Uttarakhand Demography

Uttarakhand Demography: मंदिर के सामने नमाज़..पहाड़ों में बिहार का मौलवी? मस्जिदों की ‘क्रोनोलॉजी’

Summary
उत्तराखंड में वक्फ संपत्तियों, मस्जिदों, लव जिहाद और सांस्कृतिक बदलाव को लेकर उठ रहे सवालों पर आधारित यह विश्लेषण देवभूमि की बदलती सामाजिक और धार्मिक तस्वीर को सामने लाता है।

एक पुरानी कहावत है, ‘जड़ काटते जाओ और ऊपर से पानी देते जाओ।’ सुनने में यह थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन आज हमारे उत्तराखंड के साथ यही हो रहा है। अगर किसी बड़े पेड़ को गिराना हो, तो उसे कुल्हाड़ी से काटने की जरूरत नहीं पड़ती। बस उसकी जड़ों में ज़हर डाल दो, पेड़ अपने आप सूख जाएगा।

सनातन धर्म का वो पेड़, जिसकी जड़ें केदारनाथ और बद्रीनाथ की वादियों में हैं, आज उसी पर ‘म्लेच्छों’ का हमला हो रहा है। जिसे हम ऋषियों की तपस्थली और शांत राज्य कहते थे, आज वहां एक बहुत बड़ी साजिश रची जा रही है।

इस छोटे से राज्य को दूसरा कश्मीर बनाने के लिए पूरी ताकत लगा दी गई है। जो उत्तराखंड अपनी ईमानदारी और शांति के लिए जाना जाता था, आज वहां लव जिहाद, लैंड जिहाद और जनसंख्या जिहाद का शोर सुनाई दे रहा है। और मजे की बात देखिए कि जो लोग यह सब कर रहे हैं, वही अब विक्टिम कार्ड खेलकर उत्तराखंड को ही बदनाम कर रहे हैं।

देवभूमि उत्तराखंड ‘Project Dar-ul-Islam’ के विरुद्ध एक जंग लड़ रहा है। जिहादी Ecosystem एक तरफ सनातन की जड़ काटने में जुटा है, तो दूसरी तरफ भाईचारे का ‘अल-तकैय्या’ भी कर रहा है।

देवभूमि उत्तराखंड अपनी सभ्यता, संस्कृति और धर्म बचाने की लड़ाई लड़ रहा है। बद्री-केदार और पवित्र पहाड़ों को जिहादी आग से बचाने की जंग लड़ रहा है। पहाड़ों की यह लड़ाई अपनी रोटी, बेटी और शिवालों को बचाने के लिए चल रही है।

अब सवाल है कि कौन है जो पहाड़ों को निगल जाना चाहता है? कौन है जो पहाड़ी बेटियों पर गिद्ध नजरें गड़ाए बैठा है? जवाब एक ही है, जिसे आप भी अच्छी तरह जानते हैं। देवभूमि की यह लड़ाई उस हरे रंग के Virus के खिलाफ है, जो पिछले 1400 सालों में 56 से अधिक मुल्कों को अपनी चपेट में ले चुका है।

एक समय था जब पहाड़ पर मच्छर, मक्खी और मुसलमान ढूंढने से भी नहीं मिलते थे, मगर आज पहाड़ों पर ये प्रलय बनकर कहीं भी, कभी भी नजर आ जाते हैं।

पहाड़ी समाज लंबे समय तक चुप्पी ओढ़कर बैठा रहा। वह अपनी आंखों के सामने अपने मैदान और तराई-भाभर क्षेत्रों पर इस्लामी कब्जे को देखता रहा। मैदानी इलाकों में पैर जमाने के बाद मुसलमानों ने पहाड़ चढ़ना शुरू किया और एक छोटे से अंतराल में ही बड़े पहाड़ी भू-भाग में फैल गए।

उदार और भोले-भाले पहाड़ी समाज ने शुरुआत में इसे सामान्य माना, क्योंकि वह इनके जहरीले इरादों से परिचित नहीं था। पहाड़ियों को लगा कि ये लोग यहां सिर्फ रोजी-रोटी कमाने आए हैं, लेकिन जल्दी ही उनका भ्रम टूटने लगा।

यह सच है कि उत्तराखंड में काफी समय से मुस्लिम रहते आए हैं, लेकिन इनकी संख्या बेहद कम हुआ करती थी। जिहादी Ecosystem बड़ी चालाकी से यह स्थापित करने में जुटा हुआ है कि पहाड़ों में तो मुसलमान सैकड़ों सालों से रहते आए हैं। इसलिए यहां पहाड़ों में रहने वाले मुस्लिमों का इतिहास समझना जरूरी है।

