रवीश कुमार ने पंजाब-परस्ती में पहाड़ियों को बताया ‘निकम्मा और नालायक’

Summary
जब महासागर मंथन हो रहा था, हलाहल और अमृत निकल रहे थे, चौदह रत्न उभर रहे थे, तब एक पन्द्रहवाँ रत्न निकला- रवीश कुमार। कैमरा कंधे पर, माइक हाथ में, माथे पर चमकता एक बैनर- ‘नमस्कार, मैं हूँ छेनू कुमार’। ऐसा रत्न जो केवल आपदाओं को शायरी में बदलता है, उन्हें सुलझाता नहीं है।

कबीरा इस संसार में भाँति भाँति के लोग कुछ तो रवीश कुमार हैं और कुछ बहुतई रवीश कुमार…

क्या आप जानते हैं कि जब बिग बैंग की घटना के बाद धरती के टुकड़े हो रहे थे तो उसमें इतनी सदियाँ क्यों लगी? क्योंकि रवीश कुमार को उस घटना का वीडियो बनाना था और वो अपना माइक कैमरा और ट्राइपॉड घर पर छोड़ आए थे।

जब महासागर मंथन हो रहा था, हलाहल और अमृत निकल रहे थे, चौदह रत्न उभर रहे थे, तब एक पन्द्रहवाँ रत्न निकला- रवीश कुमार। कैमरा कंधे पर, माइक हाथ में, माथे पर चमकता एक बैनर- ‘नमस्कार, मैं हूँ छेनू कुमार’। ऐसा रत्न जो केवल आपदाओं को शायरी में बदलता है, उन्हें सुलझाता नहीं है।

समुद्र मंथन रुका था ताकि एंगजमेंट फार्मर रवीश कुमार उस ऐतिहासिक क्षण को  रिकॉर्ड कर सके। क्योंकि उसके लिए हर घटना और आपदा एक YouTube ट्रेंड है। ऐसी ही और भी कई सारी घटनाएँ हैं जब रवीश कुमार मौके पर जरूरी काम छोड़कर अपने कैमरा और वीडियो की ठरक के साथ फोरप्ले करने बैठ गए थे लेकिन वो थोड़ा अंदरूनी मामला हो जाएगा।

बंगलादेश से लेकर गाजा तक… हर त्रासदी उसकी एंगेजमेंट फार्मिंग का हिस्सा बनती है। उन्होंने अपनी सुराही जैसी गर्दन की सैटेलाइट भारत की तरफ़ मोड़ी और कुछ वो राज्य पकड़े जहाँ आजकल बाढ़ और आपदा आ रही हैं। इन आपदाओं के विश्लेषण में रवीश कुमार अपना गर्दभगान करते हुए पंजाब और उत्तराखंड के लोगों के बीच एक कमाल की लाइन खींचते हैं और कहते हैं कि पंजाब के लोग तो आपदा में एक दूसरे  की मदद कर रहे हैं लेकिन उत्तराखंड के लोग ऐसा नहीं कर रहे। तुलना भी उस पंजाब से हो रही है जिसका CM ख़ुद अस्पताल में लेटा हुआ है आपदा में। रवीश कुमार का दर्द है कि आपदाएँ आ रही हैं तो वीडियो क्यों नहीं बनाते उत्तराखंड वाले?

इस रवीश कुमार को कोई सोफा दो बैठकर इंगेजमेंट खेती करने के लिए, क्योंकि खड़े खड़े वीडियो बनाकर इसके उन जगहों पर दर्द होने लगा है जहाँ से ये सोचता है और फिर वीडियो बनाता है। और दिमाग़ पर औक़ात से ज़्यादा ज़ोर डालने के कारण उसके सम्पाती/त्रिजटा जैसी शक्ल पर चेहरे की चमड़ी उसके जबड़े से ऐसे चिपक गई है जैसे आपदा के मलवे से निकली सूखी मिट्टी की परत घर की दीवारों पर चिपक जाती है।

क्या रवीश कुमार यही इंसेंसिटिविटी कोसी की बाढ़ के पीड़ितों के लिए दिखाएँगे जहाँ पर किसी बाढ़ में तो नदी के बहाव की दिशा ही बदल जाती है। सोचिए कितना नुकसान होता होगा। लेकिन रवीश तब वीडियो बनाने नहीं जाएगा जब वहाँ कोसी खतरे के निशान से ऊपर बह रही हो। रवीश तो लालू यादव के पीकदान में थूक का लेवल कितना ऊपर-नीचे हुआ है- उस पर वीडियो बनाएगा और अगर वो पीकदान खतरे के निशान से ऊपर बह रहा हूँ तो वो उसे चाटकर के खतरे को टाल देगा ताकि M-Y-पिछडा-दलित और महादलित का समीकरण उस बाढ़ में बह ना जाए।  एक भूमिहार होने के नाते छेनू की ये नैतिक जिम्मेदारी भी बनती ही है। कुछ दिन रुक जाइय, अभी बिहार के चुनाव में जाकर के फिर से लोगों से पूछ रहा होगा कि कौन जात हो?

