आपके मन में ये चिंता नहीं आई होगी, इसलिए नहीं आई होगी क्योंकि अब हमारा रेलवे Mostly Electrified हो चुका है, लेकिन आज से 10 साल पहले स्थिति ये नहीं थी, बल्कि हम Heavily Diesel Engines पर ही Reliant थे और आज के जैसे Crisis हम तब झेलते तो शायद हमारी रेल के पहिए रुक जाते।
आज पूरी दुनिया में सबसे बड़ी चिंता क्या है? जाहिर सी बात है कि ईरान इजरायल के युद्ध के बीच उपजा Energy Crisis। और इस Energy Crisis में हम सभी सोच रहे है कि अगर समय पर कच्चा तेल हमारे देश नहीं पहुँचा तो क्या होगा? क्या हमारे देश में कारों के पहिए रुक जाएँगे?
लेकिन क्या आपके मन में ये चिंता आई है कि अगर देश में रेलवे के पहिए Oil Crisis के चलते रुक जाएँगे तो क्या हो? क्या हो आपको कुछ ही घंटों में अपनी Destination पर पहुँचाने वाली रेल Diesel की कमी से स्टेशन पर ही खड़ी रह जाए?
लेकिन ऐसा क्यों हुआ है और कैसे हमने अपने डीजल पर Dependence ख़त्म तो की ही और साथ ही हजारों करोड़ रुपए बचाए, ये आपको मैं आगे कुछ मिनट में बताने वाली हूँ।
साल 2014 में हमारे देश का केवल 33% रेलवे नेटवर्क ही Electrified था। यानी लगभग दो तिहाई नेटवर्क पर ट्रेनें चलाने के लिए डीजल की जरूरत थी। Railways की 2013-14 की Annual Report कहती है कि तब हमारे पास 5600 से ज़्यादा Diesel Railway Locomotives थे। और इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स का नंबर 4823 था। यानी हमारे रेलवे के Rolling Stock में ज्यादा शेयर डीजल लोकोमोटिव्स का था। और इसी के चलते तब हमारा डीजल कंजम्पशन भी काफ़ी हाई था। ये कितना था मैं आपको अभी नंबर्स से बताती हूँ।
देश में Energy Saving और उसके Consumption पर काम करने वाले Institute TERI की एक Report कहती है कि 2014-15 में हमारा रेलवे लगभग 285 करोड़ लीटर Use कर रहा था। In fact हमारे देश में जितना भी Diesel Consume होता था, उसका लगभग 3.5% अकेले रेलवे ही कर रहा था।
2014 का ही रेलवे का एक और Document दिखाता है कि तब रेलवे को लगभग 19 Thousand Crore Rupees से ज्यादा डीजल पर खर्च करने पड़े थे और ये Bill Exponential तरीके से बढ़ रहा था। ऊपर से ये Diesel Supply में इतनी ज्यादा Cost का अन्तर रहता था कि रेलवे ख़ुद ही परेशान थी।
जिस रेलवे डॉक्यूमेंट का मैंने जिक्र किया, उसी में एक काफ़ी Interesting बात लिखी है। इसमें लिखा है कि ओडिशा के राउरकेला में इंडियन ऑयल का डिपो 102 km दूर झारसागुड़ा में 65 Rupees 73 Paise में डीजल सप्लाई कर रहा था जबकि इसी शहर में पारादीप से आने वाले डीजल 67 Rupees से ज्यादा में था।
यानी डीजल पर Dependence इंडियन रेलवे के लिए तगड़ा बिल बना रही थी और Environment को तो नुकसान हो ही रहा था। और इन सबसे अलग, अगर रेलवे की यही कंडीशन रहती तो ऐसे युद्ध के बीच शायद हमारी रेलवे के पहिए रुक जाते क्योंकि Crude की सप्लाई हैंपर होती।
जब क्रूड की सप्लाई हैंपर होती तो डीजल भी नहीं बनता और जब डीजल नहीं बनता तो रेलवे अपनीं Trains Operate ही नहीं कर पाता। फिर ना Passengers अपनी मंजिल पहुँच पाते और ना ही Freight का Movement हो पाता। इससे देश की इकॉनमी को भी तगड़ा झटका लगता।
लेकिन सवाल उठता है कि ये सब बदला कैसे रेलवे ने डीजल से इलेक्ट्रिफिकेशन पर शिफ्ट करके अब हजारों करोड़ रुपए तो बचाए ही साथ में ऐसे सप्लाई शॉक्स से ही हमें बचाया। और ये सब पिछले 10-12 सालों में ही मेजरली हुआ है।
डीजल से इलेक्ट्रिक कितना पैसा बचा?
