demography change

डेमोग्राफी में बदलाव रोकने को PM मोदी का स्पेशल मिशन | Demographic change in India

Summary
डेमोग्राफिक मिशन... मतलब पूरे देश में एक्शन। PM मोदी का यह मिशन घुसपैठिया संकट को खत्म करेगा, देश को खोखला करने वालों पर लगाम लगाएगा।

असम का एक जिला है, धुबरी। ये जिला ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा हुआ है, इस जिले की आबादी कुछ 25 लाख के आसपास तो होगी ही। धुबरी में पिछले 50 सालों में हिंदू नाम की प्रजाति विलुप्त हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि धुबरी में वर्तमान में 80% आबादी मुस्लिम है।

वजह है डेमोग्राफ़ी और उसमें हो रहा भयानक बदलाव। इसी डेमोग्राफी चेंज के बारे में इंडिपेंडेंस डे की स्पीच में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बोला था। जब देश के पीएम लाल किले से इस मुद्दे को उठाते हैं, तो जान जाइए कि मामला सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है।

इसके पीछे कुछ तो कारण होगा जो इसको इतना बड़ा मुद्दा बनाया जा रहा है!! पिछले 50 सालों में इसी डेमोग्राफी बदलाव के चलते अपने ही देश के कुछ हिस्सों में हिंदू सुपर माइनॉरिटी बन गए हैं। 

कहीं रविवार को होने वाली छुट्टी जुमे के दिन शिफ्ट हो गई है तो कहीं शोभा यात्राओं पर पत्थर बरसने लगे। कश्मीर की तरह पलायन और हमले के खतरे की घंटी बजने लगी है। 

लेकिन रेत में शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन दबाने वाले इस्लामी कट्टरपंथी और वामी लिबरल गैंग को ना ये नज़र आयेगा ना ही वो इसपर फैक्ट चेक करना चाहेंगे। ऐसी सिचुएशन में ना जाने क्यों वो ख़ुद ही धृतराष्ट्र बन जाते हैं। डेमोग्राफी बदलाव तो रवीश कुमार एंड गैंग को नज़र ही नहीं आ रहा है । 

इसको समझाने के लिए वीडियो में जो स्क्रीनशॉट लगाए गए हैं, वामपंथी इस्लामी लॉबी से जुड़े हुए हैं। 

हालांकि सच्चाई ये है कि कितना भी सोशल मीडिया वाला ज्ञान बहाया जाये, आंकड़े और जमीन की सच्चाई बदली नहीं जा सकती।

इन वामपंथी और लिबरलों को जगह जगह गाजर घास की तरह उगते मजार और दरगाह नहीं दिखते, ना ही इन्हें क्राइम्स होते हुए दिखते हैं, ना ही इन्हें हिंदुओं पर हमला होता हुआ नज़र भी आता है, और शायद कभी आएगा भी नहीं। 

लेकिन बात ये है कि ये सब हो रहा है और इससे इस देश की संस्कृति को खतरा है, यहां के लोगों को खतरा है और यहां तक कि लोकतंत्र को भी खतरा है…

खैर ये लॉबी कितना भी रेत में शुतुरमुर्ग जैसा गर्दन घुसा ले, इस खतरे को इग्नोर करने के लिए दुनिया भर की बातें करे, डेमोग्राफी चेंज के सबूत साफ हैं।

आजादी के बाद से ही भारत में डेमोग्राफी चेंज का सबसे बड़ा शिकार असम ही रहा है। बांग्लादेश से मिलता खुला बॉर्डर, 1971 का युद्ध और ISI, पाकिस्तान की साजिशों के चलते यहां के कई जिले या तो मुस्लिम बहुल हो चुके हैं, या उस राह पर अग्रसर हैं।

वीडियो में इससे भी जुड़ा स्क्रीनशॉट लगाया गया है,जिसमें कुछ डाटा है। ये 1951 में हुई जनगणना के आंकड़े हैं। ये बताते हैं कि असम में जब 1951 की जनगणना हुई थी तो राज्य में 74% हिंदू हुआ करते थे यानी तीन चौथाई आबादी।

2011 तक ये आंकड़ा घट कर 61% के आसपास आ गया, यानी दो तिहाई से भी कम। 

ये आंकड़े तो 2011 के हैं, 2025 तक आते आते स्थिति और बिगड़ चुकी है। 

असम में हुआ ये बदलाव जिले के हिसाब से देखा जाए तो और भी बड़ी समस्या सामने आती है।