इस आदमी को कोई बताए कि उत्तराखंड के लोग आपदाओं के आने पर वीडियो नहीं बनाते बल्कि वो तो सीटी बजाते हैं, एक दूसरे को बताते हैं कि “येपड़ी बैका…. अबे देख बे देख पूरा पहाड़ आ गया नीचे भैंकर की” और उसके बाद वो जायजा लेते हैं कि नुकसान कितना हुआ होगा। और हम लोग ऐसा इसलिए नहीं करते कि हमें अपने नुकसान की परवाह नहीं होती।

हम लोग ऐसा इस कारण से करते हैं क्योंकि इस किस्म के नुकसान हमारी दिनचर्या है। मोबाइल, और कैमरा या वीडियो ने पहाड़ियों को पहाड़ जैसा नहीं बनाया है बल्कि हमारी उस कठिन जिंदगी ने बनाया है जिसमें हमें रोज़ ही इस बात को लेकर के चिंतित रहना होता है कि कब कौनसा खेत और पहाड़ दरक जाए और कौनसा रास्ता उनके स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल की कनेक्टिविटी को तोड़ दे, हम इसी कैलकुलेशन में रात गुज़रते हैं बारिश के मौसम में। और जब अगली सुबह उठकर देखते हैं कि उतना नुकसान नहीं हुआ तो उसे ही हम अपनी लग्जरी मानते हैं। हम जैसे उत्तराखंड के पहाड़ी कभी रास्तों की परवाह नहीं करते क्योंकि वो रास्ते बनान जानते हैं। रवीश कुमार जैसों के लिए उत्तराखंड की आपदा या बादल का फटना सिर्फ इसलिए थ्रीलिंग एक्सपीरियंस होता है क्योंकि ऐसा करने से उन्हें एक और वीडियो बनाने का मकसद मिल जाता है।

ऐसे कई वीडियो भी सोशल मीडिया पर हैं ही जहाँ लोग एक दूसरे की मदद के लिए मलवे के बीच कूद जाते हैं और कंधों पर उठाकर लोगों को बचाते हैं, लेकिन क्योंकि रवीश कुमार तक ऐसे वीडियो नहीं पहुंचते होंगे तो इसका मतलब ये है कि उत्तराखंड के लोग मालवा आने पर अपने पिछवाड़ों पर हाथ रखकर निकल लेते हैं। हकीकत ये है कि ये आपदाएँ हमारी जिंदगी का एक हिस्सा रही हैं। मैदानी इलाक़ों की तरह हमारे यहाँ पर बाढ़ का पानी लंबे समय तक नहीं बँधा रहता है लेकिन पहाड़ों के खिसकने से जो मालवा आता है हम ख़ुद फावड़ा, बेलचा उठाकर उसे फेंकने लगते हैं,। २०१३ में जब केदारनाथ में आपदा आई थी तब मेरे गांव में कई गांव भी मलवे में डूब गए थे, लेकिन किसी NGO या फिर मीडिया के आने से पहले ही हर किसी ने अपने घरों से मलवा निकालकर बाहर फेंक दिया था।

चलती बारिश में ये काम होता है, धूप आने तक का भी हम इंतजार नहीं करते हैं। जितनी धरती हिलने पर रवीश कुमार जैसों के ट्वीट और वीडियो बन जाते हैं उससे ज़्यादा तो हमारी धरती तब हिलती है जब DJ पर मंगलेश डबराल छीड़बीड़ छिस्स करते हैं।

वास्तविकता ये है कि आपदाओं में उत्तराखंडी दिन-रात फावड़ा-बेलचा लेकर मलवा हटाते हैं। मोबाइल या कैमरा की बजाय यहाँ आपदा का सामना करना ही एक लाइफस्टाइल है, न कि डिजिटल कंटेंट क्रिएशन का ऑपर्चुनिटी।

क्योंकि उत्तराखंड के लोगों के पास कैमरा और वीडियो बनाने की लग्जरी नहीं होती है, जब कोई पहाड़ दरकता है तो उसके साथ कैसी गर्जनाएँ होती हैं, उसे सुनकर रवीश कुमार के मानसिक दस्त फौरन ठीक हो जाएँगे।

उत्तराखंड के लोगों को अगर कैमरा चाहिए होता, तो हर आपदा में हर घर के ऊपर पहले ड्रोन उड़ता। लेकिन हकीकत ये है कि वहां पर लोग खुद अपने बच्चों को बचाते हैं, गाय-भैंस को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाते हैं। लेकिन ऐसे नुकसान में हर पहाड़ी पीने घर से निकलता है- अपने बच्चों, को अपने गाय-भैंस- बेल और पशुओं को सुरक्षित ठिकाने पर ले जाते हैं । दिन हो तो वो परवाह नहीं करते कि कोई क्रेन उनकी मदद करेगी; और रात हो तो उन्हें फ़र्क़ नहीं पड़ता कि उन्हें रास्ता दिखाई दे रहा है या नहीं।

