राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) विजयादशमी 2025 के दिन अपने 100 वर्ष पूरे कर रहा है। नागपुर में डॉ. हेडगेवार का रोपा यह बीज आज ऐसा वटवृक्ष बन चुका है, जिसकी लताएँ समाज के हर हिस्से में हैं। संघ के 100 वर्षों पर वरिष्ठ विचारक Ratan Sharda से Rahul Roushan ने उसकी कार्यशैली, उसके ऊपर लगने वाले ब्राह्मणवाद के आरोपों और उसके डॉ. अम्बेडकर से संबंध जैसे मुद्दों पर बात की है। RSS एक सुधारवादी संगठन है या फिर रूढ़िवादी, इन पहलुओं को इस बातचीत में टटोला गया है।
राहुल रौशन:
एक चश्मा तो ओब्वियसली सो-कॉल्ड लिबरल नेहरूवियन लोगों का है। उस चश्मे से तो आप मुझे राक्षस नजर आएँगे। दूसरा चश्मा जो मैंने पहन रखा है — ‘संघी हूँ नेवर वेंट टू अ शाखा’ वाला — उनकी अपनी क्रिटिसिज्म है। और एक तीसरा चश्मा भी है, जो नया बनाया गया है — अल्ट्रा हिंदू वाला। वो अब मीडिया में अपनी जगह बनाकर, पैसे कमाकर, संघ को सिखाते हैं कि संघ को क्या करना चाहिए। वो एकदम एक्सट्रीम लेवल पर चले जाते हैं और संघ को सबसे ज्यादा गाली भी वही लोग देते हैं।
अब बात करते हैं संघ के सौ साल पूरे होने की। 2025 में प्रधानमंत्री ने लाल किले से कहा था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा एनजीओ है, जिसके सौ साल पूरे होने वाले हैं। इस विजयादशमी पर संघ सौ साल पूरा करेगा। संघ को बेहतर समझने के लिए आज स्टूडियो में मौजूद हैं रतन शारदा जी। उन्होंने न सिर्फ़ शाखाएँ जॉइन की हैं, बल्कि संघ पर गहन शोध किया है, पीएचडी की है और कई किताबें लिखी हैं।
मैं किसी और एनजीओ की भी बात करूं कि अगर किसी एनजीओ ने 100 साल पूरे किए हों तो लोग यह मानकर चलेंगे कि उसका इकोसिस्टम है। पैट्रन लोग हैं, तभी वह 100 साल चल सका। अगर कोई प्राइवेट कंपनी है तो या तो उसके सर्विसेज या उसके गुड्स में ऐसी कोई बात है कि वह 100 साल चल सकी और उसके काम करने के सिस्टम इतने मजबूत होंगे। कोई एजुकेशनल इंस्टीट्यूट है तो फिर कहेंगे कि उसकी रेलेवेंस काफी है, तभी वह 100 साल चल सका। अब संघ के बारे में ऐसा कहते हैं कि संघ की तुलना संघ से ही कर सकते हैं। तो अगर संघ 100 साल चल सका तो आपको क्या लगता है? इसमें इनमें से कुछ बातें कॉमन हैं या फिर कुछ अलग ही है जिस चीज ने संघ को 100 साल तक चलाया है।
रतन शारदा:
राहुल जी, सबसे पहले तो संघ का विजन बहुत लंबा और उदात्त है — हिंदू समाज को संगठित करना। हिंदू समाज सैकड़ों साल से संगठित नहीं था। सौ साल में जितना हुआ, वो बताता है कि काम कितना कठिन और लंबा है। स्वयंसेवकों को पता है कि ये काम पीढ़ियों का है, इसलिए थकान नहीं होती। निरंतरता बनी रहती है।
हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्र, हिंदू समाज का सुधार, समाज के अंदर के दुर्गुणों को निकालना, जाति-पंथ से ऊपर उठकर सबको एकजुट करना – ये इतना बड़ा चैलेंज है कि इसे स्वीकार करने के बाद आधे रास्ते में छोड़ना नामुमकिन हो जाता है। दूसरी बात, संघ के कुछ ऐसे मैकेनिज्म हैं जो पूरी तरह यूनिक हैं।
दूसरी बात, लोग अक्सर संघ को बड़ा पुरातनपंथी या पुराने विचारों वाला मानते हैं, लेकिन वास्तव में देखें तो यह सबसे इनोवेटिव स्वयंसेवी संगठन है।कल्पना कीजिए – कोई आदमी रोज सिर्फ एक घंटा दे, लोग इकट्ठे होंगे, खेलेंगे, कूदेंगे, गीत गाएंगे, कहानियां सुनेंगे, और इसी से चरित्र-निर्माण होगा। फिर वे आगे देश के लिए कुछ भी करने को तैयार होंगे, यहां तक कि जीवन भी दे देंगे। और ऐसे देने वाले लोग उस एक घंटे की शाखा से बन सकते हैं।यह कल्पना किसी को नहीं थी।
जब संघ बना, उस समय लोग कहते थे — “कुछ भी कहो, गधा कहो, लेकिन हिंदू मत कहो।” डॉ. हेडगेवार ने खड़े होकर कहा था — “मैं केशव बलिराम हेडगेवार कहता हूँ कि हिंदू राष्ट्र है।” उस समय ये विचार रखना भी बड़ा साहस था।
राहुल रौशन:
आपने कई बार कहा कि संघ का सबसे बड़ा सीक्रेट क्या है?