जिस धुबरी की मैंने बात की, उसका ही उदाहरण ले लीजिए। ये डाटा कहता है कि असम के धुबरी जिले में 1971 में मुस्लिम आबादी 64% के आसपास हुआ करती थी। 

2011 आते आते यहां 80% से ऊपर आबादी मुस्लिम है। हिंदू अब 20% से भी कम हैं। यानी हिंदू अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो चुके हैं। 

और ये कोई नेचुरली होने वाली चीज नहीं है, इसके पीछे घुसपैठ का सबसे बड़ा रोल है। वही खतरा, जिससे प्रधानमंत्री मोदी आगाह कर रहे हैं। 

और सिर्फ धुबरी ही नहीं, असम के बाकी जिले भी कमोबेश यही झेल रहे हैं। 

बारपेटा, हैलाकांडी, नगांव, गोलपाड़ा… आप जिले का नाम लीजिए, सब कहीं यही तस्वीर दिखाई पड़ती है। असम के लगभग एक दर्जन जिले ऐसे हैं, जहां अब मुस्लिम आबादी 50% का आंकड़ा पार कर चुकी है। 

1971 के मुकाबले कहीं 15% मुस्लिम बढ़े हैं तो कहीं 10% और ये इस डेमोग्राफी बदलाव का जमीन पर असर भयावह है। पूरे असम के भीतर जमीनों पर कब्जा, बाल निकाह और मदरसों की बाढ़ आ चुकी है। 

घुसपैठ का यह जहर अब कैंसर बन चुका है। असम की हिमांता सरकार इसे खत्म करने में जुटी है। 

इस पर भी लिबरल कौम रो रही है, इस्लामी कट्टरपंथी सरकारी कर्मचारियों पर पत्थर बरसा रहे हैं। 

लेकिन दिक्कत सिर्फ़ असम में नहीं है, आप दिमाग में भारत के मैप को जूम आउट कीजिए। पूरे देश पर नजर डालें तो भी यही मामला है। 

प्रधानमंत्री की आर्थिक मामलों पर सलाहकार समिति की मेंबर शमिका रवि की एक रिपोर्ट बताती है कि 1950 से 2015 के बीच हिंदुओं की आबादी देश में 7.8% कम हो गई है। 

यही रिपोर्ट कहती है कि इन 65 वर्षों में देश में मुस्लिम आबादी 43% बढ़ गई। यानी 1950 में अगर किसी इलाके में 100 हिंदू रहते थे तो वो 2015 में आते आते 92 रह गए। 

दूसरी तरफ इसी इलाके में रहने वाले मुस्लिम 100 से 143 हो गए। ये सब तब हुआ जब 1947 में दो हिस्से सिर्फ इसी नाम पर देश से तोड़ दिए गए कि वहां मुस्लिम रहेंगे। 

ये आँकड़े तो बस एक रिपोर्ट के हैं, बाकी रिपोर्ट्स भी यही इशारा करती हैं कि देश का बहुसंख्यक हिन्दू दिन प्रतिदिन अपनी जमीन खो रहा है।

डेमोग्राफी का यह इन्वेजन मात्र असम और बंगाल जैसे सीमाई राज्यों में ही नहीं बल्कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भी हो चुका है।

वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से पहाड़ी जिलों को काट कर उत्तराखंड बनाया गया था। तब इस जिले में हरिद्वार के रूड़की-मंगलौर जैसे इलाके और देहरादून के एक दो क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी थी।  

2001 में उत्तराखंड में हुई जनगणना के आँकड़े बताते हैं कि तब पहाड़ी राज्य में 85% हिन्दू हुआ करते थे। 2011 आते-आते मुस्लिमों की आबादी 38.99% बढ़ गई। जबकि इसी दौरान हिन्दू सिर्फ 16% ही बढ़े। 

ये बदलाव सिर्फ नम्बर्स में नहीं हुआ। ये बदलाव अब हमें पुरोला, चमोली, धारचुला, नैनीताल और बनभूलपुरा में हो रहे क्राइम्स की शकल में दिखाई पड़ते हैं। 