एक दौर था जब पहाड़ों में कुछ गिने-चुने मुस्लिम परिवार होते थे। वे गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा बोलते थे, वैसा ही पहनावा पहनते थे। आप उनमें और आम पहाड़ी में भेद नहीं कर पाते थे। तब न वहां कोई कट्टरता थी, न कोई भव्य मस्जिद और न ही अरब से आई वहाबी सोच।

समस्या तब बढ़ी जब मैदानी क्षेत्रों से मुसलमानों ने पहाड़ों में घुसना शुरू किया।

‘रोजी-रोटी’ के बहाने बाहर से आने वाली मुस्लिम भीड़ ने पहाड़ों का स्वरूप बदलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे झुग्गियां बसीं, फिर उन झुग्गियों के बीच एक कच्ची मजार बनी, फिर उस मजार ने मस्जिद का रूप लिया और फिर शुरू हुआ Loudspeaker का कोहराम।

जो पहाड़ सुबह ‘ॐ नमः शिवाय’ और शंख की ध्वनि से गूंजते थे, वहां अब पांच वक्त की अजान ने अपना खूंटा गाड़ दिया है।

इस Chronology को समझिए। जैसे-जैसे इनकी संख्या बढ़ी, वैसे-वैसे पहाड़ों से खौफनाक खबरें आने लगीं। लव जिहाद के जरिए हमारी बेटियों को फुसलाकर सहारनपुर, बिजनौर और बरेली के ‘नर्क’ में धकेला जाने लगा। मतांतरण के रैकेट सक्रिय हो गए।

1985 तक जिस पहाड़ में एक ईंट की मस्जिद नहीं थी, आज वहां कुकुरमुत्तों की तरह मस्जिदें, मजारें और मदरसे उग आए हैं।

आज जो लोग ‘मुस्लिमों पर अत्याचार’ का रोना रो रहे हैं, क्या वे बताएंगे कि ये हजारों मस्जिदें रातों-रात पहाड़ों की दुर्गम चोटियों पर कैसे पहुंच गईं?

एक नजर यदि आंकड़ों पर डालें, तो पैरों तले जमीन खिसका देने वाली सच्चाई सामने आती है। Uttarakhand Waqf Board के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार टिहरी जिले में 839, पौड़ी में 166, अल्मोड़ा में 107, चंपावत में 76, बागेश्वर में 14 और पिथौरागढ़ में 14 से अधिक मस्जिदें, दरगाहें और मदरसे हैं।

ये आंकड़े उन पहाड़ी जिलों के हैं, जहां 1985 से पहले एक भी मस्जिद नहीं थी।

अगर प्रदेश के मैदानी इलाकों की बात करें, तो देहरादून जिले में 2434, ऊधमसिंह नगर में 351, नैनीताल में 584 और हरिद्वार में वक्फ संपत्तियों की संख्या 2439 से भी अधिक पहुंच चुकी है।

मार्च 2025 में जारी किए गए इन आंकड़ों के अनुसार देवभूमि में 6844 से अधिक वक्फ संपत्तियां हैं। इनमें लगभग 853 मस्जिदें, 233 दरगाह, 883 कब्रिस्तान और 113 से अधिक मदरसे शामिल हैं।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड के सबसे छोटे जिले चंपावत में भी 76 वक्फ संपत्तियां हैं।

अब आप यह वीडियो गौर से देखिए। पहली नजर में किसी को भी लग सकता है कि यह जरूर किसी कश्मीरी गांव का दृश्य है, लेकिन आप गलत हैं। यह दृश्य है उत्तराखंड के पौड़ी जिले के रामा गांव का, जो जल्द ही ‘मौला’ या ‘चिश्ती गांव’ बनने की ओर अग्रसर है।

जिस जगह कभी मंदिरों के शंख और घंटियों के मधुर स्वरों से लोगों की नींद खुलती थी, वहां आज Loudspeaker पर पांच वक्त की अजान सुनाई पड़ती है।

हालांकि इस गांव में मुस्लिम लंबे समय से रहते हैं, लेकिन यहां पहले मस्जिद नहीं हुआ करती थी। रामा गांव की यह मस्जिद हाल ही में बनाई गई है। इस मस्जिद के इमाम का नाम मुहम्मद इरशाद है, जो बिहार से है और अपने चार बच्चों के साथ मस्जिद में रहता है।

रामा गांव की यह मस्जिद केवल एक उदाहरण है। सैकड़ों मस्जिदें देवभूमि के पहाड़ों में बन चुकी हैं, जिनमें से कई में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और यहां तक कि कश्मीर से भी मुस्लिम आकर इमाम बने हुए हैं।

जो लोग ज्ञान देते हैं कि पहाड़ों के मुस्लिम यहां के मूल निवासी हैं, उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर ये मूल निवासी मुसलमान पहाड़ों में इतनी मस्जिदें क्यों खड़ी कर रहे हैं? और इन मस्जिदों में मौलवी सहारनपुर या मुजफ्फरपुर से क्यों बुलाए जा रहे हैं?

