फेसबुक चलाने वाली कंपनी मेटा (META) पर इकोसिस्टम का क़ब्जा है? अगर आपको संदेह है तो ये कहानी पढ़िए।
6 अप्रैल 2026 को ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें मेटा इंडिया की पब्लिक पॉलिसी टीम पर सवाल उठाए गए। खासकर दो नाम सामने आए थे इसमें प्रियंका राव-खान और उनके शौहर मोहम्मद अली खान। अब सवाल क्या था?
सवाल एकदम आसान सा था कि क्या मेटा इंडिया, जो करोड़ों भारतीयों के कंटेंट को नियंत्रित करता है, उसमें किसी तरह का राजनीतिक पक्षपात हो सकता है?
सोशल मीडिया, खासकर ट्विटर पर ये चर्चा चल रही थी कि मेटा, भाजपा समर्थकों की बात और हिंदुओं के मुद्दों को दबाता है और कुछ यूजर्स ने आरोप लगाया कि इसकी वजह प्रियंका राव-खान और उनके कांग्रेस पार्टी से जुड़े पति हो सकते हैं।
अब यहाँ से कहानी मोड़ लेती है। दोनों ने सीधे दिल्ली उच्च न्यायालय में जाकर केस कर दिया। आरोप लगाया कि उनके ख़िलाफ़ मानहानि, सांप्रदायिक निशाना बनाना, और एक कॉर्डिनेट्ड कैंपेन चलाया जा रहा है। मियां-बीवी ने अदालत में एक सिविल सूट दायर किया।
इस केस में प्रतिवादी बनाए गए, एक्स कॉर्प यानी ट्विटर, इसके अलावा दो गुमनाम हैंडल “झुनझुनुवाला” और “मुजीफ्रेन”, और एक जॉन डो यानी कुछ अज्ञात खाते।
15 अप्रैल 2026 को न्यायाधीश जस्टिस सुब्रमोनियम प्रसाद ने एक एकपक्षीय निषेधाज्ञा पारित कर दी। इसका मतलब, बिना दूसरी तरफ को सुने एकतरफा फैसला देना। अदालत ने कहा कि कुछ ट्वीट प्रथम दृष्टया “अश्लील, अपमानजनक और सांप्रदायिक हैं” और उन्हें हटाने का आदेश दे दिया।
ये आदेश सिर्फ आरोपियों तक सीमित नहीं था। अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि आम जनता भी, वह कंटेंट साझा नहीं कर सकती। यानी वो सारे पोस्ट, जिनमें इन दोनों यानी प्रियंका राव-खान और मोहम्मद अली खान पर मेटा में पक्षपात और कांग्रेस से संबंध के आरोप लगाए जा रहे थे, अब साझा नहीं किए जा सकते।
ऑपइंडिया इस केस में पक्षकार ही नहीं था। ना हमें सुना गया, ना नोटिस मिला। फिर भी ऑपइंडिया को कानूनी नोटिस भेजा गया कि अपना लेख हटाओ और फिर ऑपइंडिया ने लेख हटा भी दिया। क्यों? क्योंकि अदालत का आदेश बाध्यकारी था। लेकिन ऑपइंडिया ने रिपोर्टिंग तथ्यों के आधार पर की थी। और तथ्य क्या हैं? तथ्य ये हैं कि मोहम्मद अली खान खुद को कांग्रेस से जुड़ा बताते हैं।
प्रियंका राव-खान मेटा इंडिया में नीति संबंधी भूमिका में थीं, और 20 जनवरी 2026 को इस्तीफा दे चुकी थीं दोनों पति-पत्नी हैं और ये खुद अदालत के रिकॉर्ड में है। तो फिर सवाल उठाना गलत कैसे हो गया? सबसे दिलचस्प बात देखिए, जिस मेटा पक्षपात की बात ट्विटर पर हो रही थी वही आरोप कांग्रेस खुद भी पहले लगा चुकी है, तो फिर जब वही बात एक कांग्रेस से जुड़े व्यक्ति पर आती है तो वो “सांप्रदायिक” कैसे हो जाती है?
कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम ने तो यहाँ पीड़ित होने का कार्ड खेला है और सबसे बड़ा मुद्दा देखिए क्या एक एकपक्षीय आदेश, जिसमें मीडिया को सुने बिना रोक दिया जाए, वह प्रेस की स्वतंत्रता के लिए खतरनाक उदाहरण नहीं है? आज तो ऑपइंडिया है कल कोई और होगा। हम कानून मानते हैं लेकिन इस इकोसिस्टम के गठजोड़ पर सवाल पूछना बंद नहीं करेंगे।





