luvnasur ramayana

लवणासुर श्रीराम नाम सुनते ही क्यों पागल हो जाता था? रामायण का अनसुना रहस्य

Summary
दोनों योद्धाओं ने श्रीराम का नाम ले कर के ये द्वन्द युद्ध किया। एक ने श्रीराम का नाम आशीर्वाद के लिए और दूसरे ने श्रीराम का नाम लिया क्रोधावश, एक पुराना बैर पूरा करने।

कुछ समय पहले वायरल हुआ ये मीम तो आपको याद ही होगा। और शायद गूगल कर के आपने लवणासुर कौन था,ये भी पता लगा ही लिया होगा। पर आज हम आपको लवणासुर के बारे में जो इंटरेस्टिंग फैक्ट्स बताने वाले हैं, वो हमने गूगल पर नहीं परन्तु.. मानव इतिहास के सब से पवित्र और महान पुस्तक वाल्मीकि रामायण में पढ़े है।

इस वीडियो में हम आपको लवणासुर को लेकर के कौन कौन से फैक्ट्स बताएँगे –

– लवणासुर की अपराजित शक्तिओं का मूल स्त्रोत
– लवणासुर का इक्ष्वाकु वंश से कनेक्शन
– लवणासुर का फेमस एक्सटेंडेड फैमिली
– श्रीराम के नाम से क्यों क्रोधित होता था लवणासुर
– लवणासुर को किसने और कैसे मारा
– शत्रुघ्न जी ने उसे बिना किसी सेना के, अकेले कैसे मारा? 

ये सारे रहस्य आज इस वीडियो में खुलने वाले हैं। अगर आपने सोचा था कि रामायण सिर्फ राम-रावण की कहानी है… तो फिर रामायण की ही ये कहानी आपके लिए ही है..

सब से पहले आपको बताएँगे कुछ बातें लवणासुर के बारे में। लवणासुर यमुना के तट पर मधुवन में रहता था, जहाँ उसके पिता दैत्य मधु ने एक सुन्दर भवन बनवाया था। वैसे ये मधु, ‘मधु और कैटभ’ वाला मधु नहीं है। मधु कैटभ वाला मधु विष्णुजी के योगनिद्रा के समय उनके कान के मैल से जन्मा था और अत्यंत दुष्ट था। जबकि ये मधु दैत्य, लोला दैत्य का पुत्र था और अत्यंत धर्म-परायण था। 

मधु शिवजी का परम भक्त था। उसकी भक्ति से प्रसन्न हो कर के महादेवजी ने मधु को एक शक्तिशाली शूल दिया, जो उन्होंने अपने ही शूल से प्रकट किया था!  और ये शूल इतना शक्तिशाली था की,  किसी को भी भस्म करने की क्षमता रखता था, साथ में ये भी वरदान दिया की मधु का पुत्र भी उस शूल को रख सकता है। हालाँकि, दैत्य होते हुए भी मधु ने कभी भी उस शूल का दुरुपयोग नहीं किया। 

परन्तु.. पिता जितना निर्मल और धार्मिक, पुत्र लवण उतना ही निर्दय और दुष्ट। 

वन के पशु पक्षी, यहाँ तक कि मानवों को भी वो खा जाता। ख़ास कर के तपस्या करते हुए ऋषिमुनि तो उसका प्रिय आहार थे। लवण की त्रासदी से कोई भी राजा उसे युद्ध करने का सोच भी नहीं सकते थे, क्यूंकि जो भी सामने आता था उसको लवण या तो कच्चा खा जाता या तो वो शूल से एक क्षण में ही भस्म कर देता।

यहाँ तक की प्रभु श्री राम के ही इक्षवाकु कुल के महान राजा मान्धाता को मारने वाला भी यही दैत्य था।

जब कोई भी राजा उस अत्यंत दुराचारी लवणासुर को चुनौती देने को तैयार नहीं हुआ, तब श्री राम के नेतृत्व में शत्रुघ्न जी ने लवणासुर का वध करने का बीड़ा उठाया।और शत्रुघ्नजी को लवणासुर का वध करने के लिए भेजा..

