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मनुस्मृति का सच: क्या डॉ. अंबेडकर ने इसे पूरी तरह नकारा था?

Summary
क्या डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति को पूरी तरह ठुकरा दिया था? इस लेख में जानिए मनुस्मृति का ऐतिहासिक महत्व, 1927 का महाड़ आंदोलन, हिंदू कोड बिल में इसकी भूमिका और आधुनिक भारतीय अदालतों में इसे एक ‘Historical Reference’ के तौर पर इस्तेमाल किए जाने का सच।

25 दिसंबर 1927 का दिन था, जब महाराष्ट्र के महाड़ की धरती पर डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मनुस्मृति की प्रति जलाई थी। उनका तर्क था कि इसे जलाया जा रहा है ताकि दुनिया देखे कि कोई भी ग्रंथ इंसान की बराबरी से बड़ा नहीं होता। लेकिन मनुस्मृति को जलाना इस कहानी का बस एक छोटा सा हिस्सा था और कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। आज, लगभग एक सदी बाद भी, मनुस्मृति भारत में बहस का हिस्सा बनी हुई है। कभी किसी राजनीतिक बयान से, तो कभी किसी अकादमिक चर्चा से या फिर अदालत के फैसले से ये चर्चा में आ जाती है। और उससे भी बड़ा प्रश्न ये होता है कि क्या डॉक्टर अंबेडकर का मनु स्मृति को लेकर सिर्फ यही एक नजरिया था कि उसे जला दिया जाए?

असल में मनुस्मृति में समाज, परिवार, और धर्म से जुड़ी बातें लिखी हैं, जैसे महिलाओं की मर्यादा, पारिवारिक रिश्ते, और पुराने समय का सामाजिक ढांचा। इसी वजह से ये किताब एक तरफ इतिहास में अहम मानी जाती है और दूसरी तरफ आज के समय में विवादों का केंद्र भी बन जाती है। जब मनुस्मृति का नाम आता है, तो डॉ. भीमराव अंबेडकर का ज़िक्र ज़रूर होता है। लोग अक्सर मान लेते हैं कि अंबेडकर ने मनुस्मृति को पूरी तरह ठुकरा दिया था, लेकिन सच्चाई इससे थोड़ी अलग है। 1949 में जब उन्होंने हिंदू कोड बिल बनाया, तो मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथों की मदद ली। उन्होंने संस्कृत विद्वानों से इनका अनुवाद करवाया, ताकि समझा जा सके कि प्राचीन भारत में महिलाओं और परिवार के हक को कैसे देखा गया था।

अंबेडकर ने पाया कि मनुस्मृति में भी महिलाओं को कुछ अधिकार देने की बातें थीं, जैसे संपत्ति में महिलाओं का हिस्सा। उन्होंने इन्हीं बिंदुओं को आगे बढ़ाकर हिंदू कोड बिल में बराबरी का ढांचा खड़ा किया, यानी उन्होंने इस देश की परंपरा की जड़ों में जाकर ‘Modernity’ का बीज बोने पर ज़ोर दिया। हाँ, 1927 में मनुस्मृति को जलाना एक ‘Representational Protest’ था और ये अंबेडकर का प्रोटेस्ट जातिवाद और स्त्री-असमानता के खिलाफ था। लेकिन कानूनी काम में उन्होंने वैचारिक गहराई इस तरह से कायम रखी कि जो गलत था, उसे अलग किया, और जो सुधार की संभावना रखता था, उसे अपना लिया। यही वजह है कि आज भी हमारी अदालतें मनुस्मृति का नाम लेती हैं। कानून के तौर पर नहीं, बल्कि रेफरेंस के रूप में। तो सवाल यही है कि क्या मनुस्मृति वैसी है, जैसा उसे बताया गया, या हमने डॉक्टर अंबेडकर के ‘Symbolic Protest’ को उनकी ‘Traditional Knowledge’ से नफरत नाम देकर खुद को सच्चाई से अलग कर लिया?

मनुस्मृति क्या है?