रतन शारदा:
सबसे बड़ा सीक्रेट है — आपसी प्रेम, पारिवारिक संबंध और निरंतरता। शाखा में भाईचारा सिखाया जाता है। स्वयंसेवक के घर की रसोई तक पहुँच होनी चाहिए। माँ चाय पिलाएगी, डाँटेगी भी। ये पारिवारिक भावना संघ की ताकत है।
एक मज़ेदार किस्सा है — 1970 के आसपास इंदिरा जी के समय संघ पर बैन की कोशिश हुई। सिद्धार्थ शंकर रे ने कहा था बैन कैसे करेंगे। सीआईडी लगाई गई। सीआईडी वाले दूर से देखते रहे। उन्हें समझ नहीं आया। सब कुछ ओपन है — शाखा ओपन में, बैठक ओपन में। आखिर में उन्होंने कहा — “एक सीक्रेट है, चंदन का कार्यक्रम।” चंदन कौन है? असल में बच्चे 5-5 पैसे जमा करके चने-कुरमुरे खाते थे, उसे चंदन का कार्यक्रम कहते थे। ऐसी-ऐसी बहुत भ्रांतियाँ हैं।
दूसरा बड़ा गुण है — राष्ट्र पहले, संगठन पहले, व्यक्ति बाद में। ईगो को दबाना, गलती मानना, दूसरे को जगह देना। ये बौद्धिक लोगों में बहुत कम होता है।
राहुल रौशन:
कई लोग कहते हैं कि संघ की तुलना किसी से नहीं हो सकती। क्या ये सिर्फ़ जज़्बे की वजह से चला या कुछ और भी है?
रतन शारदा:
जज़्बा तो है ही, लेकिन उससे ज्यादा है — निःस्वार्थ भाव। सब अपनी जेब से खर्च करते हैं। कोई पैसा लेकर नहीं आता। ईगो दबाना, कंसेंसस बनाना, स्प्लिट न होना — ये सब संघ की खासियत है।
और सबसे महत्वपूर्ण — संघ कोई रजिस्टर्ड संगठन नहीं है। इसका नाम भी ट्रेडमार्क की तरह प्रोटेक्टेड है। संघ समाज का संगठन है, अपना कुछ नहीं रखता। जहाँ ज़रूरत पड़ी, अलग-अलग ट्रस्ट बने — विद्या भारती, सेवा भारती, विश्व हिंदू परिषद आदि। संघ सिर्फ़ कोऑर्डिनेट करता है।
संघ में काम करने का मूल भाव निस्वार्थ सेवा है – अपनी जेब से काम करना, बिना किसी अपेक्षा के। दुनिया में कोई भी संगठन ऐसा कितने लोगों को पा सकता है जो अपनी जेब से खर्च करे? मैं जब भी कैंप में जाता हूं, तो अपना पैसा देकर जाता हूं। चंदन का कार्यक्रम लेता हूं तो अपना पैसा लगाता हूं। गणवेश भी अपने पैसे से खरीदता हूं। ट्रैवल भी खुद करता हूं। कहीं भी जाऊं, तो मोहन जी ने ठीक कहा था – संघ में आओगे तो लेके नहीं जाओगे, खो के जाओगे। हमने यह प्रैक्टिकली अनुभव किया है।
इसके साथ ही दूसरा बड़ा गुण है ईगो को दबाना या मारना। संघ में राष्ट्र पहले, संगठन पहले, फिर व्यक्ति – यह भावना है। मेरा ईगो कुछ नहीं। संगठन के लिए काम करना है, तो ईगो को रोकना पड़ता है। अपनी गलती स्वीकार करना, अगले को जगह देना, सबको साथ लेकर चलना – यह भाव सभी जगह नहीं मिलता। खासकर बौद्धिक श्रेणी के लोगों में ईगो बहुत ज्यादा होता है।
उन्हें लगता है कि मेरे सिवा किसी को दुनिया की समझ नहीं। लेकिन संघ में ऐसे लोग भी आते हैं और इंटेलेक्चुअल होने के बावजूद खुद को साधारण दिखाकर काम करते हैं। मैंने बहुत अच्छे कार्यकर्ता देखे हैं – जैसे रंगनाथ जी (जिनका हाल ही में देहांत हो गया), दत्तोपंत ठेंगड़ी, दीनदयाल उपाध्याय – इतने बड़े इंटेलेक्चुअल, लेकिन कहीं दिखावा नहीं, कहीं घमंड नहीं। वे साधारण व्यक्ति की तरह काम करते थे।
गुरुजी (एम.एस. गोलवलकर) ने खुद स्वीकार किया था कि बनारस यूनिवर्सिटी की कोई किताब ऐसी नहीं जिसे उन्होंने नहीं पढ़ा, लेकिन डॉक्टर जी (हेडगेवार) के सामने आते ही उनकी सारी विद्वत्ता झाड़ी-झाड़ी रह गई। वे बस एक सिंपल डिसाइपल बन गए। व्यक्ति का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि आसपास के लोग देखकर खुद हिल-मिल जाते हैं, अपना महत्व कम हो जाता है।
