आप सभी बीते कुछ दिनों से UGC की नई गाइडलाइंस को लेकर जाति व्यवस्था से फिर से अवगत हो गए होंगे। दलित-सवर्ण, obc-sc जैसे शब्द आपके कान में किलोमीटर की रफ़्तार से पड़े होंगे! यह बात भी सुनी होगी कि कैसे सनातन में जाति व्यवस्था ही सबसे बुरी चीज है, भारत की तरक्की की राह में रोड़ा है!
लेकिन जिस जाति व्यवस्था पर सनातन को गालियाँ दी जाती हैं, उसी के सहारे अब ईसाईयत को महान बताने की कोशिश हो रही है! जी सही सुना आपने! असल में खबर ही कुछ ऐसी है।
हाल ही में हैदराबाद के Archbishop Cardinal Poola Anthony को CBCI यानी (Catholic Bishops’ Conference of India) का अध्यक्ष चुना गया। CBCI बेसिकली भारत में कैथोलिक क्रिश्चियंस की अपेक्स बॉडी है और उनके नियम क़ायदे डिसाइड करती है।
अब किसी रिलीजियस बॉडी का कोई चीफ चुना जाए, इसमें भला खबर क्या होगी? खबर ये नहीं है एंथनी को अध्यक्ष बनाया गया, खबर ये है कि उनके अध्यक्ष बनने को बेचा कैसे गया? मीडिया इन हेडलाइंस के साथ यह खबर बेच रहा है कि एंथनी देश के पहले ऐसे दलित क्रिश्चियन हैं जो देश के लगभग 2 करोड़ कैथोलिक्स को लीड करेंगे!
आपको ये हेडलाइंस देख कर और मेरी बात सुन कर कुछ अटपटा लगा? नहीं लगा तो मैं बता देता हूँ! आख़िर कोई दलित और क्रिश्चियन एक साथ कैसे हो सकता है? ईसाई तो कैथोलिक होते हैं, प्रोटेस्टेंट होते हैं। और जाति व्यवस्था तो हिंदुओं का सोशल कॉन्स्ट्रक्ट है!
ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र… अगड़ा-पिछड़ा दलित-OBC ये सब तो हिंदुओं के वर्गीकरण हैं? फिर भला कार्डिनल एंथनी दलित कैसे हुए और उनकी इस आइडेंटिटी कि वो अपने रिलीजन को लेकर कितने समर्पित हैं, बजाय ये बेचा जा रहा है कि वो दलित हैं! भाई ईसाई तो ख़ुद कहते हैं कि उनके यहाँ सब बराबर हैं। फिर कोई दलित कैसे हो गया।
ईसाईयत की किताब बाइबिल तक कहती है कि सब बराबर हैं, सबको ईश्वर ने बनाया है। सब ईश्वर के लिए बराबर हैं। भारत में गांव-गांव धर्मांतरण करवाती मिशनरियाँ यही बताती घूमती हैं कि सनातन छोड़ोगे तो सोशल हायरार्की में ऊपर बढ़ोगे? ईसाई बनोगे तो बराबर हो जाओगे?
प्रचार इसी बात के साथ होता है कि अगर हिंदू उनके रिलीजन में कन्वर्ट होंगे तो उन्हें जाति व्यवस्था से मुक्ति मिलेगी। जो जनजातीय और SC समाज के लोग ईसाईयत में कन्वर्ट होते हैं उनके लिए यह दलील दी जाती हैं कि वो कास्ट सिस्टम से तंग आकर, इस समाज से तंग आकर ईसाई के तरफ़ आये हैं।
लेफ्ट लिबरल लॉबी भी इसी बात को लेकर सनातन को गालियाँ देती फिरती है कि यहाँ जाति का कॉन्सेप्ट है। यहाँ कथित नीची जातियों को बराबर नहीं माना जाता, यहाँ कथित तौर पर लोगों को मंदिरों में घुसने की आजादी नहीं है, यहाँ उन्हें दलित और अगड़ा-पिछड़ा में बांटा जाता है और इसीलिए लोग सनातन छोड़ कर ईसाई बन जाते हैं।
तो ये जाति का कॉन्सेप्ट आख़िर ईसाई बनने के साथ कैसे चिपका रह गया? और अगर ईसाई बनने के बाद भी कोई दलित रह जाता है तो तब तो पूरा पर्पज ही नहीं डिफ़िट हो गया? इसका कोई जवाब ना लेफ्ट लिबरल लॉबी के पास होगा और ना सनातन को डेंगू मलेरिया बताने वाले नेताओं के पास!
