को 2008 में पॉलिटिकल मूवमेंट बताने वाली इस कमेटी को क्या 2007 का बीजापुर का रानीबोदली हमला याद नहीं था? 15 मार्च 2007 को बीजापुर के रानीबोदली में माओवादी आतंकियों ने पुलिस कैंप में सो रहे जवानों पर रात के एक बजे कायरतापूर्ण हमला किया था। माओवादियों ने जवानों के कैंप को चारों तरफ से घेरकर आग लगा दी थी।
इस अचानक हुए हमले ने जवानों को संभलने का कोई मौका नहीं दिया। ज्यादातर जवान जिंदा आग में झुलसकर शहीद हो गए और जो अपनी जान बचाकर कैंप से बाहर निकले, उन्हें नक्सलियों ने गोलियों से छलनी कर दिया। इस भीषण हमले में हमारे 55 जवान बलिदान हुए थे। यानी जहां आपकी सुरक्षा एजेंसियों की पूरी बटालियन एक बार में साफ की जा रही थी, वहां सरकार लोकतंत्र, बातचीत और ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसी आदर्शवादी बातें करने में व्यस्त थी।
ऐसा भी नहीं है कि बातचीत का जो रास्ता सुझाया जा रहा था, वह पहले कभी आजमाया नहीं गया था। यह प्रयोग पहले हो चुका था और खुद कांग्रेस ने ही इसे आजमाया था। लेकिन दूध की जली कांग्रेस, एक बार फिर पूरे देश को उसी आग में झुलसाना चाहती थी। साल 2004 के आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में नक्सलियों से बातचीत करने का आधिकारिक वादा किया था।
सरकार बनने के बाद उन्होंने यह बातचीत शुरू भी की। इसके लिए नक्सलियों के टॉप कमांडर अक्की राजू हरगोपाल समेत 11 बड़े नक्सली नेता राजधानी पहुंचे, जहां सरकार ने उनका राजकीय मेहमानों की तरह स्वागत किया। लेकिन नक्सलियों का मकसद कभी बातचीत करना था ही नहीं। उन्होंने कुछ दिनों तक सरकारी मेहमाननवाजी का लुत्फ उठाया और कांग्रेस सरकार को बातचीत के जाल में उलझाए रखा।
इस दौरान सुरक्षा एजेंसियों की नजरों से बचकर वे जंगलों में दोबारा एकजुट हुए, खुद को रणनीतिक रूप से मजबूत किया और पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक होकर हिंसा का नया दौर शुरू कर दिया, जिसमें हजारों बेकसूर लोग मारे गए। हैरानी की बात यह है कि साल 2004 में यह कड़वा सच देखने के बाद भी केंद्र की यूपीए सरकार दोबारा नक्सलियों से सिर्फ बातचीत का ही रास्ता अख्तियार करना चाहती थी।
कांग्रेस उन नक्सलियों को बातचीत की मेज पर लाना चाहती थी जिनका अंतिम लक्ष्य देश की लोकतांत्रिक सत्ता को पलटना था। कांग्रेस उन नक्सलियों से संवाद करना चाहती थी जो इस सिद्धांत में विश्वास रखते हैं कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। लेकिन तुष्टीकरण और भ्रम का यह दौर हमेशा नहीं रहता, और आज जब हम नक्सल मुक्त भारत की दहलीज पर खड़े हैं, तो इस पूरे घटनाक्रम को समझना बेहद जरूरी है।
नक्सली असल में ‘Live by Bullet and Die by Bullet’ की नीति पर चलने वाले लोग हैं, वे सिर्फ ताकत की भाषा ही समझते हैं और मौजूदा सरकार ने उन्हें इसी भाषा में सटीक जवाब दिया है। साल 2023 में सरकार ने 380 नक्सलियों को मार गिराया। इसी तरह 2024 में 287 नक्सली ढेर किए गए और 2025 में 317 नक्सलियों का सफाया किया गया। यानी बीते 3 सालों में ही लगभग 1 हजार नक्सलियों को मार गिराया गया है।
इसके अलावा आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों की संख्या भी हजारों में पहुंच चुकी है। अब तो उनके टॉप कमांडर्स, जैसे सोनू जी और देवू जी जैसे लोग भी अपने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में सामने आ रहे हैं। यह सरेंडर इसलिए हो रहा है क्योंकि उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि अगर आज आत्मसमर्पण नहीं किया, तो सीआरपीएफ और डीआरजी के जवान उन्हें पाताल से भी खोजकर उनके बाकी साथियों के पास पहुंचा देंगे।
हमारी सुरक्षा बलों ने कम्युनिस्टों के शीर्ष सरगना नंबाला केशव राव और उनके हिंसक पोस्टर बॉय हिडमा को ढेर करके यह साफ संदेश दे दिया है कि अब भारत का 33 लाख स्क्वायर किलोमीटर का यह विशाल भू-भाग तुम्हें छिपने की जगह नहीं देगा। चाहे बस्तर के घने जंगल हों या आंध्र प्रदेश की पहाड़ियां, देश के दुश्मनों का खात्मा अब तय है।
आज की सरकार यह नहीं कहती कि इन्हें पॉलिटिकल मूवमेंट मानकर रियायत दी जाए, बल्कि सरकार का सीधा संदेश है कि या तो हथियार छोड़ दो, वरना अंजाम भुगतने के लिए तैयार रहो। अगर नीति में यह स्पष्टता और कड़ाई नहीं लाई जाती, तो साल 2014 में जो नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 126 हुआ करती थी, वह आज घटकर मात्र 11 नहीं रह जाती, और न ही तिरुपति से पशुपति का सपना देखने वाले आज अपनी जान बचाने के लिए सीजफायर की गुहार लगा रहे होते।




