मूमल और महेंद्रा की प्रेम कहानी

मूमल और महेंद्रा की प्रेम कहानी: राजस्थान के रेगिस्तान में कैसे खिली प्यार की निशानी

Summary
हीर-रांझा, लैला-मंजनू या रोमियो-जूलियट जैसी प्रेम कहानी भारत की मिट्टी में भी है। मूमल और महेन्द्रा के प्यार की कहानी, अमर प्रेम कहानी है।

कथामंजरी के तीसरे एपिसोड में हम एक ऐसी प्रेम कहानी के बारे में जानेंगे, जो भले ही सैकड़ों वर्ष पुरानी है, लेकिन आज भी राजस्थान की रेत उस अथाह प्रेम और वेदनापूर्ण विरह, दोनों को अपने अंदर समाहित करके धधक रही है। उसी प्रेम कहानी को, आप सबके बीच हम लेकर आए हैं, क्योंकि इस खूबसूरत दुनिया को बचाए रखने के लिए प्रेम का बचे रहना बहुत जरूरी है। 

यह कहानी है मूमल और महेंद्रा की। यह कहानी राजस्थान में बड़ी प्रसिद्ध है, लेकिन राजस्थान के बाहर के लोगों को इस कहानी के बारे में बहुत कम ही पता है।

पाकिस्तान में एक राज्य है, सिंध। आजादी से पहले यह राज्य भारत में ही था। आजादी के बाद जब बटवारा हुआ तो सिंध पाकिस्तान में चला गया। लेकिन उस जमाने में सिंध को उमरकोट के नाम से जाना जाता था। और उमरकोट पर सोढ़ा राजपूतों का शासन था। वैसे तो जब भी मध्यकालीन इतिहास में राजपूतों का नाम आता है, तो आमतौर पर उनकी वीरता, उनके शौर्य और उनके द्वारा लड़े गए युद्धों की बात की जाती है। लेकिन उमरकोट के सोढ़ा राजपूत अपनी वीरता के साथ-साथ अपनी करुणा के लिए भी पूरी दुनिया में प्रसिद्ध थे।

यही कारण था कि जब शेरशाह सूरी ने हुमायूं को हराया और हुमायूं को देश छोड़कर भागना पड़ा, तो भागने से पहले हुमायूं ने अपनी गर्भवती पत्नी हमीदा बानो बेगम को उमरकोट के सोढ़ा राजपूतों के यहाँ शरणार्थी के रूप में छोड़ दिया था। हुमायूं को राजपूतों पर इतना विश्वास था। सोढ़ा राजपूतों ने भी शरण में आए हुए का सम्मान किया और उमरकोट के राजभवन में ही अकबर का जन्म भी हुआ था। 

बहरहाल, यह कहानी, उमरकोट के युवराज महेंद्रा से शुरू होती है। उमरकोट में राजा वीसलदेव का शासन था और महेंद्रा उनके ज्येष्ठ पुत्र थे। 

एक दिन की बात है, महिंद्रा सुबह के नाश्ते के बाद उमरकोट की सीमा की ओर शिकार करने निकल पड़े। युद्ध और शिकार तो वैसे भी उस जमाने में राजपूतों के सबसे प्रिय खेल हुआ करते थे। तो वही खेल खेलने निकले कि चलो किसी जंगली सूअर का या फिर नरभक्षी जानवर का शिकार करेंगे।

लेकिन उमरकोट की सीमा पार करते ही कोसों तक रेत के रेगिस्तान फैले हुए हैं। अब जाहिर सी बात है रेगिस्तान में जानवर इतनी आसानी से तो मिलेंगे नहीं, जानवर ढूंढ़ते-ढूंढ़ते ये लोग उमरकोट की सीमा से बहुत आगे निकल गए। हालांकि ऐसा लगभग रोज ही होता था कि महिंद्रा शिकार करने जाते थे और कई बार शाम हो जाती थी। लेकिन वह दिन कुछ ख़ास था। उस दिन एक तो शिकार नहीं मिला, और दूसरा यह कि शाम होते ही जब उमरकोट की ओर लौटने की बारी आई, तो उस समय रेतीली आंधी भी शुरू हो गई। 