तेजी से बदल रही इन परिस्थितियों ने पहाड़ियों का न केवल सच से सामना करवाया, बल्कि उनके अस्तित्व और भविष्य पर भी एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया। एक छोटा और बेहद शांत राज्य उबलने लगा।

पहले तो मुसलमानों को चेतावनियां दी गईं। उन्हें समझाया गया कि यहां के रीति-रिवाजों, धर्म-संस्कृति और बहू-बेटियों का सम्मान करना सीखो। इनकी तरफ कुदृष्टि मत डालो। रोजी-रोटी कमाओ और सुखपूर्वक रहो, लेकिन यहां खिलाफत बसाने के इरादों से मत आओ। जमीनों पर कब्जे करके मजारें मत बनाओ। लव जिहाद मत फैलाओ।

लेकिन देवभूमि को ‘Dar-ul-Islam’ बनाने के इरादों से पहाड़ों में घुसे मुसलमान कहां मानने वाले थे? बार-बार चेतावनी मिलने के बाद भी जब मुस्लिम नहीं माने, तो पहाड़ी समाज ने प्रतिकार शुरू कर दिया।

हर जिहादी क्रिया की जोरदार प्रतिक्रिया होने लगी। पुरोला, गौचर, श्रीनगर, नैनीताल, धराली, नंदाघाट, पौड़ी, कोटद्वार और रुद्रपुर सहित राज्य के अनेक इलाकों में हिंदुओं ने जिहादियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया।

मुस्लिमों के छुपे हुए षड्यंत्र जब बाहर निकलने लगे और पहाड़ी समाज की बराबर प्रतिक्रिया मिलने लगी, तो जैसा हमेशा होता आया है, मुसलमानों ने अपना चिर-परिचित इस्लामी विक्टिम कार्ड निकालकर घड़ियाली आंसू बहाना शुरू कर दिया।

पूरे देश में मुस्लिम और सेकुलर जमात ने हाय-तौबा मचाना शुरू कर दिया कि उत्तराखंड में मुस्लिमों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। उत्तराखंड को हिंसक प्रदेश बताकर बदनाम करने का खेल शुरू हो गया।

ताजा मामला उत्तराखंड के रुद्रपुर का है। शाहिद मियां को रमजान की नमाज याद आई, तो भाईजान नमाज पढ़ने किसी मस्जिद में नहीं, बल्कि मंदिर की जमीन पर पहुंच गए।

आरोप है कि लगातार तीन दिन शाहिद ने मंदिर के सामने जानबूझकर नमाज पढ़ी, जबकि उसे ऐसा करने से मंदिर प्रबंधक ने मना भी किया था। इसके बाद भी जब शाहिद नहीं माना, तो मंदिर के प्रबंधक ने उसकी पिटाई कर दी।

घटना का वीडियो तेजी से वायरल हुआ, तो पूरे देश की मुस्लिम और सेकुलर जमात उबल पड़ी। हिंदुओं के खिलाफ Dog Whistle करके मुसलमानों को सरेआम STSJ के लिए उकसाने वाला जुबैर भी मैदान में कूद पड़ा।

हालांकि हिंसा का समर्थन नहीं किया जा सकता, लेकिन क्या यह भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर शाहिद को मना करने के बावजूद मंदिर की जमीन पर ही नमाज क्यों पढ़नी थी?

जो लोग ज्ञान बांट रहे हैं कि ‘क्या हो गया जो नमाज पढ़ ली’, क्या वे लोग जानते हैं कि किसी जगह को ‘Dar-ul-Islam’ में कैसे बदला जाता है?

यहां मैं आपको एक और घटना याद दिलाती हूं। Social Media पर कुछ समय पहले एक Video Clip वायरल हुई थी, जिसमें पत्रकार अर्चना तिवारी कश्मीर में एक मुस्लिम से पूछती हैं कि मंदिरों से उन्हें क्या समस्या है, और अगर कोई उनके गांव में मंदिर बनाएगा, तो वे क्या करेंगे?

