किसी जमाने में अपराध के पर्यायवाची माने जाने वाले बिहार से, हाल ही में अपराध से संबंधित ऐसे आँकड़े आए हैं, जो अपने आप में एक सुखद खबर है। आज से 25 वर्ष पहले तक बिहार ‘जंगल राज’ के कलंक से जूझ रहा था। लेकिन आज स्थितियाँ बदल चुकी हैं। आँकड़े भी इस बात की गवाही देते हैं।
2004 में जहाँ डकैती के 1,297 मामले थे, वह 2025 आते-आते महज 174 तक सिमट के रह गए। इसके अलावा पुलिस भी बड़ी संख्या में मादक पदार्थों को, अवैध हथियारों को तथा अवैध वाहनों को जब्त कर रही है, जिससे अपराध की संख्या में भारी कमी आई है।
एक समय ऐसा था जब बिहार को दंगों का केंद्र कहा जाता था। सन 2001 के आसपास 8,520 दंगों के केस रजिस्टर हुए, जो 2025 आते-आते महज 2500 तक सिमट रह गए हैं।
हालांकि यह आंकड़े बिल्कुल अपराध मुक्त प्रदेश को तो नहीं दिखाते, लेकिन जो राज्य कभी हत्या, नरसंहार और दंगों के लिए जाना जाता था,उस राज्य में इस तरीके के केसेस का इतना तेजी से कम होना अपने आप में सुखद है। जिस राज्य ने शहाबुद्दीन और साधु यादव जैसे अपराधियों की बर्बरता देखी, वह राज्य आज के दौर में एक शांत राज्य बनने की ओर अग्रसर है।
इन आंकड़ों से इतर, मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव भी आपको बताऊं। बिहार चुनाव के दौरान OpIndia की टीम बिहार ग्राउंड रिपोर्ट पर थी। उस दौरान मैंने देखा कि जिस बिहार में 90 के दशक में शाम के 5 बजे के बाद पुरुष तक बाहर नहीं निकलते थे उसी बिहार में रात के 10 बजे भी महिलाएं तक बाहर निकल कर शॉपिंग कर रही हैं।
यहाँ यह बात भी ध्यान देने वाली है कि 2001 में बिहार की जनसंख्या 8 करोड़ के आसपास थी, जो अब बढ़कर 13 करोड़ तक पहुंच चुकी है। आबादी इतनी बढ़ने के बावजूद, अपराध का कम होना, बिहार में बीते 20 वर्षों में नीतीश कुमार के नेतृत्व में हो रहे परिवर्तन को दिखा रहा है।