जो लोग रेगिस्तान के माहौल से परिचित होंगे, उनको पता होगा कि जब रेगिस्तान में आंधी आती है तो एक डाकन की तरह आती है। यह आंधियाँ घंटों तक कई बार तो दिनों तक भी अंधेरा कर देती हैं। रेत की आंधी इतनी खतरनाक आती है कि आदमी अपना खुद का पैर तक नहीं देख पाता है। कुछ इस तरह की आंधी उस दिन आई। धीरे-धीरे महिंद्रा आगे बढ़ने लगे, आंधी थी, तो रास्ते का कुछ पता नहीं चल रहा था। उनको लगा कि वह उमरकोट की ओर जा रहे हैं, लेकिन हकीकत में वह दूसरे रास्ते की ओर यानी जैसलमेर की ओर आ रहे थे।

जब आँधी रुकी तो महिंद्रा ने देखा कि उनके सामने एक नदी बह रही है और नदी के उस पार पीले पत्थरों वाला एक सुंदर सा महल है। महिंद्रा ने वहां पास में घूम रहे कुछ गड़रियों से पूछा कि यह कौन सी नदी है और यह सामने महल किसका है। गड़रियों ने उनको बताया कि यह काक नदी है, और नदी के उसे पर जो महल आपको दिख रहा है, उस महल को मूमल की मेड़ी कहा जाता है। मूमल की मेड़ी अर्थात मूमल का महल। 

और मूमल कौन थी? मूमल उस समय राजस्थान की सबसे सुंदर कन्या थी, जिसको पाने के लिए देश-दुनिया से न जाने कितने वीर उस तक पहुँचे, लेकिन मूमल की शर्त को पूरा नहीं कर पाए। शर्त यह थी कि कोई भी व्यक्ति जो मूमल को पाना चाहता था, वह मूमल के महल में एक भूलभूलेया से होकर जाएगा, अगर उस भूलभूलैया को पार कर लिया, तभी मूमल मिलेगी। मूमल की सुंदरता की चर्चा सिर्फ जैसलमेर तक नहीं थी, वह उमरकोट तक भी थी और महिंद्रा ने भी सुन रखी थी।

महिंद्रा ने सोचा कि जब इतनी चर्चा सुन रखी है मूमल के बारे में और मूमल की मेड़ी तक भी आ ही गए हैं, तो क्यों न चलकर मूमल से मिला जाए। 

उमरकोट के राजकुमार महिंद्रा, मूमल की मेड़ी में पहुँचे। तमाम नौकर-चाकरों ने उनका खूब स्वागत किया। मूमल ने खिड़की से झांक कर महिंद्रा को देखा और महिंद्रा का रूप देखकर मूमल हथप्रभ रह गई। पूरी दुनिया जिस मूमल की सुंदरता की कसमें खाया करती थी, अनगिनत वीर बलशाली युवकों का रूप, यौवन, कद-काठी और डील-डॉल देखकर भी जिस मूमल के मन में कोई कामना नहीं जगी, उस मूमल की आंखें महिंद्रा के चेहरे पर जाकर अटक गई। 

हालांकि मूमल ने इसके बावजूद, खुद को दृढ़ रखा कि महिंद्रा चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, यदि महिंद्रा मूमल को पाना चाहता है, तो महिंद्रा को भी शर्त पूरी करनी पड़ेगी, महिंद्रा को भी भूल भुलैया से आना पड़ेगा।

थोड़ी देर बाद महिंद्रा ने मूमल से मिलने की इच्छा जताई, तो नौकरों ने उसे भूलभुलैया का रास्ता दिखाया। महिंद्रा जैसे ही उस भूलभुलैया रूपी सुरंग में घुसे, उनके ऊपर शेर ने हमला कर दिया, लेकिन इन्होंने तलवार निकाल कर तुरंत एक भरपूर वार किया और शेर का सिर धड़ से अलग हो गया। थोड़ी दूर और आगे आने पर एक तालाब मिला, जिसमें कई मगरमच्छ वगैरह थे। ऐसे करके महिंद्रा ने इस तरह से कई सारी चुनौतियों का सामना करते हुए, उस भूलभुलैया को पार किया। 

भूलभूलैया पार करते ही, सामने एक झीना सा पर्दा दिखा। पर्दे के पीछे एक-एक करके अनेक दीए जल उठे। पर्दा हटा और एक स्त्री दोनों हाथ जोड़कर उमरकोट के युवराज महिंद्रा के सामने झुकते हुए बोली, खम्मा घणी हुकुम। 

