जब कोई भी बच्चा शिक्षारंभ करता है तो उसे सबसे पहले क्या सिखाया जाता है? गिनतियाँ! वो गिनतियाँ जिससे पता चलता है कि कौन सी चीज कितनी है! गिनती सिर्फ़ मेरे और आपके लिए नहीं बल्कि राष्ट्रों के लिए भी जरूरी होती है। और इस गिनती में ही एक विशालतम प्रक्रिया है जनगणना यानी सेन्सस का।
भारत में जनगणना 2027 का पहला चरण शुरू हो गया है। शायद पहला डेटा 2027 के अंत तक हमें मिल भी जाए। और फाइनल डेटा मिलने में शायद अभी लगभग 4 साल लगेंगे। हमारे देश में लोग कितने हैं, घर कितने हैं, महिला पुरुष कितने हैं , इनसे अलग एक और सच्चाई इस जनगणना से सामने आएगी।
ये सच्चाई होगी देश में लगातार घटती हिंदू आबादी की! और मैं आपको पहले ही कैसे बता दे रहा हूँ कि जनगणना मे संभवतः हिंदू आबादी के घटने का ट्रेंड सामने आएगा? असल में ये कोई नई बात नहीं है। जब से आजाद भारत में जनगणना शुरू की गई है, तब से ही हिंदू लगातार इस देश की आबादी में अपना हिस्सा खोते जा रहे हैं।
दशक दर दशक इस देश में हिंदू उसी तरफ़ बढ़ रहा है, जिसकी लगातार चिंता जताई जा रही है। और नई जनगणना संभवतः इस बात को और स्पष्ट तौर पर दीवाल पर लिख देगी। हो सकता है आपको मेरी बातें अभी तक ऐसी लग रही हों जो हर हिंदू ग्रुप की रैली में होती हों! लेकिन रुक जाइए, ये कोई कोरी गप्प नहीं है बल्कि मैं आपको कुछ डेटा बताऊंगा।
डेमोग्राफी चेंज पर होने वाली बहस में अक्सर आवाज ऊँची हो जाती है और तथ्य नंबर पीछे छुप जाते हैं लेकिन मैं आपको समस्या तो बताऊंगा ही साथ ही नंबर्स से क्लियरली उसको आपको दिखाऊँगा भी!
भारत के स्वतंत्र होने के 4 वर्षों के बाद यानी 1951 में पहली जनगणना करवाई गई थी। तब देश की आबादी लगभग 36 करोड़ थी। और तब पता चला था कि इस 36 करोड़ आबादी में से 84.9% लोग हिंदू हैं। ये भी सामने आया था कि बँटवारे के बावजूद मुस्लिम आबादी देश में 9.9% का हिस्सा रखती है।
लेकिन हमारी कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती बल्कि यहाँ से शुरू होती है। इसके बाद एक एक करके जब 1951 से 2011 तक जनगणना हुई तो हर बार एक ही ट्रेंड देखने को मिला। हर बार हिंदुओं का शेयर कम हुआ, मुसलमानों का शेयर बढ़ गया और ये सरकारी आंकड़े कहते हैं।
ये डेटा क्या कहता है! डेटा कहता है जो हिंदू इस देश में 1951 में 84.9% हिस्सा रखते थे, वो 1961 में 83.5% हो गए। लेकिन मुस्लिम 9.9 से 10.7% हो गए। यानी बंटवारे के बाद आजाद भारत की जनगणना के पहले ही दशक में हिंदू अपना हिस्सा खोने लगे थे। और शायद आपको ये नंबर ज्यादा डिफ्रेंस ना लग रहा हो।
आप शायद मन में विचार कर रहे हों कि आख़िर 1% का ही तो चेंज है, इस पर क्या हल्ला करना? जी नहीं! चेंज ऐसे ही होता है। मैं आपको जब फाइनल डेटा दूँगा तो आपको पता चलेगा कि ये 1% आख़िर में कितना बड़ा फ़र्क़ डालता है। अब एक-एक करके 1971, 1981,1991, 2001 और 2011 का डेटा बताता हूँ!