जब मैं बचपन में गांव से आठ किलोमीटर दूर सुबह स्कूल जाता था तो घरवाले ये नहीं कहते थे कि ऐसे मौसम में क्या करने जा रहा है, वो कहते थे कि पहाड़ से चिपककर जाना क्योंकि जब पत्थर गिरता है तो वो दूर गिरता है। ये हम लोगों की आम जिंदगी है। ये जिंदगी की गणित है, न कि ट्रेंडिंग की। फिर भी रवीश कुमार जैसे लोग सोचते हैं कि इस पत्थर को कैसे सबसे बड़े SEO की तरह वायरल किया जाए। लेकिन हमारी आपदाओं में वीडियो और कैमरा या फिर यूट्यूब के SEO की कोई भूमिका नहीं है। हम लोग अपनी आपदाओं में भी रास्ते तलाशते हैं, ना कि यूट्यूब वीडियो के आइडियाज।

लेकिन रवीश कुमार का क्या है- वो तो समुद्र से निकला हुआ रत्न है, लेकिन ये उस समुद्र मंथन से नहीं निकला था जिसमें से हलाहल और अमृत निकले, ये उस समुद्र मंथन से पैदा हुए थे जिसमें मोदी और भाजपा घृणा का बीज बोया जाता है वरना अगर ऐसा नहीं होता तो वो पंजाब के लोगों को एक दूसरे की मदद करने वाला और उत्तराखंड के लोगों को मस्तराम, कामचोर या आलसी नहीं बता रहे होते।

जम्मू कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड में हर साल बाढ़ आती हैं लेकिन पंजाब पहली बार बाढ़ से ग्रसित हुआ है और वो मैदानी इलाका है, उसकी तुलना पहाड़ी राज्यों से करनी सबसे बड़ी मूर्खता है और जब कोई काम मूर्खता का हो तो उसमे रवीश कुमार जैसे ठलुओं को तो लीड करना ही होता है।

इस पूरे वीडियो में छेनू ने उत्तराखंड के लोगों को कोसा है और ये कहने में भी मुझे कोई समस्या नहीं है कि उत्तराखंड वालों को ये आदमी इसलिए कोसता है क्योंकि उन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनाव में भाजपा को १००% सीटें दिलाई हैं। लेकिन कमाल की बात देखिए- रवीश कुमार इस पूरे रवीश रोने के बीच मदद के नाम पर उन किसानों का नाम लेना भूल गए जो किसान आंदोलन के टॉर्च बेयरर थे। वो किधर हैं? उनका अभी कोई पता नहीं है। हैल्प की कोई टूलकिट ‘लीक’ नहीं तो कम से कम ‘लांच’ ही कर देते। लेकिन मियाँ ख़लीफ़ा भी कितनी बार एक ही काम करेगी? वो रवीश कुमार थोड़े ही है। हाँ,, अपने इस वीडियो में उन्होंने एक जगह पर कहा है कि मदरसे से राहत सामग्री पहुँच रही है। इसे कहते हैं अपने एजेंडा के लिए समर्पण। जिसे कोई छेनू से सीखे।

रवीश कुमार के घर में जब नलखे से पानी नहीं आता है तब वो पहले वीडियो बनाता है, पत्रकारों को घर पर बुलाता है और प्लम्बर को सबसे आख़िर में कॉल करता है कि देखो भाई ये कैसे ठीक होगा? और जब उसे बड़े जोर से पेशाब आता है तो पहले वो माइक, कैमरा और ऑन कर के इंटरनेट कनेक्शन चेक करने जाता है। यही चक्कर है कि वो हर वीडियो में मूत ही रहे होते हैं। और उनके समर्थक इसी में भीगकर कहते हैं कि वाह रवीश जी क्या लहराया है आपने।

सामान्य सी बात ये है कि पहाड़ी अपनी आपदाओं और आउटरेज की मार्केटिंग में यकीन नहीं रखते हैं । वो चुपचाप काम करने में यकीन रखते हैं।

रवीश कुमार वो पीली चीज है जो सोना नहीं है। और हर बार वही पीली चीज होना और उस पर घमनाद करना भी एक किस्म की विलक्षण प्रतिभा ही कही जा सकती है। रवीश कुमार समुद्र मंथन का रत्न नहीं, बल्कि वही कवचधारी डिजिटल बोल्शेविक है जो आपदा को प्रोडक्टिविटी समझ बैठा है। लेकिन हमारे उत्तराखंड में हर मलवा एक यूट्यूब की कहानी नहीं, बल्कि जीने की जद्दोजहद है। उत्तराखंड के लोगों का सौंदर्य यही है कि हम बिना कैमरे के, बिना माइक्रोफोन के, सिर्फ़ अपने हाथों और हिम्मत से अपनी राह बनाते हैं।

रवीश कुमार के लिए ये बस एक वीडियो थीम है…  लेकिन हमारे लिए तो ये संघर्ष ही हमारी जिंदगी की बुनियाद है।

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