यह गुण अन्य संगठनों में कम ही मिलता है। समाज में इलेक्शन के बाद चेयरमैन बनते ही लगता है – मैं भगवान हूं। लेकिन संघ में आपको कार्यवाह बना दिया, संघचालक बना दिया – फिर भी सबको सुनकर लेकर चलना है। अगर विचार सबको हजम नहीं हो रहे, तो रोक देना है। यह सब एक हायर गोल के पीछे है – मेरे से बड़ा संगठन है, मेरे से बड़ा राष्ट्र है। जहां यह भाव रहेगा, वहां संगठन चलेगा। संघ इस भाव को बनाए रखने के लिए कुछ स्पेशल करता है – और वह है शाखा।
शाखा में पिताजी आकर बेटे को प्रणाम करते हैं। अगर बेटा परेड सही नहीं कर रहा, तो पिताजी टोकते भी हैं। मजाक चलता है – कोई सीनियर शाखा में ले गया, तो बिहारी लाल अपने दोस्त रणजीत जी को ‘जी’ लगाता है, लेकिन उसके बेटे को नहीं। सबको इज्जत के साथ टोकना। शाखा का भाव यही है – सबकी सुनना, चाहे बड़ा हो या छोटा। मुख्य शिक्षक 10 साल का बच्चा भी हो, तो सुनना है, प्रणाम करना है। बैठक में सबको बोलने देना, विरोध नहीं करना – अपना तर्क रखना है। यही ट्रेनिंग है, यही सीक्रेट है।
इसलिए मोहन जी ने कहा था – संघ को समझना है तो सबसे पहले शाखा समझो। बाहर से कुछ दिखता नहीं, लेकिन अंदर से यही सब होता है। मैं हर तरह की मीटिंग्स में जाता हूं। जब लोकल एक्टिविज्म में इंटरेस्ट लिया, तो देखा कि लोग धीरे-धीरे मुझ पर विश्वास करते हैं – क्योंकि कोई तरफदारी नहीं, कोई बायस नहीं, सबको साथ लेकर चलता हूं।
ऐसे आप कहीं भी लीडर बन जाते हो। अन्य संगठन टूट जाते हैं क्योंकि फ्यूचर नहीं सोचते – “जब तक मैं हूं, मैं ही सब करूंगा”। बड़े-बड़े राष्ट्रीय संगठन सिर्फ इमारतों में समा गए। गुरु गया, शिष्य को ट्रेन नहीं किया, तो संगठन कमजोर हो गया। हिंदू संगठनों में (चिन्मय मिशन को छोड़कर) आज वह वाइटालिटी नहीं बची, क्योंकि संस्कार पासिंग ऑन नहीं होता। बार-बार उद्देश्य याद दिलाना, रिपीट करना – यही आपको याद रखवाता है कि हम किसके लिए काम कर रहे हैं। यह सब स्वयंसेवकों के कारण है। संघ चला है उनके निस्वार्थ भाव, ईगो कंट्रोल और शाखा की ट्रेनिंग से।
राहुल रौशन:
बीजेपी और संघ में फर्क क्या है?
रतन शारदा:
बीजेपी राजनीतिक पार्टी है, उसकी मजबूरियाँ अलग हैं। वोट बैंक, गठबंधन, सत्ता की राजनीति। संघ कैडर-बेस्ड है, लंबे समय की ट्रेनिंग देता है। बीजेपी को संघ से समझना गलत है। संघ को समझना है तो ABVP, भारतीय मजदूर संघ, विश्व हिंदू परिषद जैसी संस्थाओं को देखिए।
तीन तरह के चश्मे से लोग संघ को देखते हैं —
- नेहरूवियन लिबरल, जिन्हें संघ में राक्षस नजर आता है
- ‘संघी हूँ नेवर वेंट टू शाखा’ वाले, जो अपनी उम्मीदों के अनुसार संघ को क्रिटिसाइज करते हैं
- अल्ट्रा हिंदू, जो संघ को बहुत नरम मानते हैं और गाली देते हैं
सबसे ज़्यादा इरिटेट तीसरा चश्मा करता है, क्योंकि वो कभी ज़मीन पर काम नहीं करते और ऊपर से उपदेश देते हैं।
राहुल रौशन:
अंबेडकर और संघ के संबंध? डॉक्टर अंबेडकर की बात आ गई तो संघ की तरफ से एक क्रिटिसिज्म यह है कि आज का नव-अंबेडकरवाद (Neo-Ambedkarism) या न्यू अंबेडकर राइट्स में हिंदू समाज के प्रति वैमनस्य या जहर जैसा भाव दिखता है। खासकर हिंदू प्रतीकों के प्रति – जैसे दुर्गा को नकारकर महिषासुर को अपना बताना। यह क्रिटिसिज्म है कि संघ शायद इस थ्रेट को अनदेखा कर रहा है या समझना ही नहीं चाहता। अगर अंबेडकर को इतना आगे बढ़ाया जाएगा, तो ऐसी आवाजें भी उतनी ही मजबूत होंगी – जो खुद को हिंदू मानते ही नहीं, बल्कि हिंदू राष्ट्र की बात को प्रतिकूल मानते हैं।
रतन शारदा:
डॉ. अंबेडकर ने कभी संघ की डायरेक्ट बुराई नहीं की। उन्होंने कहा था — “आपका रास्ता लंबा है, मेरे पास समय नहीं।” आज के कुछ नव-बौद्ध लीडर अलग तरह का नैरेटिव चला रहे हैं, लेकिन संघ समरसता पर काम करता है। हमारे बहुत सारे एससी, एसटी, ओबीसी कार्यकर्ता हैं। रमेश पतंगे जैसे लोग इस पर गहन काम कर रहे हैं।
इस तरह की सोच अब नए एक्सट्रीम लीडर्स खड़े कर रही है, जो पहले नहीं थे। अंबेडकर खुद ऐसे नहीं थे। डिस्पाइट आरएसएस की ट्रेंचेंट क्रिटिसिज्म के बावजूद, अंबेडकर हमेशा हिंदू समाज में ही बने रहे। उन्होंने हिंदू समाज के लिए जो रिफॉर्म्स की बातें कीं, उनमें कटुता जरूर थी – जो उनके साथ हुआ, वह सही था – लेकिन उन्होंने कभी हिंदू समाज को छोड़ने की बात नहीं की। अब जो आज का अंबेडकरवाद है, वह अलग है। जैसे मेरे हाथ में जख्म है तो मैं हाथ काट दूंगा? नहीं, मैं काट नहीं सकता।
अंबेडकर ने हिंदू समाज पर सबसे बड़ा एहसान किया कि जब उन्हें दुनिया भर से लालच दिए गए – मुस्लिम बन जाओ, क्रिश्चियन बन जाओ – तो उन्होंने नहीं माना। उन्होंने कहा कि अगर मेरे समाज के लोग क्रिश्चियन या मुस्लिम बन गए तो यह डिनेशनलाइज हो जाएगा, भारत की सभ्यता से कट जाएगा। इसलिए उन्होंने स्वीकार नहीं किया। अब आज की नई पीढ़ी अगर कहती है कि मेरा संबंध ही नहीं है, तो उस पौध को समझाना पड़ेगा। संघ में बहुत सारे एससी, एसटी, ओबीसी कार्यकर्ता हैं, जो सालों से हैं और इस बात को मानते हैं कि हम अलग नहीं हैं। रमेश पतंगे जी एक इंटेलेक्चुअल हैं, उनकी किताबें हिंदी में भी आई हैं – जैसे “मैं मनु और संघ” या अंबेडकर पर उनकी इंटरप्रिटेशन।
वे मानते हैं कि हम समाज से अलग नहीं हैं। इसमें बौद्ध भी हैं, जैन भी हैं – सब हमारे साथ आते हैं। अगर मेरे हाथ में जख्म है या खराब हो रहा है, तो क्या मैं हाथ काट दूंगा? नहीं, हमारे ही लोग हैं। अगर डॉक्टर अंबेडकर ऐसा मानते तो बौद्ध समाज में नहीं लाते। वे सिख भी बनने को तैयार थे, लेकिन सिख गुरुओं ने ज्यादा साथ नहीं दिया।
आखिर में उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। उन्होंने कई सालों में एक नया रिलिजन जैसा बनाया (22 प्रतिज्ञाएं लीं), जो बौद्ध धर्म से अलग कुछ था। उनके फॉलोअर्स ने आगे बनाया। जब संघ शुरू हुआ, तो पंजाब में आर्य समाजी और सिख शाखा में नहीं आते थे। प्रार्थना के समय निकल जाते थे। हनुमान जी की फोटो भी कई शाखाओं में रखी जाती थी, तो वे कहते – हम मूर्ति पूजा नहीं मानते।
आर्य समाजी बहुत कट्टर थे। लेकिन हमारे प्रचारकों ने गुरु गोविंद सिंह की कहानियां सुनाईं, दयानंद सरस्वती के बारे में बताया। बताते-बताते पार्टीशन से पहले बड़ी संख्या में सिख समाज संघ से जुड़ गया। आर्य समाज के भी बहुत पावरफुल कार्यकर्ता संघ में मिलेंगे। आपको समय के साथ पर्सुएड करना पड़ता है। अनफॉर्चुनेटली आज सोशल मीडिया पर बिटरनेस बहुत ज्यादा है। उस समय विरोध होता था, नाराजगी होती थी, कटुता थी – लेकिन ऐसी जहर वाली कटुता नहीं थी कि “हम भाग ही नहीं”।
आज जो जहर फैला रहे हैं, वह पॉलिटिकल फायदे के लिए है। मुझे नहीं लगता कि उसका तथ्य है। लोगों को तथ्य समझना चाहिए। मैंने पब्लिक प्लेटफॉर्म पर नहीं कहना चाहता, लेकिन हमारे मीड में काम करने वाली एक नव-बौद्ध ने डॉक्टर अंबेडकर की पत्नी के बारे में क्या-क्या कहा – कि वो ब्राह्मण थीं। अच्छा, आगे नहीं जाऊंगा।
यह जहर नव-बौद्ध सर्कल्स में चल रहा है। समस्या है, लेकिन निराकरण है – रमेश पतंगे जैसे लोग, समरसता मैगजीन चलाने वाले, ऐसे बहुत सारे लोग समाज में जाकर बात करते हैं, समझाते हैं। वहां भी शाखाएं चलती हैं, विरोध होता है, फिर भी शाखा चलती है। यही रास्ता है – उनको साथ लेकर चलना। कोई और रास्ता नहीं। तर्क से लड़ सकते हो? नहीं। लड़ाई कर सकते हो? अपने लोग हैं, नहीं कर सकते।