कहीं कोई कट्टरपंथी किसी पहाड़ी बच्ची को अगवा कर ले जाता है, तो कहीं 70 साल का बूढ़ा मुस्लिम 15 साल की बच्ची का गाड़ी में रेप करता है। 

दिल्ली में बैठे लिबरल इसकी न्यूज लॉन्ड्री में जुट जाते हैं। इसे अफेयर करार देते हैं ।

हिमाचल प्रदेश में 2001 से 2011 के बीच जो डेमोग्राफी में बदलाव आया है, मुस्लिम जनसँख्या हिमांचल प्रदेश में 25% बढ़ी है। संजौली में मस्जिद पर बवाल और मंडी में अवैध कब्जा भी डेमोग्राफी की वजह से था। 

अब जब रिपोर्ट्स की ही बात चल रही है तो एक और रिपोर्ट है, उसका क्या कहना है वो भी सुन लीजिए। 

ये रिपोर्ट केरल से- CPS नाम का एक थिंक टैंक ये कहता है कि केरल में मुस्लिम आबादी के मुकाबले बच्चे पैदा करने में उनका शेयर अधिक है। 

रिपोर्ट ये कहती है कि केरल में मुस्लिम की आबादी 27% है लेकिन केरल में पैदा होने वाले 44% बच्चे मुस्लिम हैं।

हिन्दुओं के नवजात बच्चों का शेयर लगातार गिर रहा है… तो चाहे उत्तर हो या दक्षिण! डेमोग्राफी चेंज का यह नासूर फैलता जा रहा है …और डेमोग्राफी कैसे ना बदले! जब आपका ध्यान ही इस तरफ नहीं है!

एक और आँकड़ा सुनिए- देश में एक सर्वे होता है, केंद्र सरकार इस सर्वे को करवाती है।

इसका नाम है नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे यानी NFHS, अब तक ऐसे पाँच सर्वे हो चुके हैं… इस सर्वे में एक आँकड़ा दिया जाता है, इसे कहते हैं TFR यानी टोटल फर्टिलिटी रेट। टोटल फर्टिलिटी रेट किसी महिला से जन्म लेने वाले बच्चों का नम्बर होता है। पूरी कम्युनिटी में इसका एवरेज बताता है कि किस समाज की महिलाओं का TFR क्या है।

किसी भी समाज का TFR अगर 2.1 से नीचे है तो उसकी आबादी आने वाले टाइम में घटेगी और अगर इससे ऊपर है तो बढ़ेगी – 2.1 पर आबादी बराबर रहती है।

सबसे लेटेस्ट NFHS यानी NFHS-5 के आँकड़े बताते हैं कि वर्तमान में मुस्लिमों का TFR है 2.38 और हिन्दुओं का है 2.0

यानी हिन्दुओं में उतने बच्चे नहीं पैदा हो रहे जिससे उनकी आबादी बढ़े या फिर जितनी है उतनी ही बनी रहे, लेकिन मुस्लिम में ये 2.38 है, इसका मतलब है कि उनकी संख्या बढती रहेगी। 

और 1990 से लेकर अब तक सभी कम्युनिटीज में यह घटता दिखा है लेकिन मुस्लिम समुदाय ही देश में अकेला ऐसा समुदाय हैं, जिनमें आबादी अब भी बढ़ रही है।

यूं ही नहीं अब आपको कॉलेजों में हिजाब ज्यादा दिखाई पड़ता है या फिर सड़कों पर ‘शब ए बरात’ के दिन स्टंट मचाते हुड़दंगियों के हुजूम  दिखते हैं। समझिए भाईसाब!!!!!! Demography is destiny.

क्योंकि, क्योंकि, क्योंकि जब ये डेमोग्राफी बदल जाती है! तो जमीन पर बहुत बड़े बदलाव होते हैं।

साल 2022 में ऑपइंडिया ने उत्तर प्रदेश से लगने वाली नेपाल सीमा पर कवरेज किया था। 

उत्तर भारत में डेमोग्राफी चेंज का इससे मजबूत उदाहरण शायद ही किसी और इलाके में मिले… ग्राउंड रिपोर्ट कवरेज के लिए हमारी टीम जब श्रावस्ती पहुँचे, तो चारों तरफ मजार-दरगाह दिखीं, अगस्त के महीने में भी घरों पर भारत नहीं लेकिन इस्लामी हरे झंडे दिखे।  