अच्छा खबर बेची जा रही है कि कार्डिनल एंथनी कैसे इतने तक पहुँचे, कैसे ये ऐतिहासिक है! चाहे इंडियन एक्सप्रेस हो या टाइम्स ऑफ़ इंडिया। हर कोई इस बात को हाईलाइट कर रहा है कि देखिए दलित व्यक्ति अब 2 करोड़ लोगों के रिलिजीयस धार्मिक तौर तरीके मैनेज करेगा!
उनकी कहानी बताने वाली ईसाईयत से जुड़ी वेबसाइट्स भी वही दलित-पिछड़ा वाला एंगल उठाती हैं। बताती हैं कि दलित पैदा हुए एंथनी युवावस्था में मिशनरी की हेल्प से ग़रीबी से बाहर आए। मुझे समझाने की जरूरत नहीं है कि मिसनरी की सहायता से कैसे कोई ग़रीबी से बाहर आता है!
आपके स्क्रीन पर चलती हेडलाइंस ही समझा देंगी कि ईसाई धर्मांतरण करवाने वाली मिशनीरियाँ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकालने के लिए क्या मेथड अपनाती हैं! पैसे से लेकर पढ़ाई और इलाज का लालच तो कॉमन चीज ही बन चुकी है। इसके बाद भी ये एंगल कि किसी दलित को कुछ बनाया गया है वो हिस्टोरिक है!
भाई इस देश का संविधान भी नहीं मानता कि ईसाईयत में कन्वर्ट होने वाला दलित रह सकता है। उन्हें माइनॉरिटी ट्रीट कर सकते हैं लेकिन SC/ST स्टेटस हट जाता है।

इन्फ़ैक्ट इन्हें बातों को लेकर साल 2004 में रंगनाथ मिश्रा आयोग बनाई गई। इस आयोग ने सिफारिश की थी कि अनुसूचित जाति का दर्जा पूरी तरह से धर्म से अलग होना चाहिए और ईसाई व मुस्लिम दलितों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
लेकिन वो UPA सरकार भी इस रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर पाई! क्योंकि ये आधार ही ग़लत है। ये सीधे तौर पर दशकों से हाशिये पर पड़े लोगों के साथ धोखा होगा, कल को ईसाई-मुसलमान हिंदू दलितों के अधिकारों पर डाका पड़ेगा।
कमेटी ने तो ये भी कहा था कि दलित क्रिश्चियन भी ग़ैर बराबरी का शिकार हैं… लेकिन सवाल फिर वही है कि अगर ईसाईयत में ग़ैर बराबरी है ही नहीं तो भला कोई पिछड़ा और कोई दलित कैसे? सब चर्च जाने वाले और जीसस को मानने वाले नहीं हुए?
दरअसल ये दलित शब्द का इस्तेमाल दिखाता है कि ईसाईयत में धर्मांतरित होने वाल लोगो को ख़ुद मिशनरियां ही बराबर नहीं मानती। जो बराबरी का चूरन बेच कर ये लोग सनातन से पिछड़ों-दलितों और जनजातीय समाज के लोगों को धर्मांतरण करवाते हैं, वो पहचान तब भी नहीं छूटती जब कोई उनकी हायरर्की में टॉप पर पहुँच जाता है।
केरल जैसे राज्यों में तो आज भी ईसाइयों के भीतर भयानक जातिवाद है, यहाँ कुछ ईसाई अपने को ऊँची जाति का बताते हैं, उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं जो हिंदू दलित से ईसाई बने हैं। और मिशनरी यहाँ कुछ नहीं कर पातीं। असल में बराबरी का फर्जीवाड़ा सिर्फ़ और सिर्फ़ उस सनातन को कमजोर करने के लिए है, जिसने ना सिर्फ़ समय आने पर अपने में बदलाव किए हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्थाएं बनाई हैं कि पिछड़ों की भरपाई हो। आज राम मंदिर में पुजारी दलित समाज से हैं! किसी मंदिर में कोई नहीं पूछता कि आप किस जात से होहम पुजारी की जाति नहीं पूछते, लेकिन ईसाईयत में जरूर ये बताया जता है कि देखो टॉप पर पहुँचन वाला आदमी भी दलित ही है! कार्डिनल एंथनी के बारे में छपी हैडलाइन भी यही कहानी दोहराती हैं।