इस पर कश्मीर के एक मुस्लिम ने कहा था कि अगर उनके कश्मीर में कोई मंदिर बनाएगा, तो वह उसे जला देगा।

अब आप इस मुस्लिम की चेतावनी की तुलना रुद्रपुर में एक प्राइवेट प्रॉपर्टी पर नमाज पढ़ने गए शाहिद से करके देखिए। क्या उसकी पिटाई की तुलना इस कट्टरपंथी के बयान से नहीं की जानी चाहिए?

उसने एक-एक मंदिर को जलाने की धमकी दी, जबकि बात सिर्फ गांव में मंदिर बनाने की हुई थी। वहीं रुद्रपुर का शाहिद किसी की निजी संपत्ति पर जाकर नमाज पढ़ता है और उसे ऐसा करने से रोका जाता है, तो पूरी इस्लामी उम्मा की नसें तन जाती हैं। Secular Fabric खराब हो जाता है। देवभूमि के लोग हिंसक ठहरा दिए जाते हैं।

और ऐसा भी नहीं है कि यह कोई नया पैटर्न है।

क्या आप किसी जगह के ‘Dar-ul-Islam’ में बदलने की Chronology जानते हैं? क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर कैसे तैयार किए जाते हैं?

First Step में एक गरीब और मजलूम मुसलमान रोजी-रोटी के लिए आपकी धरती पर कदम रखता है। जब जेब में रोजी और पेट में रोटी जाने लगती है, तो Second Step में मोमिन को नमाज याद आने लगती है।

दीन को मजबूत करने के मकसद पर निकला मोमिन जहां भी खाली जमीन देखता है, वहीं पश्चिम की तरफ मुंह करके उकड़ूं बैठकर नमाज पढ़ना शुरू कर देता है।

कुछ समय बाद मोमिन को याद आता है कि उस जमीन पर 400 साल पहले उसका कोई परदादा का भी परदादा Morning Walk करते हुए ‘टें’ बोल गया था। मुल्ला जी वहां चार ईंट, एक बोरी सीमेंट और हरी चादर बिछाकर अपने भूरे बाबा की मजार उगा देते हैं।

थोड़े ही समय में मजार बड़ी होकर मस्जिद बन जाती है। फिर एक दिन आता है जब उसी मस्जिद की मीनारों से तकरीरें की जाती हैं, ‘ए जालिमों, ऐ काफिरों, कश्मीर हमारा है। कश्मीर हमारा छोड़ दो। और अगर यहां रहना है तो कन्वर्ट होना पड़ेगा।’

और देखते ही देखते बन जाता है ‘Dar-ul-Islam’

रुद्रपुर का शाहिद भी इसी ‘Project Dar-ul-Islam’ को आगे बढ़ा रहा था। रुद्रपुर में दर्जनों मस्जिदें हैं। यहां हर दो किलोमीटर के दायरे में कोई न कोई मस्जिद मिल ही जाएगी।

चलो मान लिया मस्जिद दूर थी, तो सरकारी सड़कों पर नमाज पढ़ना तो मुस्लिमों का जन्मसिद्ध अधिकार है। शाहिद पास की किसी सड़क पर ही नमाज पढ़ लेता। लेकिन नहीं, शाहिद नमाज पढ़ने गया ठीक मंदिर के सामने।

क्या जिहादी जुबैर इसका कोई जवाब देगा कि आखिर शाहिद मियां को मंदिर के सामने नमाज पढ़ने की इतनी चुल्ल क्यों थी?

अब किसी के मंदिर की जमीन पर उसकी अनुमति के बगैर नमाज पढ़ोगे, तो कोई व्यक्ति राह भटककर कुटाई कर दे, तो इसमें कैसा आश्चर्य?

जो सेकुलर बिरादरी रुद्रपुर पर इतना रोना मचा रही है, क्या उसे पिथौरागढ़ की 6 साल की नन्हीं परी याद है?

यहां हम उस मासूम का असली नाम नहीं बता रहे हैं, इसलिए उसे ‘परी’ कह रहे हैं। 2014 में नन्हीं परी किसी रिश्तेदार की शादी में हल्द्वानी आई थी। यहां बिहार से आए अख्तर अली ने उस 6 साल की मासूम का अपहरण किया और निर्ममतापूर्वक उसका रेप करके उसे मार डाला।

नन्हीं परी की Post Mortem Report बताती है कि उसकी दोनों टांगों को लगभग चीर डाला गया था। चेहरे पर लाल और नीले धब्बे थे। छाती पर अत्यधिक खरोंचें थीं। इतने गंभीर घाव थे कि उनका वर्णन भी रूह कंपा देता है।

इस अख्तर अली को लोअर कोर्ट और हाईकोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया।

आज 11 साल से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन 6 साल की मासूम परी की आत्मा आज भी न्याय की प्रतीक्षा कर रही है।

हल्द्वानी, रुद्रपुर से मात्र एक घंटे की दूरी पर है। क्या सुपारी गैंग के हेड जिहादी जुबैर ने कभी इस पर मुंह खोला? रुद्रपुर के शाहिद के लिए कपड़े फाड़कर रोने वाली सेकुलर और कांग्रेसी जमात को क्या नन्हीं परी नजर नहीं आई?