पहले तो, रामजी ने ऋषिगणों से पता की- लवणासुर की कुछ विशेष आदतें, दिनचर्या, भोजन, भोजन का समय, नगर और महल में उसके आने जाने का समय- वगैरह वगैरह। फिर रामजी ने शत्रुघ्नजी को कुछ कुछ युद्ध आवश्यक नीतियां समझाईं। क्यूंकि शिवजी के शूल की शक्ति के चलते ये युद्ध शत्रुघ्नजी को न केवल अस्त्र-शस्त्र और बाहुबल से लड़ना था परन्तु अत्यंत चौकन्ना रह कर के बुद्धि का भी सतर्तकता से उपयोग करना था।

इसके साथ ही, रामजी ने शत्रुघ्नजी को एक अमोघ बाण दिया। वो बाण का सृजन विष्णु भगवान् ने अति दुष्ट दैत्यमधु और कैटभ को मारने के लिए किया था। वो अमोघ बाण पूरी धरती का विनाश करने के लिए सक्षम था।

तो, अपनी सेना, अस्त्रशस्त्र, प्रभु श्री राम की युद्ध सीख और तीनों माताएँ और बड़े भाइयों का आशीर्वाद ले कर के शत्रुघ्न पहुँच गए लवणासुर के नगर मधुरापुरी में। रामजी की बताई हुई बात शत्रुघ्नजी को अच्छे से याद थी कि लवणासुर के साथ युद्ध एक कुशल रणनीति के तहत करना है..

रामजी ने शत्रुघ्नजी को इस बात से अवगत भी कराया था कि महादेवजी के दिए हुए उस शूल की वो प्रतिदिन पूजा करता है और अपने भवन में ही रखता है। जब तक कोई अत्यंत बलवान शत्रु  युद्ध के लिए न आएं, लवणासुर शूल भवन से बाहर नहीं निकालता, न ही प्रतिदिन की क्रियाएं जैसे कि शिकार पे जाते समय, शूल साथ ले कर के जाता है… और लवणासुर को मारने का शत्रुघ्नजी के लिए वही सब से उत्तम अवसर था।

जैसा की शत्रुघ्नजी पहले से जानते थे, लवणासुर सुबह सुबह अपने भोजन की खोज में नगर से निकल कर के जंगल में जाता है- जब लवणासुर जंगल में भोजन के लिए शिकार खोज रहा था, इस बीच शत्रुघ्नजी ने यमुना नदी को पार कर लिया। और हाथ में धनुष ले कर के मधुरापुरी के द्वार पर खड़े हो गए और लवणासुर की प्रतीक्षा करने लगे। दोपहर हो गयी। उतने में अपने भोजन के लिए अनेक प्राणियों का बोझा ले कर के लवणासुर आया। अपने शिकार को लेकर उसको अपने भवन में जाना था। और भवन में जाने के लिए उसको नगर के द्वार से हो कर के जाना था। 

नगर के द्वार पर लवणासुर ने शत्रुघ्नजी को धनुष बाण हाथ में लिए खड़ा हुआ देखा। लवणासुर समझ गया की उसको लड़ाई के लिए ललकारा जा रहा था। लवणासुर ने पहले तो जैसे हंस कर, शत्रुघ्नजी को बच्चा जैसा तुच्छ समझकर, चेतावनी देते हुए कहा- “तेरे जैसे तो हज़ारों शस्त्रधारी मनुष्यों को मैं खा चुका हूँ। वैसे भी आज मेरे भोजन मेरी भूख के अनुसार कम ही है। अच्छा है तू आ गया।” 

पर जब शत्रुघ्नजी ने कहा की वे श्रीराम के भाई हैं, लवणासुर क्रोध से मानो जैसे पागल सा हो गया। अब तो जैसे उसकी कोई दुखती नस पर किसी ने हाथ रख दिया हो, वैसे लवणासुर, शत्रुघ्नजी से लड़ाई करने को दौड़ा। 

पर क्यों? प्रभुश्री राम का नाम सुन कर भला लवणासुर क्यों इतना क्रोधित हो गया? ऐसी कौनसी बात थी जिससे लवणासुर, श्रीराम का नाम सुनते ही, मानो जैसे रावण के जैसा क्रोधित हो गया?

