पंजाब केसरी को धमका रही AAP सरकार

पंजाब: खालिस्तानियों ने जिस पंजाब केसरी के संस्थापक की हत्या करवाई थी, AAP की भगवंत मान सरकार का उसी अख़बार पर हमला

Summary
दिल्ली में हार के बाद बौखलाई AAP सरकार? पंजाब में पंजाब केसरी की प्रिंटिंग प्रेस पर छापेमारी, कर्मचारियों से मारपीट और मीडिया को दबाने का आरोप, विपक्ष ने बताया लोकतंत्र पर हमला।

आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी घटना की, जो सीधे-सीधे लोकतंत्र की जड़ों पर हमला है। कल्पना कीजिए – एक बड़ा, पुराना, भरोसेमंद अखबार… और अचानक उसकी प्रिंटिंग प्रेस पर पुलिस की छापेमारी! कर्मचारी हिरासत में, मारपीट, घायल लोग अस्पताल में।

ये कोई फिल्म का सीन नहीं, बल्कि जनवरी 2026 की हकीकत है,पंजाब में । दिल्ली विधानसभा चुनावों में AAP को करारी हार मिली। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी बौखला गई। और अब भगवंत मान की पंजाब सरकार ने अपना गुस्सा निकालना शुरू कर दिया – किस पर? लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर – मीडिया पर!

असल में हुआ क्या था? 31 अक्टूबर 2025 को पंजाब केसरी ने एक रिपोर्ट छापी – AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पर लगे कुछ गंभीर आरोपों पर। रिपोर्ट निष्पक्ष थी, फैक्ट्स बेस्ड थी। लेकिन AAP सरकार को ये बर्दाश्त नहीं हुआ। 2 नवंबर 2025 से पंजाब केसरी ग्रुप को सरकारी विज्ञापन पूरी तरह बंद कर दिए गए। आर्थिक दबाव डाला। फिर भी अखबार ने हिम्मत नहीं हारी।

तो सरकार ने अगला कदम उठाया – सीधे हमला। 11 जनवरी से 15 जनवरी के बीच क्या-क्या हुआ? FSSAI की रेड जालंधर के होटल पर, GST डिपार्टमेंट की छापेमारी, एक्साइज डिपार्टमेंट का छापा। फैक्ट्रीज डिपार्टमेंट ने प्रिंटिंग प्रेस पर रेड डाली – लुधियाना, जालंधर। पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने एक्शन लिया। बिजली काट दी गई।

पुलिस की भारी तादाद में बठिंडा, लुधियाना, जालंधर की प्रेस के बाहर तैनाती की गई। कर्मचारियों को हिरासत, मारपीट की गई और उन्हें भयंकर चोटें आई। ये सब एक साथ, कोऑर्डिनेटेड तरीके से।

पंजाब केसरी ग्रुप ने मुख्यमंत्री भगवंत मान और राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को डिटेल्ड लेटर लिखा। एक एक बिंदु में सब लिखा – ये बदले की कार्रवाई है। विपक्ष चीख-चीखकर कह रहा है – प्रेस फ्रीडम पर हमला! BJP, कांग्रेस सब एकजुट। हरियाणा के CM नायब सैनी ने भी ट्वीट करके खरी-खोटी सुनाई।

अब थोड़ा इतिहास याद कीजिए। 1980-81 का वो दौर जब खालिस्तानी उग्रवादियों ने पहले निरंकारी गुरु की हत्या की गई। फिर 1981 में पंजाब केसरी के फाउंडर लाला जगत नारायण की गोली मारकर हत्या कर दी। वजह? वो हिंदू अल्पसंख्यकों की आवाज थे, खालिस्तान के खिलाफ लिखते थे। हत्यारों का मैसेज साफ था – “जो लिखेगा, वो मरेगा!”

आज 2026 में वही पैटर्न, बस तरीका बदला है। पहले बंदूकें थीं, अब सरकारी मशीनरी – पुलिस, डिपार्टमेंट्स, रेड्स। पहले उग्रवादी थे, अब ‘आम आदमी’ की सरकार, जो लोकतंत्र की दुहाई देती है। दिल्ली में शीशमहल या शराब नीति पर सवाल करो, तो मीडिया बैन। अब पंजाब में वही कॉपी-पेस्ट!

सवाल ये है – क्या पंजाब को मुख्यमंत्री चलाता है, या कोई इनका ‘सुपर बॉस है’ या फिर ये किसी को खुश कर के इतिहास दोहराना चाहते हैं? क्या ये 1975 की इंदिरा गांधी की इमरजेंसी जैसा दौर है? प्रेस चुप हो गई, तो लोकतंत्र का क्या बचेगा?

ये सिर्फ एक अखबार की लड़ाई नहीं – ये हम सबकी आजादी की लड़ाई है। अगर आज पंजाब केसरी चुप हो गया, तो कल आपकी आवाज कौन सुनेगा?

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