गुरु जी कहा करते थे – विराट पुरुष समाज। अगर इसमें समस्या आई है, तो पर्सन से साथ लेकर चलकर समस्या दूर होगी। कोई इलाज नहीं। इतने आए क्यों? क्योंकि ये अपने लोग हैं। मायावती के गुरु ने कितनी कोशिश की, सत्ता पे आए। मायावती बदलीं। जब मायावती चीफ मिनिस्टर बनने वाली थीं, तो बीजेपी वाले बहुत विरोध कर रहे थे कि हम अलायंस नहीं देंगे।
रज्जू भैया (तब सरसंघचालक) ने कहा – अपने ही लोग हैं। पहली बार एक दलित महिला चीफ मिनिस्टर बनेगी। इसका इंपैक्ट क्या होगा? आज आपके बारे में गलत सोचती हैं, लेकिन आपके साथ रहेंगी, मिलेंगी तो विचार बदलेंगे। आपके व्यवहार से बदलेंगे। दैट इज हाउ द अलायंस टूक प्लेस। लंबी सोच रखेंगे तो इलाज होगा। जहां विरोध किया, उसको मार डालो, काट डालो – यह सोच नहीं चलती।
राहुल रौशन:
अगर एक क्रिटिसिज्म देखा जाए तो क्या आपको लगता है कि वह कितना वैलिड है — कि शायद संघ का अपना सोच या नजरिया, ये सारी चीजों को देखने का (यानी अंबेडकर, फुले वाले जो अब इसे प्रॉब्लम कहें, चैलेंज कहें या जो भी कहें), वो महाराष्ट्रियन माइंडसेट से ज्यादा प्रभावित है। क्योंकि संघ वहाँ से शुरू हुआ और वहाँ के एक्सपीरियंस से उसकी थिंकिंग बहुत ज्यादा कलर्ड हो गई है।
मतलब, एंटी-ब्राह्मणों के ज्यादा पक्ष में नहीं दिखना है। बात पेशवाई तक चली जाएगी। वहीं भारत बहुत बड़ा देश है। अगर मैं बिहार को देखूँ या थोड़ा और ईस्ट चला जाऊँ, या उत्तराखंड में देखूँ, तो वहाँ ब्राह्मण वर्ग के लोग भी OBC में लिस्टेड होते हैं। नॉर्थ-ईस्ट में तो बिल्कुल अलग किस्म की सिचुएशन है। तो ये जो एंटी-ब्राह्मिनिज्म है, वो एक तरीके से कह सकते हैं कि महाराष्ट्र सेंट्रल था और धीरे-धीरे अलग-अलग जगहों पर फैला — जैसे तमिलनाडु वगैरह में गया — लेकिन हर जगह नहीं गया था। तो क्या जाने-अनजाने में महाराष्ट्र के एक्सपीरियंस की वजह से संघ शायद (जो इंग्लिश में कहते हैं) “develop cold feet” कर लेता है, जब भी सो-कॉल्ड ब्राह्मिनिज्म का इश्यू आता है
रतन शारदा
अगर ऐसा होता तो संघ के सत्संगचालक एक ठाकुर छोड़कर बाकी सारे ब्राह्मण हैं। उसमें आधे नागपुर के हैं। ऐसा नहीं है। संघ कभी भी स्किप नहीं करता है। इसके क्रिटिसिज्म से भागता नहीं है। जैसे सावरकर भी ब्राह्मण थे। इन फैक्ट, सारे रिफॉर्मर्स में, सारे रिवॉल्यूशनरी ब्राह्मण थे। चाहे वह नक्सलवादी हों, चाहे कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख हों, चाहे कांग्रेस के हों, चाहे संघ के हों।
क्योंकि ब्राह्मणों को हिस्टोरिकल कारणों से ज्यादा कॉन्शियसनेस थी। पढ़े-लिखे ज्यादा थे। उन्हें अपनी बुराइयाँ दिखीं। उन्होंने अपने-अपने तरीके से रिफॉर्म किया। हम सब उसमें शामिल हो गए। सावरकर की बात करें तो सावरकर ने ब्राह्मणवाद के बारे में क्या कहा? नहीं, गाय के बारे में बहुत कुछ कहा है। अभी वही सावरकर संघ को बोलते थे कि संघ तो बेकार है। मतलब, यूजफुल कुछ करता ही नहीं है। एक कैंप में गए, बोले – तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो।
हाथ में तलवार, हाथ में गन लो। डंडे से कुछ नहीं होगा, गन लो। सबने सुन लिया। उन्होंने कहा कि संघ तो स्वयंसेवकों का आचार डालता है। उन्होंने कहा – संघ तो संघ के स्वयंसेवकों की क्या है? अंत में कहानी कि पैदा हुआ संघ में, क्या मर गया? कुछ नहीं करता। वही सावरकर 1942-43 में संघ की शाखा में, पुणे के कैंप में बिना बताए अपनी तरफ से आते हैं। उन्हें भाषण देने का मौका दिया जाता है। वो कहते हैं – हम जो काम कर रहे हैं, वो एक बारिश की धार की तरह है – पानी आता है, बह जाता है, साथ में मिट्टी भी ले जाता है।