मनुस्मृति, जिसे ‘मानव धर्मशास्त्र’ भी कहा जाता है, ये एक ‘Ancient Sanskrit Text’ है, जिसे आम तौर पर दूसरी सदी के बीच लिखा गया माना जाता है। इसमें सोसाइटी, ‘Moral Duty’ (धर्म), शादी-विवाह, ‘Property Inheritance’, दंड और शासन से जुड़े नियमों के बारे में लिखा गया है। मनुस्मृति कोई कानून नहीं थी और न ही पूरे भारत में समान रूप से लागू कोई संहिता। सबसे आसान भाषा में कहें, तो ‘राजा मनु की यादें और अनुभव’ ही मनुस्मृति कहलाए, लेकिन हम में से ज़्यादातर लोगों ने इसे ऐसे शांत दिमाग से कभी पढ़ा या समझा ही नहीं।

अंबेडकर और मनुस्मृति की डिबेट

1927 में महाराष्ट्र के महाड़ शहर में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया और ये एक ऐतिहासिक घटना बन गई। जबकि असल में ये डॉ. अंबेडकर का जेंडर और जाति के खिलाफ ‘Moral Protest’ का सिम्बल था। अंबेडकर के लिए मनुस्मृति सामाजिक व्यवस्था का प्रतीक थी, जो ‘By Birth’ ऊँच-नीच, ‘Untouchability’ और ‘Women Oppression’ को रूल्स में बाँध देती थी। उनके द्वारा मनुस्मृति का दहन ये दिखता था की सोसाइटी इससे भी आगे ‘Exist’ करती है। लेकिन इसका ये मतलब उन्होंने कभी नहीं बताया कि उस सोसाइटी में मनु की बताई हुई परम्पराओं की कोई जगह ही नहीं है। क्योंकि अगर ऐसा होता तो, खुद अंबेडकर ने मनुस्मृति को महिलाओं के अधिकारों के लिए ‘Quote’ न किया होता और आज भी अदालतों में मनुस्मृति को इस देश की विरासत के रूप में नजीर के तौर पर कोट करने का ट्रेंड ना दिखता।

आंबेडकर ने मनुस्मृति की आलोचना जब की, तब पूरे ग्रंथ या किसी एक लाइन को एक साथ रखकर नहीं की, उनकी आपत्ति कुछ खास बातों पर बार-बार केंद्रित रही—जैसे महिलाओं का शोषण, जन्म के आधार पर वर्ण को तय कर देना, और जाति के हिसाब से अलग-अलग सज़ाएँ देना। उदाहरण के लिए, अंबेडकर उन श्लोकों का विरोध करते हैं जो अलग-अलग जातियों के साथ खाना खाने और शादी करने पर रोक लगाते हैं, महिलाओं को पूरी ज़िंदगी पुरुषों की निगरानी में रखने की बात करते हैं, और शूद्रों को वेद सुनने या पढ़ने पर कठोर और अमानवीय दंड देने की बात कहते हैं।

अंबेडकर के मुताबिक, यही बातें ‘Untouchability’ और ‘Patriarchy’ को ‘धार्मिक’ आधार देती थीं। लेकिन आज जब उनके लेखन को ध्यान से पढ़ा जाता है, तो एक और बात सामने आती है। डॉ. अंबेडकर, मनुस्मृति के इतिहास और उसकी जटिलता को नज़रअंदाज़ नहीं करते थे। वो जानते थे कि भारतीय कानूनी परंपरा में समय-समय पर इन कठोर नियमों की नई व्याख्या की गई है या उन्हें नरम भी किया गया है। इससे साफ़ होता है कि अंबेडकर की असहमति मनु की हर बात से नहीं थी, बल्कि उन बातों से थी जिन्हें समाज ने ‘सामान्य नियम’ मान लिया था।

