दोस्तों, गणतंत्र दिवस सिर्फ एक तारीख नहीं है। ये वो दिन है जब हमने न सिर्फ संविधान अपनाया, बल्कि एक पूरी व्यवस्था की नींव रखी। Constitutionalism यानी संवैधानिकता, संयम, प्रक्रिया का पालन और संस्थाओं की सीमाओं का सम्मान। यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन इस बार नासिक में जो कुछ हुआ, वो इस पूरी भावना के ठीक उलट था। आज हम इसी पर बात करेंगे कि कैसे एक छोटी सी घटना बड़े संवैधानिक सवाल खड़े कर रही है।
सोचिए, 26 जनवरी 2026 को नासिक में Republic day का कार्यक्रम चल रहा है। महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री गिरीश महाजन झंडा फहराते हैं और फिर भाषण शुरू करते हैं।
सब कुछ सामान्य लग रहा है। लेकिन अचानक वन विभाग की कर्मचारी माधवी जाधव खड़ी हो जाती हैं और बीच में ही सवाल उठाती हैं। क्यों मंत्री जी ने अपने पूरे भाषण में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का नाम नहीं लिया? मौके पर थोड़ा तनाव होता है, पुलिस आती है, उन्हें कुछ देर हिरासत में लिया जाता है और फिर छोड़ दिया जाता है।
गिरीश महाजन ने बाद में स्पष्ट किया कि नाम छूट जाना अनजाने में हुआ था। कोई इरादा नहीं था अंबेडकर जी को नजरअंदाज करने का। उन्होंने माफी भी मांग ली। एक सामान्य लोकतंत्र में यहां बात खत्म हो जानी चाहिए थी। गलती हुई, सुधार हुआ, आगे बढ़ो। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। मामला राजनीतिक तूफान बन गया। अंबेडकर की पहचान मिटाने के आरोप लगे। FIR की मांग हुई, मंत्री को हटाने की बातें होने लगीं। माधवी जाधव ने तो यहां तक कह दिया कि यह इतना बड़ा पाप है कि महाकुंभ में डुबकी लगाने से भी नहीं धुलेगा।
देखिए, यहां दो बड़े सवाल उठते हैं। पहला, क्या हर भाषण में डॉक्टर अंबेडकर का नाम लेना अनिवार्य है? संविधान में कहीं ऐसा नहीं लिखा। भाषण कोई कानूनी दस्तावेज नहीं होता।
वह तो मौके, विषय और संदर्भ पर निर्भर करता है। मंत्री राष्ट्रवाद की बात कर रहे थे, शिवाजी महाराज का जिक्र कर रहे थे। हर ऐतिहासिक शख्सियत का नाम लेना जरूरी थोड़े ही है।
अंबेडकर जी संविधान के निर्माता हैं, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन वे अकेले नहीं थे। पटेल, नेहरू, गांधी, मौलाना आजाद, कई लोग थे। अगर नाम न लेना अपमान है, तो कल से हर स्पीच असुरक्षित हो जाएगी। कोई भी व्यक्ति बीच में खड़ा होकर कह सकता है कि फलाने आदमी का नाम क्यों नहीं लिया। यह संवैधानिक सम्मान नहीं, बल्कि लगातार अड़ंगा डालने का तरीका बन जाएगा।
दूसरा और ज्यादा गंभीर सवाल ये है कि माधवी जाधव कोई आम नागरिक नहीं थीं। वे ड्यूटी पर तैनात सरकारी कर्मचारी थीं। सरकारी कार्यक्रम में। हमारे सिस्टम की बुनियाद ही ये है कि नौकरशाही और Uniform धारी लोग राजनीतिक रूप से तटस्थ रहें।
service rules स्पष्ट हैं। ड्यूटी के दौरान राजनीतिक गतिविधि करना अनुशासनहीनता है। यह लोकतांत्रिक विरोध नहीं, बल्कि ड्यूटी से भटकना है। फिर भी विपक्षी नेता और कुछ कमेंटेटर इसे बहादुरी बता रहे हैं। कांग्रेस की नेता वर्षा गायकवाड़ ने कहा कि यह हर स्वाभिमानी मराठी की आवाज है। शमा मोहम्मद ने इसे पुलिस वर्दी में बहादुरी बताया और मंत्री को बर्खास्त करने की मांग की। सोशल मीडिया पर भी इसे जमकर सराहा जा रहा है।
जब राजनीतिक लोग सरकारी कर्मचारियों की इस तरह की अनुशासनहीनता को प्रोत्साहित करते हैं, तो संदेश क्या जाता है? कि अगर आप विचारधारा के नाम पर टकराव करोगे, तो इनाम मिलेगा। न्यूट्रल रहोगे, तो नुकसान। इससे संस्थाएं कमजोर होती हैं। ब्यूरोक्रेसी का राजनीतिकरण शुरू हो जाता है।
सबसे बड़ी विडंबना देखिए। डॉक्टर अंबेडकर को आज इतना पवित्र बना दिया गया है कि उनका नाम न लेना भी अपराध लगने लगा। जैसे कुछ धार्मिक व्यवस्थाओं में होता है। जरा सी चूक और हंगामा। लेकिन अंबेडकर जी खुद हीरो वर्शिप के सबसे बड़े विरोधी थे। संविधान सभा के अंतिम भाषण में उन्होंने कहा था कि राजनीति में भक्ति या हीरो वर्शिप का रास्ता गिरावट की ओर ले जाता है, अंत में तानाशाही तक। आज उनके ही नाम पर वही भक्ति संस्कृति थोपी जा रही है। यह सम्मान नहीं, बल्कि उनके विचारों का दुरुपयोग है।
यह कोई अकेली घटना नहीं है। पैटर्न बनता जा रहा है। याद कीजिए 2024 में CISF की कुलविंदर कौर ने कंगना रनौत को एयरपोर्ट पर थप्पड़ मार दिया था। सिर्फ इसलिए क्योंकि कंगना ने किसान आंदोलन पर राय दी थी। यह गंभीर सुरक्षा उल्लंघन था। लेकिन उसे भी कुछ लोग बहादुरी बता रहे थे। विशाल ददलानी जैसों से नौकरी के ऑफर तक आए। इसी तरह ब्यूरोक्रेसी में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ रहा है।
आज अंबेडकर के नाम पर, कल जाति, धर्म या किसी और मुद्दे पर। अगर हर अधिकारी को लगेगा कि वह चुने हुए प्रतिनिधि को विचारधारा के आधार पर चुनौती दे सकता है, तो शासन कैसे चलेगा?
दोस्तों, गणतंत्र दिवस हमें याद दिलाता है कि संविधान सिर्फ कागज का दस्तावेज नहीं, बल्कि संयम और सीमाओं की व्यवस्था है। नासिक की घटना इसके ठीक विपरीत है। ड्यूटी पर राजनीतिक सक्रियता बहादुरी नहीं, कर्तव्य से भटकना है। जब इसे सेलिब्रेट किया जाता है, तो यह कोई छोटी गलती नहीं रहती, बल्कि पूरे सिस्टम में फैलने वाली बीमारी बन जाती है। हमें इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि किसी भाषण में नाम भूल गए। असली चिंता यह है कि राज्य खुद अपना संवैधानिक अनुशासन खो रहा है।