संघ बाँध बनाता है उस पानी का, और उसके अंदर से अंकुर फूटते हैं। उसमें स्वयंसेवक निर्माण होते हैं। मैंने देखा और संघ का काम उत्तम काम है। वो भी उन्होंने कहा। हम तो इसी तरह ब्राह्मणवाद का विरोध ठीक है। भारत में साउथ में तो अलग जस्टिस पार्टी की अलग मूवमेंट चली और ब्राह्मणवाद का जो ज्यादा ड्रामा था, वो तो कांग्रेस वालों ने किया। एक्चुअली देखा जाए तो अंबेडकर से ज्यादा, अंबेडकर को तो नाम भी ब्राह्मण ने दिया था।
राहुल रौशन
कांग्रेस ने शायद नब्बे के दशक में किया होगा। पहले तो कांग्रेस में तिलक वगैरह भी तो कांग्रेस के ही थे।
रतन शारदा
किसी भी विषय को हाइप पर नहीं ले जाना संघ की विशेषता है।
राहुल रौशन
हाँ, वो तो मैं भी मानता हूँ।
रतन शारदा
अगर इसी वजह से हमें रेडिकल कहा जाए, तो फिर संघ को मौका देने में क्या देर लगती है? सरसंघचालक चाहते तो टॉप के 10 लोगों में ऐसे कई लोग हैं जो उसी सोशल बेस से आते हैं। इसमें एक इंटरेस्टिंग कहानी भी है कि एक नागपुर का कार्यकर्ता, जो टॉप 10 में जगह पाया, उसने पोस्ट डाल दी।
किसी मध्य प्रदेश वाले ने लिखा – देखो, एक ब्राह्मण आ गया और एक एससी-एसटी का मौका चला गया। वो भी उसी ग्रुप में था। उस व्यक्ति ने उससे पूछा – आप क्या उस वर्ग से हो? यानी उसके साथ 30-40 साल से काम कर रहा है, लेकिन उसे पता ही नहीं था। जिसे बोला गया, वो मुस्कुराकर चुप हो गया। इस तरह संघ में जातिवाद का स्थान ही नहीं है। लोगों को यह पता है। लेकिन ब्राह्मणवाद की बात छोड़िए।
ब्राह्मणवाद तो हम मानते ही नहीं। हम कहते हैं कि ब्राह्मण समाज ने बहुत अच्छे काम भी किए, जिसके कारण धर्म बचा। लेकिन जो गलत हुआ, उसे स्वीकार करना पड़ेगा। जब रिजर्वेशन की बहस बहुत गरमागरम चल रही थी, प्रतिनिधि सभा में प्रस्ताव आया। बाला साहब (देवरस) सरसंघचालक थे। बहुत गरमागरम बहस चली। उस समय डॉ. बाला साहब बहुत बीमार थे। ऊपर के कमरे से सब सुन रहे थे। उन्होंने कहा – मुझे नीचे जाना है, आज मैं नीचे जाऊँगा। मुझे कुछ बोलना है। वे हिल भी नहीं सकते थे, बहुत बीमार थे। सबने कहा – क्या करोगे? उन्होंने कहा – मुझे जाना ही है। गए और बोले – मैंने सब सुना, आपने जो कहा वो भी सुना। सब अपनी जगह अपने विचार रख सकते हैं। लेकिन अब जब बहस करें, तो ये सोचिए कि आप जो बात कर रहे हो, वो उस समाज के उस खास घर से, उस झोपड़ी से पैदा हुआ है। उसके बाद बहस करिए। और उस दिन रेजोल्यूशन पास हो गया – दो घंटे के अंदर रिजर्वेशन को स्वीकार करते हुए।
उसके बाद सालों बाद वी.पी. सिंह के समय हंगामा हुआ था, उससे पहले भी 80 के दशक में मराठा यूनिवर्सिटी में इसी विषय पर बोल चुके थे। इसके बाद जगह-जगह कार्यकर्ताओं की बैठकें हुईं, वर्कशॉप्स हुईं। ऐसे भी प्रचारक थे जो उस वर्ग से थे, हमें भी नहीं पता था। बाद में पता चला। उन्होंने इतने तड़प के साथ और लॉजिकली विषय रखा कि सब मान गए कि संघ सही कह रहा है। ये जो पर्सिव पावर है – जब आप सामने वाले की स्थिति बताते हो और हम उसे खुशी से स्वीकार करते हैं।
मेरे घर में झगड़ा होता है, रिश्तेदारों में झगड़ा होता है। जब मैंने सुना, तो मैंने भी कहा – अभी क्या गलत है? रिजर्वेशन होना चाहिए। आगे जाकर कहाँ तक खींचना चाहिए, वो अलग बात है, लेकिन रिजर्वेशन होना चाहिए। ये बात हमने स्वीकार कर ली। तो लोगों को एजुकेट करने के अलावा कोई चारा नहीं है।