लेकिन डॉ. अंबेडकर का प्रतिरोध आगे जाकर एक अलग दिशा में चला गया, क्यूंकि जब-जब ख़ुद को अंबेडकर के विचारों का समर्थक बताने वालों ने अपने विचारों के ‘Validation’ के लिए अंबेडकर का सहारा लिया, तब-तब मनुस्मृति जलायी गई और ये संदेश देने का काम किया कि यही अंबेडकर का मनुस्मृति को लेकर एकमात्र नजरिया है। लेकिन आंबेडकर तो ख़ुद संवैधानिक चिंतक थे। आंबेडकर ने कई अवसरों पर ख़ुद भी मनुस्मृति के कुछ ‘Verses’ को ‘Reform’ के पक्ष में भी इस्तेमाल किया, जैसे स्त्रियों के ‘Inheritance Rights’ के समर्थन में। ‘Hindu Code Bill’ पर हुई बहसें इस बात का सबसे मज़बूत सबूत हैं कि आंबेडकर मनुस्मृति को एक ही रंग में देख कर पूरी तरह दुश्मन नहीं मानते थे। कई मौकों पर उन्होंने मनु के ही संदर्भ देकर प्रगतिशील सुधारों का समर्थन किया ख़ासकर महिलाओं की संपत्ति और विरासत के अधिकारों के मामले में। इन बहसों के रिकॉर्ड बताते हैं कि डॉ. अंबेडकर ने ये रणनीति जान-बूझकर अपनाई।

Hindu Law Traditions में मनुस्मृति की भूमिका क्या है:

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि पुराने समय में और फिर ‘Colonial Time’ में मनुस्मृति को ही ‘धर्मशास्त्र’ के स्रोत के रूप में देखा गया, लेकिन ये समाज को चलाने के ‘Final Rules’ या ‘Laws’ नहीं थे। बाद के समय के धर्मशास्त्री विद्वान जैसे विज्ञानेश्वर ने ‘मिताक्षरा’ लिखी और जिम्मूतवाहन ने ‘दायभाग’ लिखी। दोनों ने मनुस्मृति के नियमों को पूरी तरह नहीं उठाया, बल्कि अपने समय, समाज और इलाक़े के हिसाब से बदल दिया। धीरे-धीरे इन्हीं व्याख्याओं के ज़रिए हिंदू कानून बना, जो पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में चला। मिताक्षरा ज्यादातर जगह और दायभाग बंगाल में। यानि जो ‘हिंदू पर्सनल लॉ’ बाद में अंग्रेज़ों की अदालतों में लागू हुआ, वो सीधे मनुस्मृति नहीं था। वो तो उसकी व्याख्या, फ़िल्टर किया हुआ संस्करण था, जो विद्वानों ने उस दौर के हिसाब से ढाला था।

अदालतों में मनुस्मृति की स्थिति और निष्कर्ष

आज की तारीख़ में भारतीय अदालतें मनुस्मृति को किसी कानूनी किताब की तरह नहीं मानतीं। हमारे फैसले संविधान, ‘Acts’ और पुराने केसों की मिसालों पर चलते हैं। हाँ, कभी-कभी जज मनुस्मृति या दूसरे ग्रंथों से कोई लाइन सिर्फ़ एक नैतिक उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं—जैसे औरतों की सुरक्षा, समानता या समाज में शालीनता की बात समझाने के लिए। मतलब अदालत मनुस्मृति को ‘कानून’ की तरह लागू नहीं करती, बल्कि उसे एक सांस्कृतिक विरासत या नैतिक संदर्भ के तौर पर ‘Quote’ करती है।

2019 तक सुप्रीम कोर्ट ने मनुस्मृति का ज़िक्र अपने सात फैसलों में किया है, लेकिन ध्यान रखिए कि, ये ‘मनुस्मृति लागू’ करने के लिए नहीं था। ज्यादातर केस हिंदू पर्सनल लॉ या अधिकारों की व्याख्या से जुड़े थे। जैसे एक पुराने केस ‘विमला बाई बनाम हीरालाल गुप्ता’ में कोर्ट ने ‘रिश्तेदार की परिभाषा’ समझाते वक्त मनुस्मृति का हवाला दिया, बतौर शास्त्रीय संदर्भ दिया, न कि कानून के तौर पर। बाद में ‘विजय नारायण vs महाराष्ट्र सरकार’ जैसे मामलों में भी कोर्ट ने मनुस्मृति को सिर्फ एक वैचारिक ढांचे के हिस्से के रूप में quote किया। मतलब सिर्फ़ कानून समझाने के लिए, श्लोक पढ़कर नहीं।

