एक एंड्राइड फ़ोन कंपनी है जिसका एक कोर्ट में केस चल रहा था। उस कोर्ट के जज साहब आईफ़ोन चलाते थे, इस बात से एंड्राइड कंपनी नाराज हो गई कि जो जज एंड्राइड नहीं चलाता भला वो उस कंपनी को कैसे न्याय दिला पाएगा। इस कंपनी के लिए सबूत, गवाह, दलील ये सब सेकेंडरी चीज़ बन गई थी।
अब न्याय की दृष्टि से ये कितनी ख़तरनाक बात है। इस हिसाब से जिसके इंटरेस्ट में जो जज फिट नहीं बैठेगा वो ऐसा ही कोई पैंतरा अपनाएगा।
अब जैसे अरविंद केजरीवाल ने बोला कि दिल्ली हाई कोर्ट की जज स्वर्णकांता के सामने वो अपना केस नहीं लड़ेंगे। केस इसलिए नहीं लड़ेंगे क्योंकि वो उनके इंटरेस्ट में फिट नहीं बैठती।
लेकिन फिर केजरीवाल ये भी कहते हैं कि फ्यूचर में अगर जस्टिस स्वर्णकांता के सामने उनका कोई और केस आता है जिसमें सामने बीजेपी या केंद्र सरकार या सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता नहीं होंगे तो वो उनके सामने जरूर पेश होंगे।
अरे भाई ये क्या बात हुई? मतलब चित भी मेरी पट भी मेरी, अंटा मेरे बाप का। ऐसे तो स्टेट में फिर क़ानून का कोई काम नहीं रह जाएगा। स्टेट वर्सेस फलाना केस की जब बात होती है तो केजरीवाल फिर इसी को ही खत्म करना चाहते हैं।
सवाल ये है केजरीवाल अदालत को अपनी पोलिटिकल स्ट्रेटेजी का ग्राउंड क्यों बना रहे हैं? उन्हें निचली अदालत से राहत मिली, ठीक बात है। सीबीआई ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया तो केजरीवाल को पहले की ही तरह वहाँ भी अपनी लड़ाई लड़ने का पूरा अधिकार है लेकिन ये कहना कि मैं इस जज के सामने नहीं लड़ूँगा ये न्यायिक व्यवस्था में एक ख़तरनाक पैटर्न ला सकता है।
ऐसे तो जो व्यक्ति न्यायिक व्यवस्था को इन्फ्लुएंस कर सकता है वो फिर यही करेगा कि अपने पसंद के जज से अपने मामले की सुनवाई करवाएगा।
कुलमिलाकर, ये सीधे-सीधे बेंच हंटिंग की ओर इशारा करता है। भावनायें अपनी जगह हैं और फैक्ट अपनी जगह। इस देश में न्याय की एक व्यवस्था बनी हुई है। निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक आप न्याय के लिए लड़ सकते हैं। इसमें व्यक्ति नहीं तय करता है कि वो अपना मामला किस जज के पास लेकर जाएगा।
अरविंद केजरीवाल के साथ समस्या शुरुआत से ये रही है कि वो क्रेडिबिलिटी को ही खत्म करना चाहते हैं। सीएम बनने के लिए धरने पर बैठे थे, जब सीएम बन गए तो भी धरने पर बैठ गए कि काम नहीं करने दे रहे, धरने की क्रेडिबिल्टी खत्म।
जब जेल गए तो इन्होंने वहां खूब आम खाये और अपना सुगर बढ़ाया और ये मेसेज दिया कि वो बीमार हैं, उनकी केयर नहीं हो रही है। यहाँ भी वही क्रेडिबिल्टी वाला मामला और अब केजरीवाल उस व्यवस्था को डैमेज करना चाहते हैं जिस पर इस देश के आम आदमी का भरोसा है कि उसे आख़िर में यहाँ न्याय मिलेगा। ऐसे में कोर्ट को भी इस तरह की चीज़ों को एंटरटेन करने से बचना चाहिए और केजरीवाल के ज़रिए ही न्याय की दृष्टि से एक उदाहरण सेट करना चाहिए।