इतिहास में पेशवाई वगैरह महाराष्ट्र का अलग है। नो डाउट, महाराष्ट्र में एक्सट्रीम पर गया है। सोशलिस्ट में भी सारे लीडर ब्राह्मण थे – मधु लिमये लो, डांगे लो। तो ब्राह्मण होना पाप नहीं है। ब्राह्मणवाद गलत है। उच्च-नीच मानना गलत है। इसके बारे में बाला साहब देवरस ने खुलकर कहा। गुरुजी ने भी खुलकर कहा, प्यार से झाड़ देते थे। करपात्री महाराज ने एक बार कहा – तुम इतने स्वयंसेवक हैं, चतुर वर्ण शुरू करो, ये क्या कर रहे हो? लोग तुम्हारी बात मानेंगे।
गुरुजी ने विनम्रता से कहा – देखिए, मैं तो प्रमुख हूँ, शंका है, लेकिन मेरी बात सब मानेंगे ऐसा नहीं है। आप तो इतने बड़े संत हैं, आपके लाखों शिष्य हैं। आप पहले अपने यहाँ लागू करिए। लागू कर दिया तो मुझे बताइए, मैं करूँगा। वे बहुत नाराज होकर उठकर चले गए। ये गुरुजी का स्टैंड था। कुछ मठ वाले आए, बोले – ये फलाना ब्राह्मण का है। उसने कहा – मैं ऐसी बातें नहीं मानता। पुरानी हो गईं, आज यूजलेस हैं। जो था वो हो गया। तो उस प्रगतिशील विचार से अगर उठकर आते हैं।
विश्व हिंदू परिषद ने 1969 में शंकराचार्य के मुंह से कहलवाया – “हिंदू न पति तो भवेत् हिंदवा सहोदरा” और कोई ऊँच-नीच नहीं है। जातिवाद गलत है। इससे बड़ी शक्ति क्या हो सकती है? लेकिन यह कहलवाने के लिए बहुत सब्र लगता है। एक-एक व्यक्ति से मिलना पड़ता है, पैर पड़ना पड़ता है। गुरुजी बड़े-बड़े संतों के पैर पड़े थे। 100 से ऊपर संप्रदायों के लोग स्टेज पर एक ही लेवल पर बैठे। वो उनके लिए असंभव था।
शंकराचार्य ने बात स्वीकार की। ये रिफॉर्मिस्ट बनाने का तरीका है, लोगों को पता नहीं है। लोग समझना नहीं चाहते। ये मेहनत का तरीका है। लेकिन हिंदू समाज को साथ लेकर चलने का यही तरीका है। और कोई तरीका है ही नहीं। भाषण देकर तो बड़े-बड़े पड़े गए। सावरकर से बड़ा ब्रिलियंट दिमाग कोई नहीं था।
जितने नाम लिए, उनमें सबसे ब्रिलियंट सावरकर थे। और उन्होंने कहा जब कोई बोलने को तैयार नहीं था – पतितवान मंदिर में जाना है, तो पहले मेरे पतित (हरिजन) कैंटीन में खाना खाना पड़ेगा, फिर मंदिर में आना। वो व्यक्ति भी इस महासभा को नहीं चला पाया।
उसको चलाने के लिए अलग मेंटालिटी चाहिए। हिंदू समाज को संभालकर साथ लेकर चलने की, खुद को एक्सट्रीम पर नहीं ले जाने की। हिंदू समाज एक्सट्रीमिज्म नहीं मानता। अगर आप एक्सट्रीम बात करोगे, तो दो कदम पीछे हट जाता है। वो हिंदू समाज जो खुद को हिंदू कहने से शर्माता था और अपनी कमजोरियाँ मानता था, आज 100 साल में यहाँ तक आया। सोचिए, उसे 100 साल लगे।
तो जो कहते हैं कि संघ को पता नहीं क्या करना है, उन्हें ये भी याद रखना चाहिए कि 1946-47 में सबसे लड़ाइयाँ करके, जान पर खेलकर हिंदू-सिखों को बचाने वाले संघ के ही लोग थे।
राहुल रौशन:
अगर मैं बाल की खाल थोड़ी सी निकालूँ, आपके आज्ञा से, तो जैसे आपने कहा कि संघ एक रिफॉर्मिस्ट ऑर्गेनाइजेशन है और मैं उससे completely agree करता हूँ। आपने ये भी साथ में कहा कि एक वक्त था जब लोग खुद को हिंदू कहने से शर्माते थे और संघ ने उस चीज को बदल दिया है। लेकिन जब आप रिफॉर्मिस्ट माइंडसेट की बात करते हैं, तब आप मान रहे हैं कि कुछ चीजें deformed (विकृत) हैं। तब तो आप ये भी मान रहे हैं कि आपके अंदर कुछ ऐसी चीजें हैं जिन पर शर्मिंदगी हो सकती है।
रतन शारदा
डॉक्टर जी ने भी कहा था। डॉक्टर जी ने कब नहीं कहा? डॉक्टर जी ने संघ की स्थापना का कारण यही बताया था कि हमारा समाज जाति-पात में बँटा हुआ है। इसी कारण हम हर बार मार खाते हैं और इसे दूर करना है। हम एक ऐसी हायर एंटिटी देनी है जिसमें सब समा जाएँ। शुरुआत तो वहीं से थी।
