Gold price in India

35000 टन सोना और एक अनसुलझा आर्थिक संकट: क्या भारत का सोने के प्रति मोह कभी खत्म होगा?

Summary
लोगों ने सोना खरीदना जारी रखा। जहाँ भी सोने की कमी हुई, वहां स्मगलिंग से आया सोना काम आता रहा। लेकिन सरकार और सोने का यह रिश्ता केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा। इससे भी कठोर कदम 1968 में उठाए गए थे।

सोना हमारे देश की रगों में ही नहीं, फिल्मों में भी बहता है। सोना हमारे समाज में इतना जरुरी क्यों है? क्या आपने कभी सोचा है कि 1970 और 1980 के दशक की बॉलीवुड फिल्मों में ज्यादातर विलेन सोने के स्मगलर क्यों होते थे? ‘डॉन’ और ‘दीवार’ फिल्म में अमिताभ बच्चन के किरदारों को याद कीजिए, तब भी बड़ा आदमी बनने का सबसे छोटा रास्ता ‘गोल्ड स्मगलिंग’ ही होता था। ‘अमर अकबर एंथोनी’ फिल्म में भी जब प्राण की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त होती है, तो उनके हाथ सोने की पेटी लग जाती है और उसी सोने के दम पर वह फिल्म के अंत तक एक खतरनाक स्मगलर बन जाते हैं, जो घर से बाहर निकलते वक्त पीठ पर बुलेट प्रूफ जैकेट पहनते हैं।

ये सारी बातें मुझे तब याद आईं जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक मंच से भारतीयों से सोना न खरीदने की अपील की। हमारे देश में सोना खरीदने का मोह इतना गहरा है कि हम इसे चाहकर भी नहीं छोड़ पाते, चाहे सोना 1 लाख रुपए तोला हो या 1.5 लाख रुपए तोला। सुनारों की दुकानों पर हमेशा भीड़ लगी ही मिलती है।

वैसे, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सरकार ने सोने की खरीदारी कम करने के लिए कोई कदम उठाए हों। सोना इंपोर्ट और सरकारी नियमों का यह रिश्ता कम से कम 65 वर्षों से चला आ रहा है। आज भले ही प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से सिर्फ अपील की है, लेकिन आज से लगभग 65 साल पहले, 1962 में चीन से युद्ध के बाद जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार कम हो गया था, तब भी सोने को लेकर काफी गंभीर कदम उठाए गए थे। उस समय सरकार ने सोने के गहनों की लिमिट 14 कैरेट तक सीमित कर दी थी।

इसका मतलब यह है कि आज अगर आप 22 कैरेट की चेन या अंगूठी पहनते हैं, तो उस दौर में यह संभव नहीं था। इतना ही नहीं, तब की नेहरू सरकार ‘गोल्ड बॉन्ड’ लेकर आई थी और साथ ही उसने सोने की ट्रेडिंग तक रुकवा दी थी। लोगों से अपील की गई थी कि उनके पास जो भी सोना है, उसे सरकार को सरेंडर कर दें ताकि संकट को रोका जा सके।

लेकिन इससे कोई खास फायदा नहीं हुआ और लोगों ने सोना खरीदना जारी रखा। जहाँ भी सोने की कमी हुई, वहां स्मगलिंग से आया सोना काम आता रहा। लेकिन सरकार और सोने का यह रिश्ता केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा। इससे भी कठोर कदम 1968 में उठाए गए थे।

1968 में इंदिरा गांधी की सरकार ‘गोल्ड कंट्रोल एक्ट’ लेकर आई, जिसने देश में सोने के सिक्के और ईंटें रखना ही अवैध बना दिया। यह निर्देश दिया गया कि सभी पुराने सिक्के और गोल्ड बार्स को ज्वेलरी में बदल दिया जाए। इसका लक्ष्य आयात बिल को घटाना था ताकि सोना इंपोर्ट न करना पड़े। सोने के बदले लोन लेने की प्रक्रिया को भी हतोत्साहित किया गया।

तब सुनारों के लिए भी 100 से 200 ग्राम से ज्यादा सोना रखने पर रोक लगा दी गई थी। सोना बाहर से मंगवाने और उसकी ट्रेडिंग करने को लेकर भी नियम काफी सख्त कर दिए गए थे। लेकिन इंदिरा गांधी सरकार के ये नियम उम्मीद से ठीक उल्टे साबित हुए। इस तरह के सख्त कदमों ने सोने का एक अवैध बाजार तैयार कर दिया, क्योंकि मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया था।

और जब मांग और आपूर्ति का तालमेल नहीं बैठता, तो ‘ब्लैक मार्केट’ जन्म लेता है। बस, इसी के साथ समुद्र हो या जमीनी सीमा, हर तरफ से सोने की स्मगलिंग होने लगी। हाजी मस्तान जैसे डॉन पैदा हो गए। इसीलिए जब हम 1970 और 1980 के दशक की फिल्में देखते हैं, तो उनमें विलेन अक्सर गोल्ड स्मगलर ही होते हैं, क्योंकि उस समय यही सबसे ‘लुक्रेटीव’ बिजनेस था। 1990 तक ये नियम कमोबेश ऐसे ही लागू रहे और सोने को लेकर अनिश्चितता बनी रही। हालाँकि, 1990 में जब देश में आर्थिक सुधार हुए, तब सोने के इंपोर्ट पर से पाबंदियां धीरे-धीरे कम कर दी गईं, हालांकि तब भी सोने पर कस्टम ड्यूटी लगती रही।