महिंद्रा एक मूर्ति की तरह खड़े रहकर उस स्त्री को देखते रह गए। महिंद्रा की आंखें खुली की खुली रह गईं। सैकड़ो दीयों के झिलमिल उजाले में खड़ी देव तुल्य सौंदर्य की स्वामिनी वह स्त्री और कोई नहीं बल्कि मूमल थी।

मूमल जब मुस्कुराई, तो महिंद्रा को ऐसा लगा जैसे दो पंक्तियों में किसी ने मोतियाँ टांग रखी हो। मूमल के चेहरे पर ऐसी आभा थी, जिसकी बराबरी सैकड़ो पूनम के चांद मिलकर भी न कर पाएँ। गालों पर ऐसी लाली थी, जैसे हजारों गुलाबों का रंग निचोड़ दिया गया हो। बाल इतने घने और काले थे, जैसे अमावस की रात को उतार कर मूमल के सिर पर रख दिया गया हो। मूमल इतनी कोमल थी कि महिंद्रा को लगा कि अगर गलती से भी छू दिया तो कहीं मूमल मक्खन की तरह पिघल ना जाए। 

और उधर मूमल भी जीवन में पहली बार किसी पुरुष पर मोहित हुई थी। और अब तो महिंद्रा ने भूलभुलैया पार करके अपनी वीरता भी साबित कर दी थी। तो मूमल को सौंदर्य और वीरता के मिश्रण के रूप में महिंद्रा मिल चुका था।

उस समय ऐसा लग रहा था, जैसे समय थम सा गया हो। फिर इसके बाद महिंद्रा और मूमल की देह ने अपना मौन तोड़ दिया। 

मूमल के लिए यह पुरुष का पहला स्पर्श था। लेकिन महिंद्रा विवाहित थे। वह उमरकोट का युवराज था और उसकी पत्नी भी थी। हालांकि राजा महाराजाओं में कई शादियों का प्रचलन होता है, राजपूतों में भी था। इसलिए सुबह होते ही महिंद्रा ने सोचा कि उसे वापस उमरकोट चले जाना चाहिए और वहां जाकर महाराज से बातचीत करके और फिर मूमल से विवाह करके मूमल को उमरकोट लेकर आ जाना चाहिए। सुबह हुई और महिंद्रा ने मूमल को ये सारी बातें बताकर, जल्द ही मूमल को ले आने का वादा करके वहां से विदा लिया। 

लेकिन जब महिंद्रा अपने राज्य उमरकोट पहुंचा तो वहां जाकर परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि महाराज, महारानी, महिंद्रा की पत्नी, घर-परिवार, इज्जत-आबरू, राज-काज, समाज – इन सारी चीजों ने महिंद्रा को जकड़ लिया। 

महिंद्रा परेशान रहने लगा कि अगर अपने प्रेम की खातिर मूमल को लेकर आया तो घर-परिवार, राज काज, सब तबाह हो जाएगा और अगर इन सब की चिंता करके मूमल से अपनी नज़रें फेर लीं, तो महिंद्रा खुद तबाह हो जाएगा। महिंद्रा के लिए आगे कुआं पीछे खाई जैसी स्थिति थी।

महिंद्रा को कोई हल नहीं सूझ रहा था। महल की खिड़कियां खुली रहती थीं, फिर भी घुटन होती थी। शेर तक को अपनी तलवार से दो फाड़ कर देने वाला महिंद्रा, विरह की वेदना में जल रहा था। दिन बीते जा रहे थे, उधर मूमल के लिए भी समय वेदना पूर्ण होता जा रहा था। मूमल की महल में कोई सरसाहट भी होती थी तो मूमल को ऐसा लगता था महिंद्रा आ गया। हल्की सी भी आवाज आती थी, तो मूमल को लगता था कि कहीं यह महिंद्रा की आवाज़ तो नहीं। मूमल ने खाना खाना तो दूर, पानी पीना भी छोड़ दिया। दासियाँ भी आश्चर्य में रहने लगीं कि पानी का एक घुट ना पीने के बावजूद मूमल की आंखों से दिन रात आंसुओ का समंदर कैसे निकल सकता है।