1971 में हिंदू और घट कर 82.72% पर आ गए जबकि इस बार मुस्लिम 11.2% को क्रॉस कर गए। इसी तरह 1981 में हिंदू 82.61% पर आ गए जबकि मुस्लिम 11.36% पर। 1991 में हिंदू 82.4% हो गए तो मुसलमान 12% का नंबर क्रॉस कर गए और 12.12% हो गए। यानी लगातार 1951 से लेकर 1991 तक ट्रेंड एक दम नहीं चेंज हुआ।
इन फैक्ट मुस्लिमों का नंबर और तेजी से बढ़ने जरूर लगा। अब बारी आती है 21वीं शताब्दी यानी 2001 और 2011 क। 2001 में हिंदुओं की आबादी में 1991 के मुक़ाबके तेजी से ड्राप हुआ और वो अब 80.5% तक आए जबकि मुस्लिम इसी दौरान 13% का बैरियर क्रॉस करके 13.4% हो गए।
आप नोटिस कर रहे होंगे कि धीमे-धीमे हिंदू का नंबर ड्राप हो रहा है अब सबसे लेटेस्ट और सबसे शॉकिंग फ़िगर सुन लीजिए। 2011 में हुई जनगणना में पता चला कि हिंदू अब इस देश में 80% के नीचे आ चुके हैं और अब वो 79.8% हो चुके हैं। इसी बीच मुस्लिम फिर से बढ़ कर 14.8% हो चुके हैं।
अब आपको हर जनगणना पर जो नंबर सिर्फ़ 1% या कुछ प्वाइंट्स में घटता हुआ दिखा होगा, वो 1951 से 2011 के बीच जानते हैं कितना चेंज हुआ? 5%! जी, इस देश की आबादी में 1951 से 2011 के बीच हिंदुओं का हिस्सा 5% कम हो गया जबकि मुस्लिमों का हिस्सा इतना ही इस देश में बढ़ गया।
और ऐसा इसलिए हुआ कि जिस स्पीड से देश की जनसंख्या दशक दर दशक बढ़ी, उससे कहीं ज़्यादा स्पीड से मुस्लिम बढ़े। जबकि हिंदू नेशनल एवरेज ग्रोथ रेट से कम स्पीड से बढ़े। डेटा कहता है कि 1951 से लेकर 1991 तक लगातार पाँच दशक मुस्लिम 30% से ज्यादा रफ़्तार से बढ़ते रहे, जबकि इस दौरान हिंदू 20% या उससे कम रही।
मैंने आपको बताया था ना कि एक बार में ये आँकड़ा कुछ नहीं लगता लेकिन जब आप आख़िर में सुनोगे तो चौंक जाओगे! अब और सुनिए! मुस्लिमों का नंबर और तेजी से बढ़ेगा और ये गैप धीमे धीमे सिमटता जाएगा।
और ऐसा नहीं है कि इस देश में सिर्फ़ हिंदुओं का ही आबादी में हिस्सा घटा हो, बल्कि बाक़ी धर्म भी या तो घट गए या उसी जगह रहे जहाँ वो पहले थे। pew रिसर्च सेंटर की एक रिपोर्ट कहती है कि देश में 1951 से 2011 के बीच सिख 1.9% से 1.7% हो गए, बौद्ध 0.7% ही रहे और जैन 0.5% से 0.4% हो गए।
यानी कुल मिलाकर एक ही मजहब ऐसा था, जिसका नंबर लगातार बढ़ता रहा। अक्सर जब मुस्लिमों की आबादी बढ़ने और उनके ज्यादा बच्चे पैदा करने के विषय में कोई बयान दिया जाता है तो हमारा मीडिया और लेफ्ट लिबरल लॉबी तुरंत ही इसे संघी प्रोपेगेंडा कह कर नकार देती है।
मैंने आपको आबादी बढ़ने का नंबर दे दिया, लेकिन आख़िर आबादी बढ़ती कैसे है? साफ़ है कि या तो किसी क़ौम का ग्रोथ रेट दूसरे धर्म से ज्यादा हो, या फिर कहीं बाहर से उस क़ौम के लोग लीगली या इलीगली तरीके से आ जाएँ। अब बाहर से लाकर लोगों को बसाना तो थोड़ा कठिन काम हैं, लेकिन हाँ! पहले वाली बात मुस्लिमों पर जरूर लागू होती है।
कैसे, समझिए! एक टर्म होता है TFR यानी टोटल फर्टिलिटी रेट! बेसिकली 15 से 49 वर्ष की कोई महिला इन वर्षों में कितने बच्चों को जन्म देगी, वह TFR कहलाता है। देश भर में इस आयु की महिलाओं द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या का औसत निकाला जाए तो राष्ट्रीय TFR मिलता है।
