देश की राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने 6 जून को एक प्रदर्शन आयोजित किया। क्या इस प्रदर्शन ने अपने उद्देश्यों को हासिल कर लिया इसका जवाब अब तक CJP भी नहीं दे पाई है लेकिन प्रदर्शन स्थल पर जो कुछ भी घटा, उसने आंदोलन के उद्देश्यों पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) का प्रदर्शन सिर्फ भीड़ के लिहाज से ही फ्लॉप नहीं रहा, बल्कि वैचारिक धरातल पर भी यह पूरी तरह बेनकाब हो गया। आंदोलन किस दिशा में जा रहा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो प्रदर्शनकारी खुद को छात्रों का हितैषी बता रहे थे, वे पत्रकारों के बुनियादी सवालों पर ही उग्र हो गए।
ठोस नैरेटिव की कमी?
ऑपइंडिया के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने जब प्रदर्शनकारियों से उनके एजेंडे और मुख्य मांगों को लेकर सवाल पूछने शुरू किए तो ये बातें सामने आईं कि प्रदर्शन में शामिल कई लोगों को खुद इस बात की स्पष्टता नहीं थी कि वे वहां किस मुख्य उद्देश्य के लिए इकट्ठा हुए हैं।
बातचीत के दौरान नीट (NEET) परीक्षा में अनियमितता की समस्या से लेकर शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे आरोपियों के समर्थन तक के मुद्दे उठे।
जब ऑपइंडिया के रिपोर्टर अनुराग मिश्रा ने प्रदर्शनकारियों के बीच जाकर उनके मुख्य एजेंडे और मांगों को टटोलना शुरू किया, तो आंदोलन की असल नीयत पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। प्रदर्शन बुलावा तो नीट परीक्षा में अनियमितताओं के नाम पर दिया गया था, लेकिन ग्राउंड पर बातचीत के दौरान नैरेटिव पूरी तरह बदला हुआ नजर आया।
कठिन सवाल पर ‘कॉकरोच’ की बौखलाहट
इस पूरी ग्राउंड रिपोर्ट का सबसे विवादित हिस्सा वह था, जब प्रदर्शनकारियों ने बौखलाकर पत्रकार अनुराग मिश्रा पर ही जुबानी हमले शुरू कर दिए। जैसे ही रिपोर्टर ने तीखे सवाल दागने शुरू किए, प्रदर्शनकारियों ने मुद्दों का जवाब देने के बजाय उलटा मीडिया के उद्देश्य पर ही सवाल उठा दिए।
इस ग्राउंड रिपोर्ट का सबसे हाई-वोल्टेज ड्रामा तब शुरू हुआ जब रिपोर्टर ने प्रदर्शनकारियों को उनके विरोधाभासी बयानों पर घेरना शुरू किया। नीतिगत और तार्किक जवाब देने में नाकाम प्रदर्शनकारियों ने हर बार की तरह ‘विक्टिम कार्ड’ खेल दिया और सीधे मीडिया पर ही हमला बोल दिया।
वहां मौजूद कुछ लोगों ने पत्रकार पर निजी हमले भी शुरू कर दिए और जवाब देने के बजाय हिंसक हो गए। दूसरी ओर, पत्रकार अनुराग मिश्रा ने शांतिपूर्वक इन सभी हमलों का शांति से जवाब दिया और बताया कि प्रोटेस्ट के एजेंडे की कोई ख़बर ना होने के कारण बौखलाहट में मीडिया पर ही हमला कर रहे हैं।
रिपोर्टर ने दो टूक शब्दों में कहा कि जब आपके पास जनता और छात्रों के बुनियादी सवालों के जवाब नहीं होते, तो आप ‘फंडिंग’ और ‘गोदी मीडिया’ जैसे घिसे-पिटे जुमलों का सहारा लेकर असली मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं।
दिखावे की क्रांति?
वीडियो के अंत में पत्रकार ने इस पूरे प्रदर्शन को लेकर एक तीखा निष्कर्ष निकाला। उनके अनुसार, यह पूरी ‘क्रांति’ महज एक दिखावा साबित हुई, क्योंकि प्रदर्शनकारी किसी भी ठोस नैरेटिव या सार्थक निष्कर्ष पर पहुंचने में पूरी तरह विफल रहे।
यह ग्राउंड रिपोर्ट साफ तौर पर दिखाती है कि आज के दौर में आंदोलनों और मीडिया के बीच अविश्वास की खाई कितनी गहरी हो चुकी है, जहां विरोध के नाम पर हुए जुटान ने अपनी पूरी ताक़त ‘आंदोलन’ से जुड़े कठोर सवालों को दबाने में ही लगा दी।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद ग्राउंड रिपोर्टर ने एक बेहद कड़वा लेकिन सच्चा निष्कर्ष निकाला। जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, वह किसी छात्र सुधार या शिक्षा व्यवस्था को बदलने की ‘क्रांति’ नहीं, बल्कि महज एक दिखावा और पीआर स्टंट था।
यह प्रदर्शन इस बात का जीता-जागता सबूत है कि आज के दौर में कुछ आंदोलन सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया की हेडलाइंस बटोरने और अविश्वास की खाई को गहरा करने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। जब जमीन पर कोई ठोस नैरेटिव नहीं होता, तो तथाकथित ‘क्रांतिकारी’ सिर्फ चिल्लाकर और मीडिया को कोसकर अपनी नाकामी छुपाने का प्रयास करते हैं। CJP का यह प्रदर्शन अंततः एक सार्थक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाय पूरी तरह दिशाहीन हुड़दंग में तब्दील होकर खत्म हो गया।