इधर महिंद्रा भी बहुत परेशान रहने लगा। कुछ दिन इस विरह में काटने के बाद एक शाम अचानक महिंद्रा उठा और अपनी पत्नी से कहा कि मैं अपने मित्र के यहां जा रहा हूं, मेरी फिक्र मत करना और किसी से कुछ मत बोलना। मैं सुबह होते ही लौट आऊंगा। 

उसके बाद महिंद्रा ने चीखल नाम का एक ऊँट अपने साथ में लिया और मूमल की मेड़ी की ओर चल पड़ा। आपमें से बहुत लोगों को पता होगा कि रेगिस्तान में ऊंट बहुत तेज दौड़ने वाला जानवर होता है। ऊंट वैसे तो आपको धीरे चलते दिखता है लेकिन रेगिस्तान में इसकी गति किसी भी घोड़े से कम नहीं होती। चीखल ऊंट पर सवार होके महिंद्रा मूमल के पास पहुंचा। महिंद्रा जब मूमल के पास गया तो रात्रि का दूसरा पहर हो रहा था। लेकिन मूमल को ऐसा लगा जैसे अँधेरी रात में सूरज उसके सामने आकर खड़ा हो गया है। मूमल के मन के सारे अंधेरे को महिंद्रा ने उजाले से भर दिया। रात भर दोनों एक साथ रहे और सूरज उगने से ठीक पहले महिंद्रा वापस चीखल ऊँट पर बैठकर उमरकोट की ओर निकल पड़ा।

फिर लगभग रोज का सिलसिला हो गया। रोज रात को महिंद्रा चीखल ऊंट पर बैठकर मूमल के पास आता और सूरज उगने के कुछ देर पहले वापस जाकर उमरकोट में अपने बिस्तर पर सो जाता। लेकिन यह सिलसिला भी आखिर कब तक चलता? महिंद्रा की पत्नी भी आखिर कब तक सहती? एक दिन आखिरकार उन्होंने अपनी सास को बात ही दिया। महाराजा वीसलदेव को जब यह बात पता चली तो महाराज भी चिंतित रहने लगे। आखिर उमरकोट का युवराज रात्रि को बिना सुरक्षा के कहीं पर जाए, और सुबह होने से पहले लौट आए, किसके पास जा रहा है, क्यों जा रहा है, यह किसी भी महाराज के लिए चिंता की ही बात होगी। 

महाराज ने गुप्तचरों को लगाया कि पता करो युवराज कहां जाते हैं। गुप्तचरों ने अगले दिन पता करके सब बता दिया कि हमारे पास चीखल नाम का जो सबसे तेज ऊंट है, युवराज उस पर बैठकर रोज रात्रि को मूमल की मेड़ी में जाते हैं। महाराज बीसलदेव ने आदेश दिया कि एक काम करो चीखल को इस राज्य से बाहर ले जाओ। जब चीखल रहेगा ही नहीं, तो युवराज किस ऊँट पर बैठकर मूमल के पास जाएँगे। आदेश का पालन हुआ। 

उस रात जब युवराज महिंद्रा, मूमल के पास जाने के लिए अपने कमरे से बाहर निकले, तो अस्तबल के पास आकर उन्हें पता चला कि चीखल ऊँट तो यहां पर है ही नहीं। महिंद्रा ने सोचा कि कोई बात नहीं किसी दूसरे ऊँट पर चल लेते हैं, भले थोड़ी देर लग जाएगी, लेकिन कम से कम अपनी प्रेयसी का चेहरा तो देखने को मिलेगा। 

ऊंट बहुत समझदार जानवर होता है। एक बार अगर रास्ता देख लेता है न तो फिर उस पर बैठा हुआ सवार भले ही सोता रह जाए, लेकिन ऊँट चुपचाप चलते-चलते सवार को उसकी मंजिल तक पहुंचा देता है। चीखल ऊँट ने तो मूमल के महल का रास्ता देख रखा था, इसलिए युवराज महिंद्रा उस ऊंट पर बैठकर सो जाते थे और वह ऊंट चुपचाप इनको मूमल के महल तक पहुंचा देता था। लेकिन यह जो नया ऊँट था, इसने रास्ता नहीं देखा था। 