2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक केस में पिता द्वारा नाबालिग बेटी के साथ रेप की सज़ा बरकरार रखी और अपने फ़ैसले में मनुस्मृति का ज़िक्र किया। जस्टिस अरविंद कुमार और संदीप मेहता की बेंच ने मनुस्मृति की एक पंक्ति का हवाला देते हुए कहा कि परिवार और समाज में महिलाओं की मर्यादा और सुरक्षा कितनी ज़रूरी है। कोर्ट ने इसे ‘Constitutional Vision’ से जोड़ा—कि औरतों और बच्चों की गरिमा किसी हालत में समझौते वाली नहीं हो सकती।

अब एक दूसरा केस देखिए—सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्रीकृष्ण सिंह बनाम मथुरा अहीर (1980)’ केस में कहा था कि हिंदू पर्सनल लॉ के मामलों में जजों को उन्हीं ‘Recognised and Authoritative Sources’—यानी स्मृतियों और कमेंट्रीज़—का सहारा लेना चाहिए, जब तक कोई कानून या परंपरा उन्हें बदल न दे। यानी मनुस्मृति जैसी किताबें अब भी कानूनी परंपरा का हिस्सा मानी जाती हैं, भले सीधे उन्हें quote ना किया गया हो। इससे साफ़ होता है कि कोर्ट मनु और दूसरी स्मृतियों को हिंदू कानून की बुनियादी कड़ी मानता है, लेकिन हमेशा संविधान और आधुनिक कानून की लिमिट्स के भीतर ही।

हाईकोर्ट्स में मनुस्मृति

हाई कोर्ट्स सुप्रीम कोर्ट की तुलना में मनुस्मृति का ज़िक्र ज़्यादा विस्तार से करती रही हैं, ख़ासकर परिवार की देखभाल और भरण-पोषण से जुड़े मामलों में। दिल्ली हाई कोर्ट ने ‘Narang v. Narang’ मामलों में मनुस्मृति के Chapter 9 की एक पंक्ति का हवाला देते हुए कहा कि संयुक्त परिवार के मुखिया की ज़िम्मेदारी है कि वो अपने सभी आश्रितों—पत्नी, बच्चों, बुज़ुर्गों—का पालन-पोषण करे। 2024 में ‘झारखंड हाई कोर्ट’ के एक विवादित फैसले में जस्टिस सुभाष चंद ने मनुस्मृति का ज़िक्र करते हुए महिला के भरण-पोषण के अधिकार पर चर्चा की, और कहा कि जहां औरतें दुखी होती हैं, वो परिवार टिक नहीं पाता, लेकिन उस केस में पत्नी को मेंटेनेंस नहीं मिला।

‘छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट’ ने ‘दास बनाम दास’ केस में मनुस्मृति की एक पंक्ति का सहारा लेकर कहा कि पति की पत्नी के प्रति ज़िम्मेदारी तलाक़ या मुकदमे के बाद भी बनी रहती है। यानी अदालतें कभी-कभी मनुस्मृति से ऐसे नैतिक विचार चुन लेती हैं जो आज के परिवार न्याय और बराबरी के सिद्धांतों के साथ मेल खाते हैं। कुछ हाई कोर्ट के फैसलों और बयानों में मनुस्मृति को सीधे ‘पवित्र ग्रंथ’ या ‘हमारे शास्त्र’ कहा गया है। जैसे 2025 में ‘इलाहाबाद हाई कोर्ट’ ने एक ऐसे केस में, FIR रद्द करने से मना करते हुए इसे ‘Holy Book’ कहा था जिसमें एक नेता पर टीवी डिबेट के दौरान मनुस्मृति फाड़ने का आरोप था। हालांकि फैसला तकनीकी तौर पर ‘Criminal Procedure’ पर था, लेकिन इस ‘Holy Book’ शब्द ने मनुस्मृति की ‘Symbolic Status’ को ऊँचा बना दिया। इसी तरह दिल्ली हाई कोर्ट की जज जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह ने एक कार्यक्रम में मनुस्मृति की तारीफ़ करते हुए कहा कि इसमें औरतों को सम्मानजनक दर्जा दिया गया है। जिस पर महिला संगठनों ने विरोध जताया, यह कहते हुए कि ऐसा बयान संविधान की समानता की भावना से टकराता है।