आखिर इतना दोगलापन क्यों है?

उत्तराखंड में मुस्लिमों पर अत्याचार के बारे में Fact Finding Committee बनाकर रिपोर्ट छापने वाले क्या यह जानने का प्रयास करेंगे कि आखिर अख्तर अली को एक 6 साल की मासूम के साथ शैतानी दरिंदगी की प्रेरणा कहां से मिली? आखिर रुद्रपुर के शाहिद को मंदिर के सामने नमाज पढ़ने की प्रेरणा कहां से मिली? बनभूलपुरा में मुसलमानों को रेलवे की सैकड़ों एकड़ भूमि पर कब्जे की प्रेरणा कहां से मिली? देवभूमि में सैकड़ों मस्जिदें कैसे खड़ी हो गईं?

रुद्रपुर में शाहिद मियां मंदिर की जमीन पर नमाज पढ़ने की जिद करता है और जब उसे रोका जाता है, तो पूरा Ecosystem रोने लगता है।

लेकिन 5 मार्च को बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ कर दिया कि नमाज पढ़ना कोई ऐसा धार्मिक अधिकार नहीं है कि आप कहीं भी बैठ जाएं। कोर्ट ने कहा कि सुरक्षा सबसे ऊपर है और आप नमाज की जगह खुद तय नहीं कर सकते।

जब कोर्ट कह रहा है कि नमाज के लिए जगह तय करना आपका अधिकार नहीं है, तो लोगों की प्राइवेट प्रॉपर्टी पर और मंदिर के सामने नमाज पढ़ने की यह जिद सिर्फ ‘इबादत’ नहीं, बल्कि ‘कब्जे की नीयत’ है।

अब सवाल उनसे भी है, जो ‘मुहब्बत की दुकान’ के नाम पर जिहाद के इस शोरूम को खाद-पानी दे रहे हैं।

क्या ‘मोहम्मद दीपक’ जैसे लोग, जो जिहादी सर्कस के पालतू जमूरे बनकर रह गए हैं, कभी यह जवाब देंगे कि पहाड़ों में ‘मजदूरी’ के बहाने आए इन घुसपैठियों ने हमारी बेटियों को ‘लव जिहाद’ के जाल में क्यों फंसाया?

क्या इन बेशर्म इंटेलेक्चुअल्स के पास इस बात का कोई तर्क है कि ‘भाईचारे’ का चूरण बांटने वाले इन अब्दुलों को आखिर बद्रीनाथ और जोशीमठ जैसी पवित्र जगहों पर ही नमाज पढ़ने की सनक क्यों सवार होती है?

सच तो यह है कि ‘मोहम्मद दीपक’ महज एक नाम नहीं, बल्कि एक खतरनाक मानसिकता है। उत्तराखंड में ऐसे हजारों ‘दीपक’ बुझने की कगार पर खड़ी सभ्यता को और अंधेरे में धकेल रहे हैं।

इनमें सो-कॉल्ड पत्रकारों, Influencers और दरबारियों की एक लंबी जमात है। देवभूमि के वासियों को यह समझना होगा कि जितना खतरा उन डायरेक्ट जिहादी ताकतों से है, उससे कहीं अधिक घातक ये ‘भाईचारे के Brand Ambassador’ हैं।

ये लोग ‘Mission Dar-ul-Islam’ की बिछाई गई शतरंज के वे प्यादे हैं, जिनकी नियति ही आखिर में कुर्बान होना है।

Tragedy देखिए, इन मानसिक गुलामों का Brainwash इस स्तर तक हो चुका है कि सामने फन फैलाए खड़े जहरीले नाग को ये ‘सतरंगी रस्सी’ बता रहे हैं। और हद तो तब हो जाती है, जब ये उस आदमी का मजाक बनाते हैं जो इन्हें उस नाग के जहर से Aware कर रहा है।

ये ‘Brain-Dead’ शुतुरमुर्ग, जो खतरा देखकर रेत में सिर दबाए बैठे हैं, देवभूमि के असली और Internal दुश्मन हैं। जिहाद से पहले इन आस्तीन के सांपों से सावधान रहने की जरूरत है।

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