इस नए ऊंट पर युवराज बैठे और उनको कुछ देर बाद नींद आ गई। ऊंट रास्ता भटक गया। रात्रि के तीन पहर बाद जब युवराज की नींद खुली, तो उन्होंने पाया कि वह रास्ता भटक गए हैं। आखिरकार जैसे तैसे करके युवराज महिंद्रा जब मूमल के पास पहुंचे, तो उस समय सवेरा हो चुका था। 

रात भर महिंद्रा का इंतजार करते-करते मूमल की पथराई आंखें सो चुकी थीं। महिंद्रा जैसे ही मूमल के कमरे के पास पहुंचे, उन्होंने देखा कि मूमल के ठीक बगल में एक पुरुष सो रहा है। यह दृश्य देखते ही महिंद्रा को तो लगा, जैसे उसे एक साथ हजारों बिच्छुओं ने काट खाया हो। उसका सर चकराने लगा। सांस सूखने लगी। महिंद्रा वहां से उल्टे पैर लौट आया।

दास-दासियाँ, नौकर-चाकर सब देखते रह गए कि आखिर ऐसा क्या हो गया?  लेकिन उन बिचारों की क्या औकात कि उमरकोट के राजकुमार से कुछ सवाल कर सकें। महिंद्रा की जिन आंखों में मूमल के लिए प्रेम हुआ करता था, उन्हीं आंखों ने मूमल को धिक्कार दिया। महिंद्रा वापस उमरकोट लौट गया।

अगली सुबह जब मूमल को उसकी दसियों ने बताया कि युवराज महिंद्रा आए थे, लेकिन लौट गए। तो मूमल सच में पड़ गई कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि युवराज महिंद्रा लौट गए। 

दरअसल उस रात यह हुआ था कि रास्ता भटक जाने के कारण युवराज महिंद्रा को मूमल के पास आने में देर हो गई थी। मूमल भी इंतजार कर रही थी। इस दौरान मूमल की जो बड़ी बहन थी सुमल, वह मूमल से मिलने उसके कमरे में आई थी। दोनों बहने हंसी मजाक कर रही थी। उस हंसी मजाक में सुमल ने पुरुषों का कपड़ा पहन लिया। और जब युवराज महिंद्रा बहुत देर तक नहीं आए तो दोनों बहने थक हार कर एक ही बिस्तर पर सो गई।

लेकिन सुबह जब महिंद्रा आए तो पुरुष के कपड़े पहन कर सोई हुई सुमल को देखकर उनको लगा कि मूमल किसी पुरुष के साथ सो रही है। और इस भ्रम को सच्चाई मानकर युवराज महिंद्रा वापस लौट गए।

लेकिन मूमल को यह नहीं पता था कि युवराज महिंद्रा किसी भ्रम के कारण वापस लौटे हैं। मूमल को तो यही लग रहा था कि हो सकता है कोई काम आया हो या अचानक से कुछ ऐसी जरूरत पड़ गई हो कि महल में आकर भी बिना मिले वापस लौट गए। मूमल ने सोचा कि आज रात को जब महिंद्रा आएंगे तो उनसे पूछ लेगी कि भई क्यों आप आकर वापस चले गए थे। 

लेकिन महिंद्रा अब नहीं आने वाले थे। महिंद्रा को ऐसा लग रहा था, जैसे उसके विश्वास की हत्या हुई है। हवा भी मूमल को छुती थी, तो महिंद्रा उस हवा से जलता था। उस मूमल को किसी पुरुष की बाहों में देखना महिंद्रा भला कैसे सह लेता।

इसी चिंता में महिंद्रा का शरीर बिस्तर पर पड़े-पड़े तपने लगा। दिन पर दिन बीतते चले गए और इधर महिंद्रा और बीमार पड़ते चले गए। महाराज, महारानी, महिंद्रा की पत्नी, नौकर-चाकर, दासी दासियां, सब उनकी सेवा में लगे हुए थे लेकिन उनकी तबीयत में कोई सुधार नहीं हो रहा था। कभी-कभी महिंद्रा पागलों की तरह चिल्लाने लगते। कभी-कभी खुद के बाल नोंचने लगते।