सबसे पहले समझिए कि अब हमारा लगभग 100% रेलवे रूट इलेक्ट्रिफाई हो चुका है। यानी अब कुछ ही रेल रूट्स ऐसे होंगे जहाँ हमें डीजल इंजन से ट्रेन्स को ऑपरेट करने की जरूरत पड़ती है। एक डेटा कहता है कि मोदी सरकार में 46 हज़ार 900 रेलवे किलोमीटर रूट इलेक्ट्रिफाई किया गया है।
और इसने सीधे रिजल्ट दिया है डीजल के कंजम्पशन में। सिंस सारी ट्रेन्स Electric Traction पर चलती हैं तो डीजल की जरूरत ही नहीं पड़ती। रेलवे की साल 2024-25 की ईयरबुक बताती है कि उसने इस साल में लगभग 97 करोड़ लीटर डीजल कंज्यूम किया है।
अब आप इसको 2014-15 के डेटा से कंपेयर कीजिए। क्लियर कैलकुलेशन से पता चलता है कि हमारा एनुअल डीजल कंजम्पशन इस बीच 188 करोड़ लीटर घट चुका है चुका है। सोचिए, करोड़ों लीटर डीजल से रेलवे को मुक्ति मिल गई है।
और ऐसा नहीं है कि ये कोई फ्यूल चॉइस का कोई मामला है। इससे कॉस्ट में भी तगड़ी सेविंग्स हुई हैं। 188 लीटर को अगर हम आज के दिल्ली के डीजल के रेट्स से भी कैलकुलेट करें तो ये नंबर 16 हज़ार करोड़ से ऊपर का आता है। यानी रेलवे ने इतना पैसा एक शिफ्टिंग से बचाया है।
और ये इसलिए हुआ है क्योंकि मोदी सरकार ने रेलवे के इलेक्ट्रिफिकेशन के लिए पुश किया। और डीजल के फेज आउट होने से रेलवे में डीजल लोकोमोटिव्स भी कम हो गए हैं। रेलवे की 2024-25 की ईयर बुक बताती है कि अब हमारी रेलवे के पास 42 सौ 96 डीजल लोकोमोटिव्स हैं।
और इस बीच इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स का नंबर 11 हज़ार से ऊपर जा चुका है। यानी 2014 के मुक़ाबले इलेक्ट्रिक इंजन्स डबल से भी ज्यादा हो गए हैं। और इलेक्ट्रोसिटी से इंजन्स को चलाना डीजल से उन्हें चलाने के मुक़ाबले कहीं ज्यादा एफिशिएंट है।
क्योंकि डीजल ट्रैक्शन में जहाँ 35%-40% ही एफिशिएंसी मिलती है तो वहीं इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव्स में ऑलमोस्ट 90% एफ़ेशियंसी Achieve होती है। इसका एक एग्जांपल 2023-24 का डेटा है। इस साल रेलवे ने 4700 करोड़ रुपए से ज्यादा डीजल में बचाए।
इस सब के अलावा इंडिया ने इस शिफ्ट से 400 करोड़ किलो से ज्यादा CO2 एमिशन को कम किया। यानी पैसा तो बचा ही, साथ में हमारे पर्यावरण को भी बड़ा फ़ायदा हुआ और हम अपने नेट जीरो एमिशन के गोल के करीब पहुँचे। और अब इन सबसे ज्यादा, सबसे जरूरी बात।
आज पूरी दुनिया एनर्जी क्राइसिस से जूझ रही है। स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ बंद है, जहाँ से हमारे तेल और गैस का एक मेजर पोर्शन आता है। दुनिया के दूसरे बड़े सप्लायर रूस पर सैंक्शंस लगे हुए हैं, वेनेजुएला की प्रोडक्शन कैपेसिटी गिर चुकी है और बाक़ी देश भी पहले ख़ुद की जरूरतों को प्रायोटाइज़ कर रहे हैं।
ऐसे में अगर कुछ दिनों में समस्या सोल्व नहीं होती तो हमें शायद नेशन वाइड क्राइसिस झेलना पड़ सकता है, कुछ कुछ वैसे ही जैसे दुनिया भर ने 1973 में देखी थी, जब Yom Kippur War ने दुनिया के चलते फ़्यूल सप्लाई रुक गई थी।
लेकिन इस इलेक्ट्रिफिकेशन ने ये मेक श्योर कर दिया है कि हमारा रेलवे ऐसी क्राइसिस में ना फँसे और इकॉनमी के पहिए घूमते रहें।




