किसी भी लोकतंत्र में सरकार बदलती रहती है, लेकिन असली ताकत उस स्थायी तंत्र के पास रहती है जिसे हम Establishment कहते हैं। यही विश्वविद्यालयों में विचार गढ़ता है, यही मीडिया का टोन तय करता है, और यही समाज के दिमाग में धीरे-धीरे नैरेटिव इंजेक्ट करता है। मजेदार विरोधाभास ये है कि यही पूरा इकोसिस्टम खुद को जनता के सामने “एंटी-एस्टेब्लिशमेंट” बताने का स्वांग भी करता है, जबकि असल में सत्ता की चाभी इन्हीं के हाथ में रहती है। ये बहुत ही लोकप्रिय किस्म का ट्वीट ऑपइंडिया के CEO राहुल रौशन ने कुछ साल पहले अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया था, जो कि आज भी उनके प्रोफाइल पर Pinned है। अब ऑपइंडिया को ही एक ग्लोबल एस्टेब्लिशमेंट ने ग्लोबल थ्रेट नाम दिया है। इस ग्लोबल एस्टेब्लिशमेंट का नाम है RSF।
OpIndia मतलब ‘Hindu nationalist media’
RSF यानी Reporters Sans Frontieres; जिसे हम ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ नाम से जानते हैं । इसे आप दुनियाभर के जिहादी, वामपंथी पत्रकारों और थिंक टैंक्स का काबा नाम दे सकते हैं। RSF ने जो नई लिस्ट निकाली है, उसमें OpIndia के साथ नाम हैं एलन मस्क, इज़रायल की IDF, पुतिन, और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी। और ये लिस्ट देखकर पहला ख्याल यही आया कि अब तो एलन मस्क भी कहेंगे कि “Hey OpIndia, take me in.. I want to join your editorial team.” और opindia इधर से कहेगा कि let that sink in.. क्योंकि जो लिस्ट बनाई गई है, उसमें होना असल में एक वैलिडेशन है कि आपने किसी बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय इकोसिस्टम को हिलाकर रख दिया है।
यानी पहले जो ग्लोबल लेफ़्टिस्ट इकोसिस्टम कहता था कि OpIndia क्या है, अब वहीं, OpIndia कह रहा है कि तू क्या है बे? चाहे Wikipedia हो, दी गार्डियन हो, BBC, या ऑपइंडिया के ख़िलाफ़ ‘Stop funding hate’ जैसे कैंपेन चलाने वाले लोग हों, हर किसी को आज इस बात से समस्या है कि OpIndia ने उस नेक्सस की जड़ों तक प्रहार किया है और उन्हें आहत किया है। और इसके बदले में RSF जैसी संस्थाओं ने OpIndia को नाम दिया है – हिंदू नेशनलिस्ट मीडिया (Hindu nationalist media)। जिसे कि हम बड़ी ख़ुशी से स्वीकार भी कर रहे हैं।
RSF ने इस लिस्ट में जो तर्क दिया है वो बड़ा दिलचस्प है। उनका दावा है कि OpIndia ने 2025 में “पत्रकारों पर हमले बढ़ाए”, “स्मियर कैंपेन चलाए”, “आलोचकों को धमकाया” और इन आरोपों का आधार हमारी दो तथ्यात्मक रिपोर्ट्स हैं।
पहली रिपोर्ट: OpIndia का वो डिटेल्ड रिसर्च पेपर, जिसमें CSDS की फंडिंग, उसके विदेशी नेटवर्क, और भारत में सिविल सोसायटी की आड़ में होने वाले रेजिम चेंज मॉडल को एक्सपोज किया गया था। उस रिसर्च ने यह साफ किया था कि CSDS सिर्फ़ एक रिसर्च सेंटर नहीं, बल्कि विदेशी एजेंसियों का एक Well-oiled ideological relay point है।
दूसरी रिपोर्ट थी The News Minute की धन्या राजेंद्रन पर; जिन्हें RSF ने पूरा का पूरा पीड़ित घोषित कर दिया। लेकिन RSF आपको यह नहीं बताएगा कि TNM ने एक केस में – जहाँ अपराधी एक मुसलमान था, जिसने अपनी ही बेटी का रेप किया- वहाँ रिपोर्ट में अपराधी का नाम मुस्लिम के बदले हिंदू का बताकर पेश किया।
यानी अपराध किया अब्दुल ने, पर फ़ोटो में नुकसान सहें मनसुख। इस तरह की Communal optics engineering को अगर ‘पत्रकारिता’ कहा जाए, तो फिर लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ एक नैरेटिव वॉरफेयर है। यही वजह है कि जब The News Minute ने हाल ही में कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर पर फर्जी नैरेटिव चलाया और सोशल मीडिया पर बुरी तरह पकड़े गए, तब RSF पूरी तरह चुप रहा। न कोई रिपोर्ट, न कोई आलोचना, न कोई fact-check की माँग। क्योंकि इन पोर्टलों में फैक्ट्स महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इनकी उपयोगिता महत्वपूर्ण है।