उनकी यह हालात देखकर तो एक बार महाराज वीसलदेव को भी लगा कि चलो ठीक है मूमल से महिंद्रा की शादी कर देते हैं, कम से कम मेरा बेटा तो मुझे वापस मिल ही जाएगा। लेकिन अब स्थिति बदल गई थी। अब तो महिंद्रा मूमल का नाम सुनने को भी राजी नहीं थे।

कोई भी उनके सामने मूमल का नाम लेता तो उस पर चिल्ला पड़ते। लेकिन बंद कमरे में वही महिंद्रा मेरी मूमल, प्यारी मूमल कहके रोते रहते थे। प्रेमियों के मन में भी यह बड़ी अजीब दुविधा हमेशा से रही है। कई बार कुछ ऐसी गलतियां हो जाती हैं कि प्रेमी एक दूसरे को देखना तक नहीं चाहते, लेकिन उन यादों को, उन स्मृतियों को कोई कैसे भुला दे, प्रेम में दिए गए उस समर्पण को कोई कैसे भुला दे?

इसी दोराहे की कुंठा में महिंद्रा तड़प रहा था। महिंद्रा को वह मूमल चाहिए थी, जिसे उसने पहले दिन देखा था। लेकिन महिंद्रा उस मूमल का मुंह भी नहीं देखना चाहता था, जिसे महिंद्रा ने किसी पुरुष के साथ सोते हुए देखा था। 

अब ये हमें और आपको पता है न कि मूमल किसी पुरुष के साथ नहीं बल्कि पुरुष के कपड़े पहने अपनी बहन के साथ सो रही थी। लेकिन महिंद्रा को ये बात थोड़ी पता थी। पूरा अमरकोट जान चुका था कि युवराज महिंद्रा मूमल के प्रेम में पागल हो चुके हैं। तमाम वैद्य ऋषियों ने सब प्रयास कर लिया, लेकिन उमरकोट के युवराज ठीक नहीं हुए।

पुरोहितों ने और संतों ने राणा वीसलदेव से यह निवेदन किया कि हुकुम विधाता के लिखे को कोई ना तो टाल पाया है और ना कोई बाँच पाया है। अब युवराज महिंद्रा को कोई भी ठीक नहीं कर सकता, लेकिन एक आखिरी उपाय भी कर लिया जाए। युवराज महिंद्रा को मूमल के पास ले जाया जाए। संभव है कि युवराज शायद मूमल को देखें, तो ठीक हो जाएँ।

राणा बीसलदेव वह सब कुछ करने को तैयार थे, जिससे उनका बेटा उन्हें वापस मिल पाए। महिंद्रा को मूमल के महल में ले जाने की तैयारी शुरू हुई। हालांकि महिंद्रा इतने पागल हो चुके थे कि उन्हें पता भी नहीं था कि उन्हें कब कौन कहां ले जा रहा है। महादेव जैसी जटाएँ, लंबी दाढ़ी, लंबे नाखून और मुंह से टपकती हुई लार को देखकर कोई आदमी कहीं नहीं सकता था कि यह व्यक्ति उमरकोट का युवराज महिंद्रा है।

उमरकोट की तरफ से एक पूरा दलबल महिंद्रा को लेकर जब मूमल के महल के पास पहुंचा, तो वहां जाकर उन्हें पता चला कि मूमल तो अब यहां पर है ही नहीं। 

दरअसल महिंद्रा का इंतजार करते-करते एक दिन मूमल अपना महल छोड़कर उमरकोट महिंद्रा से मिलने के लिए निकल गई थी। लेकिन रास्ते में ऐसी तेज आंधी आई कि उसके बाद से मूमल का कोई पता नहीं लगा। उमरकोट के पूरे दलबल को जब यह बात पता चली की मूमल अब यहां है ही नहीं तो उन्होंने मान लिया कि अब महिंद्रा का इलाज संभव नहीं है और अब नियति ने उनके साथ ऐसा खेल-खेल दिया है कि अब सिर्फ भगवान का ही आसरा है। अगर भगवान चाहेंगे तो महिंद्रा ठीक होंगे, नहीं चाहेंगे तो नहीं होंगे। 

उस रात को उमरकोट का पूरा दलबल वहीं रुक गया कि अगली सुबह वो उमरकोट वापस चले जाएंगे। लेकिन अगली सुबह सिपाहियों ने देखा कि महिंद्रा अपने बिस्तर पर नहीं थे। सिपाहियों को चारों तरफ फैला दिया गया कि किसी भी हालत में युवराज महिंद्रा को ढूंढ कर लाया जाए। 