इसी तरह हिंदू-मुस्लिम-सिख सभी समाज का TFR निकाला जा सकता है। अगर किसी समाज का TFR 2.1 से कम हो तो उसकी जनसंख्या आने वाले समय में घटेगी क्योंकि 2.1 रिप्लेसमेंट नंबर कहा जाता है, अगर इससे ऊपर हो तो जनसंख्या बढ़ेगी और अगर 2.1 हो तो जनसंख्या स्थिर रहेगी।
तो अब आते हैं TFR पर। हमारे देश NFHS नाम का एक सर्वे सरकार करवाती है। इसमें इस TFR का नंबर पता लगता है। अब तक इसके 5 सर्वे हो चुके हैं। सबसे नया सर्वे 2019-20 के बीच किया गया था।
इस ग्राफ में मुसलमान रिप्लेसमेंट के रेट से ऊपर हैं और तेजी से बढ़ रहे हैं, जबकि हिंदू अब घट रहे हैं क्योंकि उनका TFR 2.1 के नीचे जा चुका है। सिर्फ़ इतना नहीं! इसी इन्फो ग्राफिक में ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि भले ही 4 बच्चे वाली बात बयानों में कहीं जाती हो।
ये असल में 1990 के दशक में मुसलमानों के लिए सही थी! अब आपको समझ में आ गया होगा कि आख़िर मुस्लिमों का नंबर हिंदुओं से तेजी से कैसे इस देश में बढ़ा है। इससे आपको ये भी पता चला होगा कि अगली जनगणना शायद और भी शॉकिंग नंबर दे!
अब आते हैं उस समस्या पर जिसकी मैंने शुरुआत में बात की। और वो समस्या है डेमोग्राफी चेंज की। पीएम मोदी ने ख़ुद इस समस्या पर लाल क़िले से दिए गए भाषण में बात की थी। डेमोग्राफी चेंज से आख़िर क्या होता है? डेमोग्राफी चेंज से वो होता है जो कुछ दिन पहले आपने मालदा में देखा जहाँ जजों को एक भीड़ ने बंधक बना लिया!
डेमोग्राफी चेंज से क्या होता है? इस चेंज से दिल्ली जैसे शहरों में सीलमपुर और जाफराबाद बस्ते हैं जहाँ 2020 जैसी दंगा और रिजीम चेंज जैसी कोशिशें होती हैं। डेमोग्राफी शिफ्ट से किसी तरुण को कोई भीड़ निशाना बनाती है। डेमोग्राफी शिफ्ट से झारखंड के स्कूलों में साप्ताहिक छुट्टी संडे की जगह जुमे को हो जाती है।
यही वो डेमोग्राफी शिफ्ट है जो किसी ओवैसी को हिम्मत देता है कि वो 80 करोड़ और 20 करोड़ वाला बयान दे। यही वो शिफ्ट है जो एक कम्युनिटी को किंग मेकर बनाने का ख़्वाब दिखाता है और वोटेबैंक में तैयार करता है। और ये शिफ्ट हमें अपनी आखों से दिख रहा है, आज से नहीं बल्कि 6-7 दशकों से दिख रहा है।
हमारी नींद तोड़ने के लिए शायद एक बार 2027 में भी दिखेगा। लेकिन ये रुकेगा कैसे! शायद मुझे और आपको आज नहीं पता है। ये रोकना है तो समाज को ही जोड़ लगाना होगा, डेमोग्राफी शिफ्ट के लिए बाहर से लाकर लोगों को बसाने वालों पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाना होगा।
सरकार पर उन लोगों को सुविधाओं से वंचित करने का दबाव बनाना होगा जो संसाधनों पर एक्स्ट्रा बोझ डाल रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होगा तो जुमे की छुट्टी संथाल परगना से निकल आपके स्कूल तक आएगी, अगर ऐसा नहीं होगा तो फिर कोई तरुण निशाना बनेगा, अगर ऐसा नहीं होगा फिर दिल्ली 2020 होगा।