RSF तब भी चुप रहा जब ममता बनर्जी के बंगाल में पत्रकारों पर हमले किए जाते हैं, उन्हें कैमरा के सामने पुलिस उठाकर ले जाती हैं। यहाँ तक कि जिस ऑपइंडिया को RSF प्रीडेटर बताता है, उसी की एडिटर-इन-चीफ नूपुर J शर्मा को बंगाल पुलिस की प्रताड़ना से तंग आकर बंगाल ही छोड़ना पड़ा। और सिर्फ़ बंगाल नहीं, कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकारें आए दिन पत्रकारों को किसी ना किसी तरह से टारगेट करती है, लेकिन RSF को उसमें भी कोई समस्या नजर नहीं आती।
समस्या यहाँ ये नहीं है कि OpIndia ने किसी को एक्सपोज किया। समस्या यह है कि OpIndia ने उन लोगों को एक्सपोज किया जिन्हें पश्चिमी फंडिंग वाले नेटवर्क भारत में Narrative-setting assets की तरह इस्तेमाल करते हैं। अब सवाल उठता है कि RSF आखिर है कौन? ये खुद को प्रेस फ्रीडम का मसीहा बताते हैं, पर इनका अपना फायनेंशियल रिपोर्ट कार्ड पूरी पोल खोल देता है।
इनके 2021 के फाइनैंशियल स्टेटमेंट में सीधी Funding दी है- फ्रांस की सरकार ने, नीदरलैंड्स की सरकार ने, UK के विदेश मंत्रालय ने, और अमेरिका के NED ने। वही NED जो Officially Democracy-Promotion का काम करता है, लेकिन Practically, दुनिया भर में Regime-change ecosystem बनाने के लिए जाना जाता है। इसके अलावा Ford Foundation और George Soros की Open Society Foundation जैसी संस्थाओं ने भी मोटी रकम दी है। सिर्फ़ एक साल में 5 मिलियन यूरो। अब कोई भी सरकार किसी विदेश की प्रेस-फ्रीडम के लिए इतना पैसा नहीं देती। ये पैसा Strategic Interests के लिए दिया जाता है, ताकि दुनिया के देशों में Narrative Hubs बन सकें, वही हब मीडिया रिपोर्टिंग के जरिए Political pressure tools की तरह इस्तेमाल किए जाएँ।
यह वही मॉडल है जिसे हम बांग्लादेश, पाकिस्तान, जॉर्जिया जैसे देशों में होते हुए देख चुके हैं- जहाँ सिविल सोसायटी, विदेशी NGO, और फंडेड पत्रकार मिलकर सरकारों को अस्थिर करने की कोशिश करते हैं। RSF उन्हीं सिलसिलों का वैचारिक चमचा है। और भारत में इस नेटवर्क का प्रमुख enabling-point है TNM, Caravan, Scroll, Wire जैसे पोर्टल, जिनकी रक्षा RSF उसी intensity से करता है जैसे कोई राजदरबार अपने दरबारी मसखरों की करता था।
RSF ने OpIndia को प्रीडेटर क्यों कहा?
कारण बेहद सरल है- क्योंकि हम Narrative Suppliers को काटते हैं, उनके मास्टर्स को पहचानते हैं, और उनकी फंडिंग का स्रोत उजागर करते हैं। CSDS पर की गई रिसर्च रिपोर्ट, TNM की वैचारिक व्यापारिकता को बेनक़ाब करना, और इन विदेशी फंडिंग चैनलों को समझाना- ये सब उस तंत्र को चुभता है जिसने भारत को एक Perpetual Psychological Colony यानी मानसिक उपनिवेश बनाकर रखने का प्लान बना रखा है। जब ये तंत्र किसी संस्था को “Global Threat” कहता है, तो इसका मतलब ये नहीं कि वह संस्था ख़तरनाक है। इसका मतलब है कि वह संस्था उनके लिए कारगर नहीं है। वो संस्था उनके मकड़जाल से बाहर है। वो संस्था Reporters Without Orders है।
अगर सच लिखना प्रीडेशन है, तो हम Proudly प्रीडेटर हैं। और जिन्हें ये चोट अभी लगी है, उन्हें समझ लेना चाहिए कि ये आख़िरी नहीं है। अभी विदेशी फंडिंग के नेटवर्क पर सिर्फ़ एक खरोंच पड़ी है लेकिन आगे पूरी चमड़ी उतरनी बाकी है। OpIndia उन हर समूहों पर चोट करता रहेगा जो भारत-विरोधी, हिंदू-विरोधी, और एजेंसी-बेस्ड नैरेटिव्स को देश की मानसिकता में इंजेक्ट करते हैं। और OpIndia ने अपनी कलम के हथियार से इन्हें जो जख्म दिया है, वो जख्म इन्हें बार-बार मिलता रहेगा। यही लड़ाई है, और यही लड़ाई जारी रहेगी।