कई कोस दूर जाने के बाद सैनिकों ने दो ग्वालों से पूछा कि भाई तुमने किसी दाढ़ी वाले आदमी को देखा है। ग्वालों ने बताया कि हां एक दाढ़ी वाला पागल यहां से जा तो रहा था। “म्हारी जग व्हाली मूमल, म्हारी मीठोड़ी मूमल” गाते हुए आगे गया है। 

महिंद्रा कई कोस आगे निकल गया। रास्ते भर “मेरी मूमल, प्यारी मूमल, माड़ेची मूमल” गाते हुए जा रहा था। रास्ते में एक मिठाई की दुकान थी। महिंद्रा वही बैठकर मूमल को पुकारने लग गया। अब दुकानदार को अपना व्यापार चलाना था, कोई पागल आकर किसी दुकान पर बैठ जाएगा तो कोई भी उसको वहाँ से भगाएगा ही। दुकानदार को यह थोड़ी पता था कि यह जो मूमल-मूमल चिल्ला रहा है, यह व्यक्ति उमरकोट का राजकुमार महिंद्रा है।

दुकानदार ने भिखारी समझकर महिंद्रा को दुदकारते हुए कहा कि ए भिखारी यहां से हटो। जाओ वहाँ थोड़ी दूर आगे जो एक भिखारन बैठी हुई है, वह भी खुद को मूमल बताती है। जाओ जाकर उससे मिल लो।

महिंद्रा ने दूर से देखा, एक भिखारन बैठी है। दुनिया के लिए महिंद्रा भले पागल था, लेकिन उसे इतना होश जरूर था कि भिखारन के भेष में कंकाल बन चुकी उस महिला को देखकर वह पहचान गया कि यही मूमल है। आखिर अपने कलेजे के कौर को भला कोई कैसे भूल सकता है। जिसकी मूरत आठो पहर, 24 घड़ी महिंद्रा की आंखों में बसी रहती है, उस मूमल को भला महिंद्रा कैसे नहीं पहचानता। महिंद्रा मूमल की ओर दौड़ पड़ा। 

उस समय कुछ बच्चे, भिखारिन बन चुकी मूमल को तंग कर रहे थे। भिखारिन के रूप में मूमल केवल यही दोहराती रहती थी कि मेरे महिंद्रा कब आएंगे, मेरे महिंद्रा कब आएंगे। उन बच्चों ने उस भिखारिन को और छेड़ने के लिए यह कह दिया कि अरे महिंद्रा को तो काले सांप ने डस लिया है। वह तो मर गया।

इतना कहकर बच्चे चले गए। तब तक महिंद्रा भी मूमल के पास आ चुका था। महिंद्रा, मूमल को देखते ही उससे लिपट गया। महिंद्रा मूमल से लिपटकर रोने लग गया। 

लेकिन मूमल न हिली, न डुली। मजाक में उन बच्चों ने मूमल से जो बात कही थी कि महिंद्रा को सांप ने डस लिया है और वह मर गया है। मूमल ने उस बात को सच मान कर अपनी देह त्याग दी थी। महिंद्रा को जैसे ही यह आभास हुआ कि मूमल मर चुकी है, उसके बाद महिंद्रा पागलों की तरह वहीं पास पड़े पत्थर से माथा टकरा-टकराकर तब तक खुद को चोटिल करता रहा, जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। आसपास लोग खड़े देखते रहे।

कुछ देर बाद उमरकोट के कुछ सैनिक महिंद्रा को ढूंढते हुए वहां पहुंचे। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। फूटा हुआ माथा, बहता हुआ खून और महिंद्रा की देह वहां जरूर थी, लेकिन उसकी आत्मा जाकर अपनी प्यारी मूमल से मिल चुकी थी।

काल की धारा में दोनों प्रेमी स्वाहा हो चुके थे। नियति से प्रेम हार गया था। मूमल नहीं रही, महिंद्रा भी नहीं रहा। परंतु मूमल और महिंद्रा की स्मृतियों को संजोए हुए उनकी कहानी आज भी अमर है। और वह तब तक अमर रहेगी, जब तक इस दुनिया में प्रेम रहेगा।

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