जब 2008 के आर्थिक संकट के बाद दुनिया भर में क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ गईं और भारत पर तेल आयात का बिल भारी पड़ने लगा, तब भी सोने को लेकर कड़े कदम उठाए गए थे, क्योंकि कच्चे तेल के साथ ही सोना भी वह वस्तु है जो बड़ा डॉलर बिल तैयार करती है। ऐसे में यूपीए सरकार भी सोने के इंपोर्ट को रोकने के जुगाड़ में थी।

यूपीए सरकार के दौरान, आज से लगभग 12 साल पहले भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई थी और तब के वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी लोगों से सोना न खरीदने की अपील कर रहे थे। गोल्ड इंपोर्ट रोकने के लिए सिर्फ अपील ही नहीं, बल्कि पॉलिसी में भी बदलाव लाए गए। यूपीए सरकार ने 2013 में सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी 6 प्रतिशत से बढ़ाकर पहले 8 प्रतिशत और फिर 10 प्रतिशत कर दी थी, ताकि सोना महंगा हो जाए और लोग खरीदारी कम कर दें।

जिस तरह इंदिरा सरकार का कदम ‘काउंटर-प्रोडक्टिव’ साबित हुआ था, उसी तरह यूपीए सरकार का यह कदम भी फायदे से ज्यादा नुकसान कर गया। सोने पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाने के तुरंत बाद इसकी तस्करी कई गुना बढ़ गई। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट कहती है कि इस ड्यूटी क्राइसिस के दो साल में ही सोने की तस्करी 900 प्रतिशत तक बढ़ गई। जहाँ 2012-13 में 350 किलोग्राम सोना जब्त हुआ था, वहीं 2014-15 में 3500 किलोग्राम स्मगल किया गया सोना पकड़ा गया।

मोदी सरकार के सत्ता में आने तक देश के विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति कहीं बेहतर हो चुकी थी। मोदी सरकार ने सोने की खरीदारी को लेकर सीधे नियम तो नहीं बनाए, लेकिन सोने में निवेश होने वाले पैसे को डाइवर्ट करने की कोशिश जरूर की। सरकार ने ‘गोल्ड बॉन्ड’ जारी करना शुरू किए ताकि लोग फिजिकल गोल्ड न लेकर ये बॉन्ड खरीदें और इंपोर्ट बिल कम हो सके। हालांकि, इस स्कीम को ब्याज के साथ निरंतर बनाए रखना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण हो गया और इसे अंततः बंद कर दिया गया।

हाल ही में, यानी अप्रैल 2026 में मोदी सरकार ने सोने की ज्वेलरी इंपोर्ट पर भी रोक लगा दी थी और इसके लिए डीजीएफटी (DGFT) का लाइसेंस अनिवार्य कर दिया था, लेकिन सोने का आयात तब भी नहीं रुका। सोना हमारे दिलों-दिमाग से इस कदर जुड़ा है कि लोग इसका मोह त्याग नहीं पाते। साल 2025-26 में ही हमारे देश के लोगों ने 72 बिलियन डॉलर का सोना बाहर से मंगवाया। क्या आप जानते हैं कि यह मात्रा में कितना था? इसका वॉल्यूम 721 टन था। गोल्ड इंपोर्ट के मामले में हमसे आगे सिर्फ चीन था।

दुनिया के बाकी देशों में सोने की खरीदारी वहां के बैंक करते हैं ताकि उनका विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ता रहे। हमारे देश में भी हमारा केंद्रीय बैंक यानी आरबीआई (RBI) सोना खरीदता है, लेकिन हमारे यहाँ सोने की प्राथमिक मांग खुदरा यानी गहनों के लिए ही है। इसीलिए जब आप कोच्ची एयरपोर्ट पर किसी के पेट से तो किसी के मुंह से सोना निकलते देखते हैं, तो हैरान मत होइए, क्योंकि मांग ही कुछ ऐसी है।

एसोचैम (ASSOCHAM) की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत के घरों में जितना सोना रखा है, वह दुनिया के टॉप 10 देशों के कंबाइंड गोल्ड रिजर्व से भी ज्यादा है। यह आंकड़ा लगभग 35000 टन है। बेसिकली, गोल्ड चाहे पहनने के लिए हो या निवेश के लिए, भारतीयों के दिमाग में प्राथमिक विकल्प के तौर पर रहा है। इसीलिए इसकी मांग को घटाना सरकारों के लिए लगभग असंभव रहा है। हालाँकि, पीएम मोदी की अपील का कई जगहों पर ज्वेलर्स तक ने समर्थन किया है। देखते हैं कि आने वाले समय में सोने की मांग घटती है या फिर मामला पहले जैसा ही रहता है और हमारा इंपोर्ट बिल उतना ही बना रहता है।

सोने के प्रति भारतीयों का प्रेम इतना है कि इसका इंपोर्ट बिल आज भारत के व्यापार घाटे को असंतुलित कर रहा है।

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