तो इस रहस्य का भी लवणासुर स्वयं ही भेद खोलता है। वो शत्रुघ्नजी को कहता है “उस राम से तो मुझे विशेष बैर और क्रोध है क्यूंकि वो राम ही था जिसने रावण को मारा था, वो रावण और कोई नहीं, मेरी मौसी शूर्पणखा का भाई था।”

बिलकुल! रावण लवणासुर का मामा था। 

दोनों में युद्ध प्रारम्भ हुआ। शत्रुघ्नजी को बस दो ही बात ध्यान में रख कर युद्ध करना था – एक तो स्वयं की रक्षा करनी- कि- लवणासुर उनको भोजन न बना लें और दूसरा की कैसे भी कर के लवणासुर उस शूल तक न पहुंचे।

थोड़े समय तक दोनों के बीच में युद्ध चला। उतने में ही, लवणासुर ने एक विशाल वृक्ष उखाड़ कर के शत्रुघ्नजी के सर पे मारा, जिससे शत्रुघ्नजी थोड़ी देर के लिए मूर्छित हो गए। लवणासुर को लगा की शत्रुघ्नजी मर गए। 

भूख से व्याकुल लवणासुर को भवन में रखें हुए शूल को लाना याद नहीं पड़ा। वो अपनी भोजन सामग्री इकठ्ठा करने में लग गया। उतने में शत्रुघ्नजी उठे और निकला अपना अमोघ बाण। लवणासुर अभी कुछ सोचे या समझे, उसके पहले, तुरंत ही वो बाण आ लगा लवणासुर की छाती पर। और उस असुर  के  ह्रदय चीरता हुए, लवणासुर नाम की त्रासदी का अंत कर के बाण शत्रुघ्नजी के पास लौट गया। 

ये युद्ध शत्रुघ्नजी ने एक भी सैनिक की सहायता के बिना लड़ा। दोनों योद्धाओं ने श्रीराम का नाम ले कर के ये द्वन्द युद्ध किया। एक ने श्रीराम का नाम आशीर्वाद के लिए लिया और दूसरे ने श्रीराम का नाम लिया क्रोधावश, एक पुराना बैर पूरा करने। प्रभु श्री राम का जैसे जिसने स्मरण किया, उसको फल भी वैसा ही मिला.. एक का भव्य विजय तो दूसरे का करुण अंत!

इक्षवाकु नंदन शत्रुघ्नजी ने लवणासुर का वध किया और अपने ही पूर्वज मान्धाता के हत्यारे को मार कर उन्हें न्याय दिलाया। मधुरापुरी के लोग बरसों बाद भयमुक्त जीवन जीने वाले थे। तीनों लोक धन्य हुए। शत्रुघ्नजी श्रीराम का दिया हुआ कार्य संपन्न कर के अत्यंत गर्वित हुए। सब कुछ सकुशल सम्पूर्ण हुआ। 

परन्तु… वीडियो के अंत में आपके मन में कुछ सवाल अवश्य उठे होंगे। जैसे कि –

रावण और लवणासुर का मामा भतीजा का संबंध.. लवणासुर वध के पश्चात् मधुरापुरी का क्या हुआ? अभी इस समय कहाँ है ये मधुरापुरी। 

ये प्रश्न हमारे मन में भी उठे थे। जिसके उत्तर हमने वाल्मीकि रामायण से ही निकाले। तो अगले वीडियो में इन्हीं प्रश्नों का उत्तर देते हुए हम बात करेंगे 

  • रावण के समस्त राक्षस कुल की उत्पत्ति के बारे में
  • लवणासुर उस वंशावली में कहाँ पर आता है
  • और मधुरापुरी की ‘Town Planning’ के बारे में
Editorial team:
Production team:

More videos with OpIndia as Anchor/Reporter