El Nino

क्या होगा भारत पर अल नीनो का असर, राशन ही नहीं बिजली की भी होगी समस्या, हम कितने तैयार?

Summary
नार्थ इंडिया में पानी उन नदियों से आता है जो पहाड़ों से निकलती हैं, ऐसे में शायद उन पर बने हाइड्रो प्लांट्स में ज़्यादा इम्पैक्ट ना दिखे लेकिन सेंट्रल और साउथ इंडिया में जरूर इ स बार ये समस्या होने वाली है।

क्या इस बार मॉनसून के अच्छा ना होने का फ़र्क़ हमारे लिए एक इलेक्ट्रिसिटी क्राइसिस भी लाएगा? ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि कहा गया है कि इस बार मॉनसून अच्छा नहीं होगा। मॉनसून अच्छा ना होने के पीछे अल नीनो का फ़ैक्टर बताया गया है। और इस अल नीनों के चलते सबकी चिंता है इस साल खेती के खराब होने की। 

लेकिन मौसम विभाग के अनुसार अगर बारिश का स्तर 90% ही रहा तो हमारा फ़ूड प्रोडक्शन हिट होगा ही, साथ ही हमारे इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन पर भी फ़र्क़ पड़ने वाला है। लेकिन ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे देश में 51,000 मेगावाट से ज्यादा बिजली हाइड्रो सोर्सेज से बनाई जाती है। 

ये बिजली बनती है बड़े बड़े डैम्स में पानी रोक कर। यानी पहले पानी से रिजर्वायर भरे जाते हैं और फिर बिजली बनती है। अब जब बारिश कम होगी तो ये रिजर्वायर भी कम भरेंगे। इन फैक्ट देश में रिजर्वायर पहले ही काफ़ी लो लेवल पर हैं। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट कहती है कि इस समय देश के 166 बड़े रिजर्वायर 28.28%  ही भरे हैं। 

और आगे जब कमजोर मानसून के चलते बारिश कम होगी तो ये भी पूरे नहीं भरेंगे। इसमें वो बाँध  होंगे जिनके पानी से बिजली बनती है। और अगर इस पर इम्पैक्ट हुआ तो लगभग 10% हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी जनरेशन कैपेसिटी पर इम्पैक्ट पड़ेगा। आप सोच रहे होंगे कि 5000 मेगावॉट बिजली ऑफलाइन हुई भी तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा। 

दरअसल हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी कैपेसिटी बिजली जनरेशन के साथ ही इसलिए भी क्रूशियल है क्योंकि यहाँ बिजली स्टोर हो सकती है और जैसे ही डिमांड बढ़ती है तुंरत बिजली सप्लाई हो सकती है। सोलर जैसे सोर्सेज दिन में तो बिजली दे सकते हैं लेकिन रात को वो ऑफलाइन हो जाते हैं। 

लेकिन रिज़र्वायर्स में भरा पानी  इस्तेमाल करके तुरंत डिमांड के साथ बिजली बनाई जा सकती है। इन फैक्ट यहाँ जब डिमांड कम होती है तो पानी को कई जगह वापस ऊँचे रिज़र्वायर्स में भेज दिया जाता है और जरूरत पर उससे बिजली बनाई जाती है। इसे पंप स्टोरेज प्लांट कहते हैं।

नार्थ इंडिया में पानी उन नदियों से आता है जो पहाड़ों से निकलती हैं, ऐसे में शायद उन पर बने हाइड्रो प्लांट्स में ज़्यादा इम्पैक्ट ना दिखे लेकिन सेंट्रल और साउथ इंडिया में जरूर इ स बार ये समस्या होने वाली है। हम अनाज उगाने को लेकर जरूर चिंतित हैं, लेकिन हमारी एक चिंता ये भी होनी चाहिए। 

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