असम ग्राउंड रिपोर्ट की तीसरी कड़ी में देखिए बारपेटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली का माहौल कैसा है? हिमंता बिस्वा सरमा की ईमानदारी पर क्या सोचती है जनता? बीजेपी को 120 सीटें मिलने का दावा क्यों किया जा रहा है? राहुल गांधी और गौरव गोगोई के आरोपों को लोग क्यों खारिज कर रहे हैं? असम के विकास और बदलती राजनीति पर युवाओं की क्या राय है?
इन सभी सवालों के जवाब जानिए इस ग्राउंड रिपोर्ट में।
बारपेटा जिला असम के सबसे महत्वपूर्ण जिलों में से एक माना जाता है। हिंदू सभ्यता में इसे दूसरा वैकुंठ भी कहा जाता है। लेकिन आज यह इलाका जनसांख्यिकीय बदलाव और इस्लामी कब्जे के आरोपों को लेकर लगातार चर्चा में है। यहां हिंदू अब कई हिस्सों में अल्पसंख्यक हो चुके हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने संघर्ष करना नहीं छोड़ा है। आने वाले दिनों में हम इस पूरे मुद्दे पर भी विस्तृत ग्राउंड रिपोर्ट लेकर आएंगे। फिलहाल देखिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से अनुराग मिश्रा की यह जमीनी रिपोर्ट।
बारपेटा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली के दौरान सबसे दिलचस्प बात यह दिखाई दी कि यहां भीड़ केवल राजनीतिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं थी। सड़क के दोनों तरफ आम लोग, युवा, महिलाएं, ड्राइवर, छोटे व्यापारी और स्थानीय निवासी लगातार रैली स्थल की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे थे। उत्तर-पूर्व की राजनीति को करीब से देखने वाले जानते हैं कि यहां अक्सर राजनीतिक रैलियों में वैसी भीड़ नहीं दिखाई देती जैसी हिंदी पट्टी में दिखती है। लेकिन बारपेटा का दृश्य अलग था।
रैली में पहुंचे लोगों से जब कांग्रेस द्वारा लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों पर सवाल पूछा गया तो अधिकांश लोगों ने इन आरोपों को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। राहुल गांधी और पवन खेड़ा द्वारा हिमंता बिस्वा सरमा और उनके परिवार पर लगाए गए आरोपों को लेकर जनता में वैसा असर दिखाई नहीं दिया जैसा विपक्ष उम्मीद कर रहा होगा। कई लोगों ने साफ कहा कि उनके लिए सबसे बड़ा मुद्दा विकास है।
एक स्थानीय ड्राइवर अब्दुल सलाम ने कहा कि पहले 10 किलोमीटर का सफर तय करने में डेढ़ घंटा लग जाता था, लेकिन अब वही दूरी 10 मिनट में पूरी हो जाती है। उन्होंने दावा किया कि सड़क, फ्लाईओवर और ब्रिज बनने के कारण असम की तस्वीर बदली है। दिलचस्प बात यह रही कि मुस्लिम समुदाय से आने वाले कुछ लोगों ने भी खुलकर बीजेपी के समर्थन की बात कही और कांग्रेस पर “धोखेबाजी” करने का आरोप लगाया।
कई युवाओं ने हिमंता बिस्वा सरमा को “मामा” कहकर संबोधित किया। असम की राजनीति में यह संबोधन अब एक राजनीतिक ब्रांडिंग की तरह उभर चुका है। युवाओं का कहना था कि मुख्यमंत्री की छवि आम लोगों से जुड़ी हुई है और यही कारण है कि उन्हें समर्थन मिल रहा है। कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि “मामा की मुस्कुराहट देखकर वोट दे देते हैं।”
रैली में मौजूद महिलाओं ने सुरक्षा के मुद्दे को सबसे बड़ा बदलाव बताया। कई महिलाओं ने दावा किया कि कांग्रेस शासन के दौरान वे रात में बाहर निकलने से डरती थीं, जबकि अब देर रात तक बाहर आने-जाने में डर महसूस नहीं होता। उनके मुताबिक वर्तमान सरकार में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है।
राहुल गांधी और गौरव गोगोई पर भी लोगों ने तीखी प्रतिक्रियाएं दीं। कई लोगों ने आरोप लगाया कि कांग्रेस केवल बयानबाजी कर रही है जबकि जमीनी स्तर पर बीजेपी सरकार ने सड़क, पुल, पार्क और रोजगार के क्षेत्र में काम किया है। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि पहले सरकारी नौकरी के लिए रिश्वत देनी पड़ती थी जबकि अब बिना पैसे के नौकरी मिलने का दावा किया जा रहा है।
हालांकि भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने साफ कहा कि चाहे बीजेपी जीते या कांग्रेस, आम आदमी को काम तो करना ही पड़ेगा। उनका कहना था कि राजनीतिक दल बदलते रहते हैं लेकिन आम लोगों की जिंदगी बहुत ज्यादा नहीं बदलती। यह आवाज भी इस ग्राउंड रिपोर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा रही क्योंकि इससे यह समझ आता है कि हर व्यक्ति राजनीतिक भावनाओं में बहा हुआ नहीं है।
बारपेटा की इस रैली में सबसे ज्यादा सुनाई देने वाला शब्द था — “विकास”। लोगों ने गुवाहाटी में बने फ्लाईओवर, ब्रिज, सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर का लगातार जिक्र किया। कई लोगों ने दावा किया कि 70 साल में जितना काम नहीं हुआ, उतना पिछले 10 वर्षों में हुआ है। भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने यहां तक दावा कर दिया कि असम में बीजेपी-एनडीए को 100 से 120 सीटें मिलेंगी और कांग्रेस लगभग खत्म हो जाएगी।
इस पूरी बातचीत के दौरान यह साफ दिखा कि असम में राजनीतिक लड़ाई अब केवल हिंदुत्व बनाम सेक्युलरिज्म तक सीमित नहीं है। यहां विकास, पहचान, जनसांख्यिकी, सुरक्षा और क्षेत्रीय अस्मिता सब एक साथ जुड़े हुए मुद्दे हैं। हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति इन्हीं मुद्दों के इर्द-गिर्द अपनी पकड़ मजबूत करती दिखाई देती है।
बारपेटा से यह ग्राउंड रिपोर्ट यही दिखाती है कि विपक्ष के आरोपों और सोशल मीडिया की बहसों से अलग जमीन पर जनता का मूड कई बार बिल्कुल अलग होता है। आरोपों का जवाब लोग अपने अनुभवों के आधार पर दे रहे हैं — सड़क, पुल, यात्रा का समय, सुरक्षा और सरकारी योजनाओं के जरिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस रैली में जुटी भीड़ और लोगों की प्रतिक्रियाएं फिलहाल यही संकेत देती हैं कि असम की राजनीति में बीजेपी अभी भी मजबूत स्थिति में दिखाई दे रही है। लेकिन इसके साथ-साथ राज्य के भीतर जनसांख्यिकीय बदलाव और सामाजिक तनाव जैसे मुद्दे भी लगातार उभर रहे हैं, जिन पर आने वाले समय में राजनीति और तेज होने वाली है।