डॉक्टर जी ने एक घटना में एक माइनर बच्ची की शादी किसी पुरुष से हो रही थी। उनका दोस्त था, उसने कहा – मेरी भतीजी है, इसकी शादी हो रही है, ये बड़ा गलत हो रहा है। डॉक्टर जी ने कहा – गलत हो रहा है, विश्वास है? उसने कहा – हाँ। तो बोले – साथ देंगे? वो वहाँ गए और बच्ची को किडनैप कर लिया। डॉक्टर जी ने उसे गोद लिया और जब वो 18 साल की हुई तो उसकी शादी करवाई।
इसके लिए उनके ऊपर पुलिस में कंप्लेंट हुई, केस भी चला, ईस्ट एक्सचेंज तक की बात आई। डॉक्टर जी की वो सोच आज भी है। तो आप कहें कि रिफॉर्म करने की आवश्यकता कब मानी? इसी लिए तो विश्व हिंदू परिषद बनी। इसलिए मैंने कहा न कि “हिंदु न पति तो भवेत् हिंदवा सहोदरा” कहलवाना और जाति-पात अब वैलिड नहीं है, यह शंकराचार्यों से कहलवाना कोई छोटी उपलब्धि नहीं थी। हम समझते ही नहीं कि जब 100 संत कहते हैं कि छुआछूत गलत है, तो समाज पर उसका कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।
जिस दिन आप इसे समझेंगे, तब पता चलेगा कि हम ये मानते हैं, लेकिन उसको गलिच्छ भाव से, हीन भाव से या घृणा से नहीं देखते। वो हमारे ही लोग हैं। हमारे ही लोगों ने गलती की है। हमारा ही काम है सुधारना। जब हमारा समाज यह मान लेता है, तो सुधार होता है। कभी “तू ऐसा क्यों करता है, तो सुधर” कहकर समाज नहीं बदलता। लेफ्टिस्ट तरीका क्या है? सामने वाले को उंगली दिखाना। हम कहते हैं – तीन उंगली हमारी तरफ हैं ना। हमारा ही समाज था जिसने किया।
मोहन जी भी कहते हैं ना कि 500 साल, 600 साल, 1000 साल जो भी हमने किया, उसके लिए हम तीन-चार-पाँच पीढ़ी सहन नहीं कर सकते। हाँ, घृणा का भाव जब आएगा कि मैं एहसान कर रहा हूँ, तुम पर रिजर्वेशन दिया और तुम गलत कर रहे हो, तुम्हारे यहाँ भी गलत है – ऐसे उंगली उठाने का तो हर समाज में होता है।
क्रिश्चियन में नहीं है? वहाँ कोई स्त्री बिशप नहीं बन सकती। कोई उंगली उठाता है तो कहते हैं क्रिश्चियनिटी को सुधारो। वहाँ जातिवाद नहीं है? कोई बाहर आकर नारे लगाता है, स्वीकार कर लिया, चुपचाप आज भी चल रहा है। हम तो कम से कम जातिवाद को अस्वीकार कर रहे हैं। हम वर्ण-आधारित इस तरह की जाति व्यवस्था को इंकार कर रहे हैं। क्रिश्चियन तो इंकार भी नहीं कर रहे। आज भी क्रिश्चियन कहता है – मैं ब्राह्मण क्रिश्चियन हूँ। आज भी मुस्लिम कहता है – मैं अशरफ हूँ, मैं पसमंदा से शादी नहीं करूँगा। उसके अंदर भी कई कुल-जातियाँ हैं। 72 तरह की तो हैं। जब तक वो खुद स्वीकार नहीं करेंगे, सुधरेंगे कैसे? हम तो ढकते नहीं हैं ना। लोग ढक-ढककर, प्रगतिवाद बताकर यहाँ तक आए हैं।
कम्युनिस्ट ने स्वीकार किया? उनके क्रांतिकारी ब्राह्मण थे। उनके अंदर कोई दलित नहीं था। 90 साल तक कम्युनिस्ट पॉलित ब्यूरो में। अब जो बना वो भी कन्वर्टेड क्रिश्चियन है – डी. राजा। आप सोचिए, इतने प्रगतिवाद करने वालों को 90 साल तक पॉलित ब्यूरो में महिला नहीं मिली। महिला फिर बाद में वृंदा करात मिली, जो किसी सेक्रेटरी की बहन या पत्नी थी। दूसरे की बहन। वहाँ दलित एक भी नहीं मिलता। हमने तो इतने सारे जगह-जगह पहुँचा दिए, सब जगह पहुँच गए। इतने बवाल मचाने के बाद भी उन्हें एक व्यक्ति नहीं मिला। जिस समाज में काम करने का क्लेम करते हैं, उसमें से एक व्यक्ति भी नहीं मिला क्या?
राहुल रौशन:
आखिरी सवाल — संघ के सौ साल बाद भी बहुत कुछ करना बाकी है?
रतन शारदा:
बिल्कुल। अभी तो समाज तक पहुँचने का काम शुरू हुआ है। पंच-परिवर्तन की बात हो रही है। संघ का सफर अभी लंबा है।
राहुल रौशन:
बहुत-बहुत धन्यवाद रतन शारदा जी। संघ को समझने के लिए आज बहुत कुछ जाना।
नमस्कार!