निष्कर्ष

तो अगर मनु स्मृति के विरोध को ही अगर डॉ. भीमराव अंबेडकर के नजरिये से जोड़कर देखा जाता है, तो ये बताना जरूरी है कि उनका मनुस्मृति से रिश्ता सिर्फ विरोध का नहीं था, बल्कि सोच-समझकर की गई आलोचना का था। उन्होंने माना कि मनुस्मृति में कुछ हिस्से ऐसे हैं जिनसे कानून और समाज की रूपरेखा समझी जा सकती है, लेकिन उन्होंने उसी के उन भागों का विरोध किया जो औरतों और पिछड़ी जातियों के साथ भेदभाव को सही ठहराते थे। 1927 में महाड़ आंदोलन के दौरान मनुस्मृति जलाना भी इसी अन्याय के खिलाफ़ प्रतीकात्मक विरोध था। बाद में हिंदू कोड बिल पर बहस के दौरान अंबेडकर ने महिलाओं के संपत्ति अधिकार जैसे सुधारवादी विचारों का सहारा लिया। मतलब उन्होंने ग्रंथ को पूरी तरह ठुकराया नहीं, बल्कि उसमें से बराबरी वाले प्रोग्रेसिव हिस्से चुने।

आज सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट कभी-कभी मनुस्मृति की पंक्तियाँ quote करते हैं। जैसे परिवार की ज़िम्मेदारी, महिलाओं की गरिमा या यौन अपराधों की निंदा पर, लेकिन कोर्ट ऐसा सिर्फ़ नैतिक संदर्भ के रूप में करती हैं, न कि मनुस्मृति को ही कानून मानकर। हमें ये समझने की जरूरत है कि मनुस्मृति अब अदालतों में ‘कानून’ नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति का हिस्सा है, जिसे संविधान की बराबरी और न्याय की भावना के तहत दोबारा परिभाषित किया गया है।

तो अगर मनु की कोई ‘Legacy’ आज दिखती है, तो वो सिर्फ़ एक ‘Historical Reference’ के रूप में है, किसी कानून के तौर पर नहीं। कई लोगों को लगता है कि हमारे संविधान में मनुस्मृति के कानून लिखे गए हैं, लेकिन जो समझने की बात है वो ये है कि, इंडियन कोर्ट्स मनुस्मृति को लॉ की तरह ‘Apply’ नहीं करतीं। हाँ, ये याद रखना जरूरी है कि कुछ हाईकोर्ट्स ने इसे ‘Holy Book’ या ‘Scripture’ भी कहा है, जिस पर बहस भी हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि ‘Constitutional Morality’ हमेशा रिलीजियस टेक्स्ट्स से ऊपर है।

तो जो लोग ये आग भड़काते हैं की डॉ. अंबेडकर ने मनुस्मृति को जलाया और उसे मिटाने का प्रयास किया, तो ऐसा नहीं हुआ था—उन्होंने बस ये संदेश दिया कि कोई भी धार्मिक ग्रंथ बराबरी और न्याय से बड़ा नहीं हो सकता। और संविधान ने उसी सोच को आगे बढ़ाया, कि कानून की असली ताक़त जनता और संविधान में है, पर हमारी सांस्कृतिक विरासत की झलक उसमें बनी रहती है।

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