Etawah matter

इटावा: जाति के कारण पिटे कथावाचक? क्यों छिपाई गई छेड़खानी की बात?

Summary
इटावा से आए वायरल वीडियो में बताया गया कि कथवाचकों को ब्राह्मण न होने के कारण पीटा गया। जबकि यह मामला "जाति" का नहीं बल्कि "छेड़खानी" का था।

उत्तर प्रदेश के इटावा के एक गाँव में कथित कथावाचकों के साथ मारपीट हुई, जिसमें यह कहा गया कि उन कथवाचकों को ब्राह्मण न होने के कारण पीटा गया। इस मामले में चार लोगों को गिरफ्तार किया गया और बकेवर थाने में दो नामजद और 50 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ है।

लेकिन हाल ही में इस घटना में एक नया मोड़ आया है। शुरुआत में तो इस मामले को जातीय उत्पीड़न के रूप में सामने रखा गया। लेकिन अब गाँव की ही महिला रेनू तिवारी ने कथावाचक मुकुट मणि यादव पर छेड़छाड़ का गंभीर आरोप लगाया है।

पीड़िता रेनू के अनुसार, कथा के पहले दिन भोजन परोसते समय कथावाचक ने उनके साथ अभद्रता की थी, जिसकी शिकायत उन्होंने अपने पति से की। पीड़ित का दावा है कि कथावाचक ने कलश यात्रा के दौरान उनका हाथ गलत नियत से पकड़ा और जब इसका विरोध किया गया तो कथावाचक ने धमकी दी कि वह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के रिश्तेदार हैं।

इसके बाद गुस्साए परिजनों और ग्रामीणों ने मारपीट की, जो कि निश्चित रूप से गलत है। अगर कुछ शिकायत थी, तो पुलिस को शामिल किया जा सकता था।

लेकिन अब जब वीडियो वायरल हुआ और इसमें जाति का एंगल जोड़ा गया, तो पूरे गाँव को कटघरे में खड़ा कर दिया गया। गाँववालों का पक्ष जब सामने आया तो पता चला कि यह मामला “जाति” का नहीं था, बल्कि “छेड़खानी” का था।

पुलिस दोनों ही तरफ के लोगों के आरोपों पर जाँच कर रही है। जल्द ही पुलिस सारी चीज़े सामने लेकर आ जाएगी।

लेकिन इस मामले में ब्राह्मण बनाम अन्य जातियों के कथावाचक का जो दृष्टिकोण पेश किया जा रहा है, वह अत्यंत सतही और भ्रामक है।

समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव जैसे लोग इस विषय को जानबूझकर राजनीतिक लाभ के लिए हवा दे रहे हैं। सच्चाई यह है कि सनातन धर्म में कथावाचन और भक्ति का कोई जातिगत बंधन कभी नहीं रहा।

यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है और इसका सबसे सशक्त प्रमाण है महाभारत की ‘व्याध गीता’। इस कथा में एक व्याध, एक शिकारी, जिसे परंपरागत रूप से निम्न वर्ग माना जाता था, वह एक ब्राह्मण को धर्म और कर्म का गूढ़ उपदेश देता है।

इस उपदेश को भगवद्गीता जितना ही मूल्यवान और श्रद्धा के योग्य माना गया है। सनातन परंपरा में ज्ञान, भक्ति और कथा, इन तीनों के लिए कभी जाति आड़े नहीं आई। हिन्दू धर्म में ऐसे अनेक कथावाचक हैं, जो ब्राह्मण नहीं हैं। मोरारी बापू जैसे कथावाचक भी जाति से ब्राह्मण नहीं हैं, लेकिन उनके साथ तो कोई हिंसा आजतक जाति के आधार पर नहीं हुई।

सिर्फ यादव समाज में ही अनेक कथावाचक हैं। हेमराज सिंह यादव हैं, सरिता यादव जी हैं, शास्त्री नीलम यादव जी हैं, मनोरमा यादव जी हैं, जिन्हें करोड़ो की संख्या में सुना जाता है। इनके साथ तो आजतक कोई हिंसा जाति के आधार पर नहीं हुई।

कथावाचक छोड़िये, हमारे यहाँ तो महर्षि वाल्मीकि जैसे ऋषि भी हुए हैं, जो ब्राह्मण नहीं थे, लेकिन पूरे हिन्दू समाज के लिए श्रद्धेय हैं। हनुमान प्रसाद पोद्दार की तो गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित रामचरितमानस की टीका है, जो आज विश्व में सबसे अधिक पढ़ी जाती है। वे भी गैर-ब्राह्मण थे।

इसलिए, फ़िलहाल यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि कथावाचक के साथ हुई घटना केवल उनकी जाति के कारण हुई। इसलिए सिर्फ इस कोण को लाना कि ब्राह्मण न होने के कारण पीटा गया, यह थोड़ी जल्दबाज़ी है।

थोड़ा इंतज़ार करना चाहिए, पुलिस कुछ दिनों में सारी परतें खुद ही सामने लाकर रख देगी। कई बार किसी घटना पर हम सबसे बेहतर यही कर सकते हैं, कि हम इंतज़ार करें, जब तक पुलिस सच्चाई को सामने लाकर न रख दे।

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