करीब 500 वर्षों तक हिंदू समाज ने प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान के लिए संघर्ष किया। मुस्लिम आक्रांताओं से लेकर अंग्रेजों के शासन तक और आज़ादी के बाद भी यह लड़ाई लगातार जारी रही।
यह संघर्ष सिर्फ अदालतों तक सीमित नहीं था, इसमें हजारों रामभक्तों ने अपने प्राणों का बलिदान भी दिया और आखिरकार 9 नवंबर 2019 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और विवादित भूमि को श्रीराम जन्मभूमि मानते हुए वहां मंदिर निर्माण का अधिकार हिंदू पक्ष को दे दिया।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया। इसी आदेश के तहत श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ। यहीं से शुरू हुई श्रीराम मंदिर के नए अध्याय की कहानी।
महंत नृत्य गोपाल दास इस ट्रस्ट के अध्यक्ष बने, चंपत राय महासचिव, स्वामी गोविंदगिरी कोषाध्यक्ष और नृपेंद्र मिश्रा को निर्माण समिति की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह समझना जरूरी है कि ट्रस्ट का गठन भले ही केंद्र सरकार ने किया हो, लेकिन इसका संचालन सरकार नहीं करती। यह एक स्वतंत्र संस्था है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के केवल एक-एक प्रतिनिधि शामिल हैं। यानी मंदिर के निर्माण और प्रबंधन की पूरी जवाबदेही इसी ट्रस्ट की थी।
इसी ट्रस्ट ने प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण के लिए 15 जनवरी 2021 को मकर संक्रांति के दिन से श्रीराम मंदिर समर्पण निधि अभियान शुरू किया गया। यह सदियों के संघर्ष, करोड़ों लोगों की आस्था और पूरे समाज की भावनाओं से जुड़ा एक राष्ट्रीय संकल्प था। भारत समेत विश्व के कोने-कोने से हिंदू समाज ने अपने आराध्य के लिए अपने ख़ज़ाने खोल दिए। यह अभियान 44 दिन तक चला और 27 फ़रवरी 2021 को वसंत पंचमी के दिन बंद होने तक इससे करीब 2500 करोड़ रुपये से अधिक का दान जमा हुआ।
मंदिर का मूल डिजाइन वही रखा गया, जो 1989 में प्रसिद्ध मंदिर वास्तुकार चंद्रकांत सोम्पुरा और उनके परिवार द्वारा तैयार किया गया था। बाद में चंद्रकांत सोम्पुरा के पुत्रों ने इसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार संशोधित किया। डिज़ाइन पूरी तरह उत्तर भारतीय नागर शैली पर आधारित रखा गया।
सोचिए… उस समय राम जन्मभूमि की ज़मीन को मापने की भी अनुमति नहीं थी। ऐसे में चंद्रकांत सोम्पुरा ने फीता नहीं, बल्कि अपने कदमों से पूरी ज़मीन का अंदाज़ा लगाया। उसी माप पर मंदिर का पहला डिज़ाइन तैयार हुआ। सालों बाद जब असली सर्वे हुआ, तो वह माप लगभग पूरी तरह सही निकली। यह इंजीनियरिंग या वास्तुकला की कहानी तो है ही, साथ ही साथ आस्था, धैर्य और विश्वास की भी कहानी है।
इसके बाद शुरू हुआ आधुनिक भारत का सबसे बड़ा सांस्कृतिक और धार्मिक निर्माण अभियान। रिकॉर्ड समय में मंदिर का निर्माण आगे बढ़ा और 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई। वह पल करोड़ों हिंदुओं के लिए सदियों के संघर्ष का सपना पूरा होने जैसा था। PM मोदी इस यज्ञ के मुख्य यजमान बने और मुख्य आचार्य लक्ष्मीकांत दीक्षित के नेतृत्व में लगभग सौ से अधिक वैदिक विद्वानों और आचार्यों ने प्राण प्रतिष्ठा का अनुष्ठान संपन्न कराया। उस दिन करोड़ों लोगों की आंखें नम थीं। सदियों का संघर्ष, अनगिनत बलिदान और पीढ़ियों का इंतजार आखिरकार अपने मुकाम तक पहुंच चुका था।
राम मंदिर में रामलला के विराजने के दिन पूरे देश में उत्सव मनाया गया। शहरों से लेकर गांवों तक हर मंदिर में धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। इस दिन को पूरे हिंदू समाज ने दीपावली की तरह मनाया।
प्राण प्रतिष्ठा के बाद मंदिर को भक्तों के दर्शन के लिए खोल दिया गया। इसके बाद श्री राम मंदिर तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का असली काम शुरू हुआ जो था मंदिर प्रबंधन का काम। मंदिर का निर्माण पूरा करना एक उपलब्धि थी, लेकिन उसका संचालन उससे भी बड़ी जिम्मेदारी है।
ट्रस्ट ने मंदिर निर्माण में अच्छा काम किया और रिकॉर्ड समय में निर्माण पूरा किया। मंदिर बन जाना किसी ट्रस्ट की अंतिम जिम्मेदारी नहीं होती। असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है। दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा, दान का प्रबंधन, वित्तीय पारदर्शिता और करोड़ों श्रद्धालुओं के भरोसे की रक्षा; यही किसी धार्मिक संस्थान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी होती है। राम मंदिर दान चोरी का मामला इसी जिम्मेदारी पर सवाल खड़े करता है।
सबक सिर्फ इतना नहीं है कि चोरी हुई, बल्कि यह भी है कि इतने बड़े धार्मिक संस्थान को अब आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत है। जहां करोड़ों रुपये का दान और सोना आता हो, वहां सिर्फ भरोसे से नहीं, बल्कि मजबूत प्रोटोकॉल, CCTV निगरानी और पारदर्शी सिस्टम से काम चलता है।
इसी बीच राम मंदिर दान चोरी मामले पर पहली बार RSS ने भी आधिकारिक प्रतिक्रिया दी। सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि इस घटना से करोड़ों रामभक्तों की आस्था आहत हुई है। दोषियों को कड़ी सजा मिले और मंदिर प्रबंधन की कमियां दूर कर पूरी व्यवस्था पारदर्शी बनाई जाए।
जांच भी तेजी से आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने SIT को 15 जुलाई तक अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है। कई आरोपितों की गिरफ्तारी हो चुकी है और सरकार का कहना है कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।
अब निगाहें 6 जुलाई को होने वाली श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की बैठक पर हैं। चंपत राय, अनिल मिश्रा और गोपालजी राव को लेकर उठ रहे सवालों पर क्या फैसला होगा, यह देखना बाकी है।
क्योंकि आखिरकार, राम मंदिर सिर्फ एक भव्य इमारत नहीं है। यह करोड़ों लोगों की आस्था का प्रतीक है। और आस्था तभी मजबूत होती है, जब उसके साथ जवाबदेही और पारदर्शिता भी उतनी ही मजबूत हो।