बीते कुछ सालों में यहाँ हुआ डेमोग्राफी बदलाव साफ़ दिखता था- बौद्ध आस्था के केंद्र हों या फिर सरकारी तालाब, चारों तरफ मजार जरूर थीं।

श्रावस्ती से सटे जिले बलरामपुर में तो हनुमानगढ़ी की जमीन पर मुस्लिमों का कब्जा था, मंदिर में हड्डियाँ फेंकी जाती थीं… योगी सरकार ने इस पर एक्शन लिया तो ये अतिक्रमण कम हुआ।।

लेकिन बात तो डेमोग्राफी की है ना भाईसाब, वो कोई योगी आदित्यनाथ और हिमंता नहीं चेंज करने वाले। 

बलरामपुर में एक मौलाना ने हमें यहाँ आने वाली फंडिंग का हिसाब किताब भी एक्सप्लेन किया था। मौलाना ने बताया था कि यहाँ जिस मस्जिद में एक मीनार दिखाई पड़े तो समझ जाना कि यह इस्लामी देश से आए पैसे से बनी है। इस फंडिंग में कमीशन का खेल भी शामिल था। इसी इलाके में हमें UAE जैसे देशों से मिले पैसे से बनाया हुआ इन्फ्रा दिखा था।

और ये बदलाव सिर्फ दिखते नहीं है! इस डेमोग्राफी बदलाव के चलते यहाँ लव जिहाद-POCSO जैसे मामले बढे हैं ।

कहीं हिन्दू बच्चों को खतने की धमकी दी गई है तो कहीं हिन्दू लड़कियाँ निशाने पर हैं। और आपको छांगुर वाला केस तो याद है, उसमें भी यहीं हुआ है।

सीमा के उस पार तो स्वास्तिक वाले घर पर 786 प्रकट हो गया है… हिन्दू-बहुल गाँव अब इस्लामी इलाके में बदल चुका है।

खैर अगर आप सोचते हो कि ये डेमोग्राफी बदलाव और इसके साइड इफेक्ट्स सिर्फ नेपाल बॉर्डर तक सीमित हैं तो यू आर ग्रेवली मिस्टेकेन! 

आपको मैं झारखंड के संथाल परगना ले चलती हूँ!यहाँ एक जिला है जामताड़ा!! वही जामताड़ा, जिसकी नेटफ्लिक्स पर अपने सीरिज देखी ।2022 में दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट ने बताया था कि जामताड़ा में जिन सरकारी स्कूलों में 70% से ज्यादा बच्चे मुस्लिम हैं, वहाँ अब छुट्टी जुमे को होती है।

यहाँ सन्डे की छुट्टी का कांसेप्ट खत्म कर दिया गया है और क्यों ये हुआ है। क्योंकि आसपास की मुस्लिम आबादी इसके लिए दबाव डालती है। स्कूलों पर आगे हलके हाथ से उर्दू भी लिख दिया गया है! 

यानी जहाँ आबादी 50% के पार पहुँची वहाँ सारा सेक्यूलरिज्म किनारे हो गया और सरकारी स्कूल उर्दू स्कूल हो गया और छुट्टी नमाज पढ़ने के ACCORDING डिसाइड होने लगी।

झारखंड में ये प्रॉब्लम सिर्फ जामताड़ा में ही नहीं बल्कि 5 जिलों में मिली थी।

और मामला सिर्फ छुट्टी बदलने तक नहीं लिमिटेड है, मुस्लिम बहुल इलाकों में प्रार्थना तक इस्लामी हो गई थी।

कहानी का सबसे भयावह पार्ट अब मैं आपको बताती हूँ – डेमोग्राफी मजबूत कर चुके शांतिप्रिय समुदाय ने बाद में सरकार का इस पर एक्शन मानने से इनकार कर दिया। 

यानी अनाधिकारिक तौर पर इस्लामी राज स्थापित कर दिया गया। 

और ये सब जिस संथाल परगना में हो रहा है वो डेमोग्राफी चेंज से कितना ज्यादा बदला है, उसकी एक बानगी कुछ आँकड़े देते हैं:

यहाँ हाईकोर्ट तक बांग्लादेशी घुसपैठ और डेमोग्राफी चेंज पर सुनवाई कर रहा है। 

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान मोदी सरकार ने बताया था कि संथाल परगना में ST यानी जनजातीय आबादी 44% से घट कर 28% पर सिमट गई है।  

