यह तस्वीर दिख रही है आपको? यह तस्वीर हथकड़ी पहने हुए जॉर्ज फर्नांडिस की है, जिन्हें इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के इशारे पर सिर्फ इसलिए गिरफ्तार करवा दिया गया था क्योंकि यह विपक्ष के एक नेता था। लेकिन मैं यह तस्वीर आपको क्यों दिखा रहा हूं? मैं इस तस्वीर में आ रही मुस्कान की तरफ आपका ध्यान दिलाना चाहता हूं। जॉर्ज फर्नांडिस किया मुस्कुराहट अपने आप में एक optimism, अपने आप में आशावाद का एक उदाहरण है। वह आशा की लौ, जो इमरजेंसी के तूफान में भी नहीं बुझी।
इस video में हम बात करेंगे उस रेजिस्टेंस की, जो देश ने इंदिरा गांधी की तानाशाही के खिलाफ दिखाई थी। आपातकाल जब लगाया गया था तो उसके पीछे सिर्फ एक ही उद्देश्य था कि कैसे भी करके देश की मीडिया, विपक्ष के नेताओं और अल्टीमेटली जनता पर अपना पूर्ण नियंत्रण कायम किया जा सके। लेकिन इमरजेंसी के दौरान मीडिया विपक्ष और जनता इन तीनों ही समूहों से इंदिरा गांधी को पर्याप्त रजिस्टेंस का सामना करना पड़ा।
पिछले वीडियो में हमने बात की थी कि कैसे इमरजेंसी के दौरान मीडिया को कंट्रोल किया गया, मीडिया को सेंसर किया गया, इस बात को एश्योर किया गया कि अखबार वही छापे जो सरकार उनसे छपवाना चाहती है। बहुत से मीडिया संस्थानों ने सरकार के आगे घुटने टेक दिए लेकिन मीडिया का एक ऐसा वर्ग भी था जिसने इमरजेंसी के दौरान सेंसरशिप का विरोध किया। इंडियन एक्सप्रेस ने तो सरकार का विरोध करते हुए, अपना एडिटोरियल ही blank कर दिया, कि जब हम कुछ लिखेंगे ही नहीं तो कांग्रेस सेंसर क्या करेगी?
सिर्फ बड़े-बड़े मीडिया संस्थाओं ने ही नहीं बल्कि कई छोटे-छोटे मीडिया संस्थानों ने भी सरकार की नजरों से छिपकर न्यूजपेपर छापे और उन्हें लोगों तक पहुंचाया। आप सोचिये, इस तरह की घटनाएं तो कभी अंग्रेजों के समय में होती थी, जब अंग्रेजों के डर से हमारे स्वतंत्रता सेनानी छिपकर अखबार छापते थे। इमरजेंसी का महत्व और किसी भी तरीके से अंग्रेजों के दौर से कम नहीं था।
मीडिया के अलावा उसे समय के विपक्ष के नेताओं ने भी अनेक स्तरों पर प्रोटेस्ट किया। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भेष बदलकर कई स्थानों पर लीडर्स के साथ कोऑर्डिनेट किया था। Emergency आरएसएस को हालांकि सरकार के द्वारा बन कर दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद संघ के स्वयंसेवकों ने कई स्थानों पर अंडरग्राउंड एक्टिविटीज की।
इमरजेंसी का सबसे बड़ा विरोध अगर कहीं से देखने को मिला तो वह जनता की ओर से देखने को मिला था। देश के अनेक क्षेत्रों में जनता सड़कों पर उतर आई थी। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था—”जिंदा कौमें पाँच साल इंतज़ार नहीं करतीं।” आपातकाल के दौरान यह लोहिया का यह कथन पूरे देश में चरितार्थ होता दिखाई दिया।
जब आपातकाल के दौरान दिखाए गए प्रतिरोध की चर्चा हो रही है तो मीडिया और इसके नेताओं के साथ-साथ हमारे कवियों की भी चर्चा बेहद जरूरी है। ऐसा कहा जाता है कि कवि अघोषित रूप से जनता का प्रतिनिधि होता। हमारे कवियों ने इमरजेंसी के दौरान इस कथन को चरितार्थ करके दिखाया था। इमरजेंसी के दौरान हमारे कवियों ने जनता के रोग को अपना स्वर दिया था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने सरकार का विरोध करते हुए लिखा था कि
दो राह समय के रथ का घरघर नाद सुनो
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है
दुष्यंत कुमार ने जनता के मन में जोश भरने के लिए, उत्साह भरने के लिए यह लिखा था कि
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नही
मेरी कोशिश है यह सूरत बदलनी चाहिए
ऐसे ही सैकड़ो कवियों ने जनता के गुस्से का प्रतिनिधित्व किया।
मीडिया, विपक्ष, बुद्धिजीवी वर्ग और जनता, समाज के हर हिस्से से इमरजेंसी का प्रतिरोध देखने को मिला था।।
Emergency केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना ही नहीं थी; वह भारतीय समाज की अंतरात्मा की परीक्षा थी। उस दौर में जब संविधान मौन था, न्यायालय विवश थे, संसद बंधक थी, तब भी लोगों ने यह दिखाया कि लोकतंत्र केवल एक system नहीं, बल्कि इस देश की आत्मा है।पूरे देश से इमरजेंसी के दौरान जो रेजिस्टेंस देखने को मिला, उसका सिर्फ एक ही कारण था कि देश को यह विश्वास था कि भारत के लोकतंत्र पर जो अंधेरा छाया है, वह अंधेरा छटेगा, और सूरज जरूर निकलेगा। यह जो आशा और उम्मीद है यही भारत की आत्मा है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर भारत के शरीर को भले ही कंट्रोल कर लिया था लेकिन भारत की आत्मा में जो आशा थी जो उम्मीद थी जो प्रतिरोध करने की क्षमता थी उसको नियंत्रण में नहीं ले सकी।