ये सब आजादी के बाद तेजी से हुआ है। 1951 के मुकाबले यहाँ हिन्दू 90% से 67% पर सिमट गए हैं और मुस्लिम तीन गुना बढ़ गए हैं। 

वैसे ये सब उदाहरण देख कर आप समझ गए होंगे कि डेमोग्राफी चेंज जमीन पर क्या लेकर आता है।

लेकिन इसमें एक ट्विस्ट भी है।

डेमोग्राफी चेंज का यह खतरा सिर्फ चादर ही नहीं बल्कि फादर वाले भी पैदा कर रहे हैं। 

जब ऑपइंडिया ईसाई धर्मांतरण को जानने छत्तीसगढ़ पहुँचा तो हमें पता चला था कि छत्तीसगढ़ में जिस जगह से सत्यमेव जयते की रचना की गई थी, अब वहाँ पर मसीही मेला लगता है, क्रॉस वाला एक मंच बना हुआ है।

सिर्फ इतना ही नहीं, छत्तीसगढ़ के जशपुर में हर कोना मिशनरी एक्टिविटी की गवाही देता है। 

चारों तरफ लगे क्रॉस बताते हैं कि मिशनरियों ने इस इलाके पर फतह पाने में सफलता पाई है। 

यहाँ एक जगह है साहेब कोना… यह ईसाई धर्मांतरण करने और करवाने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। यहाँ 1906 में 56 हिन्दुओ का ईसाई धर्मांतरण हुआ था। यहाँ जब हमारी टीम पहुँची तो हमें रिपोर्टिंग बंद करके भागना पड़ा था। क्यों? क्योंकि जो धर्म परिवर्तित होकर ईसाई बने थे, उन्हें हमारी रिपोर्टिंग से दिक्कत थी। मतलब हिन्दुओं की घटती सँख्या सिर्फ नम्बर्स में ही बदलाव नहीं लाती। बल्कि उस इलाके का रहन-सहन और संस्कृति सब में बदलाव ले आती है। अब ये डेमोग्राफी चेंज चाहे ईसा वाले करें या मूसा वाले…

आपको याद होगा कि मैंने बात शुरू की प्रधानमंत्री के भाषण से, जिसमें उन्होंने घुसपैठियों का जिक्र किया था।

तो डेमोग्राफी चेंज में घुसपैठिया सबसे बड़ा फैक्टर माने जाते हैं – लेकिन अब इस पर लगाम लगने वाली है। पहले ही मोदी सरकार  ऑपरेशन पुशबैक से हजारों बांग्लादेशी-रोहिंग्या को देश से बाहर फेंक चुकी है। 

घुसपैठी बांग्लादेशी गुड़गाँव जैसे शहरों से खुद ही गायब हो रहे हैं, हर राज्य में स्पेशल अभियान चलाया जा रहा है, चाहे राजस्थान हो या फिर उत्तर प्रदेश, सब कहीं से पकड़ पकड़ कर बांग्लादेशी वापस अपने मुल्क में लौटाए जा रहे हैं।

लेकिन इस समस्या का निदान इससे नहीं होगा, यह बात प्रधानमंत्री मोदी जानते हैं, इसीलिए उन्होंने लाल किले की प्राचीर से साफ़ किया कि वह अब इस पर एक्शन के लिए स्पेशल मिशन चलाने वाले हैं।

इसका नाम होगा डेमोग्राफिक मिशन… और इसका प्राइम टारगेट होगा डेमोग्राफी को बदलने से रोकना- डेमोग्राफी रोकने को लेकर काम असम जैसे राज्यों में पहले थोड़ा बहुत हुए हैं लेकिन अब तक पूरे देश में इस पर एक्शन नहीं हो पाया और एक के बाद एक देश के अलग अलग हिस्सों में हिंदू अल्पसंख्यक होने की तरफ बढ़ रहे हैं। 

प्रधानमंत्री का यह मिशन जहां एक तरफ घुसपैठिया संकट को खत्म करेगा तो वहीं दूसरी तरफ देश को अंदर से खोखला करने वालों पर लगाम लगाएगा। 

जल्द ही इस पर भी लिबरल और वामपंथी लॉबी का रोना भी सुनने में आने वाला है, ये इस पर भी चिल्लाने वाले हैं कि आखिर इस देश की संस्कृति क्यों बचाई जा रही है?

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