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माफिया राज से ‘मदर राज’ तक: कैसे एक दस्तखत ने UP के पुष्टाहार को फैक्ट्रियों से निकालकर गांव की चौपाल पर ला दिया?

Summary
जिस राज्य की आबादी दुनिया के कई बड़े देशों से ज्यादा हो, वहां हर महीने करोड़ों बच्चों तक राशन पहुंचाना कितना बड़ा लॉजिस्टिक्स चैलेंज है।

साल 2009, उत्तर प्रदेश की सियासत और बिजनेस कॉरिडोर में एक नाम सबसे तेजी से गूंज रहा था, पोंटी चड्ढा। शराब के कारोबार से लेकर रियल एस्टेट तक, उनका रसूख ऐसा था कि सरकारें कोई भी हों, फैसले उनकी मर्जी से होते थे। लेकिन इसी रसूख के बीच, एक ऐसा ठेका था जो सीधा उत्तर प्रदेश के करोड़ों गरीब बच्चों और गर्भवती माताओं के निवाले से जुड़ा था, ICDS यानी आंगनवाड़ी पुष्टाहार का ठेका।

कहने को यह बच्चों को कुपोषण से बचाने की योजना थी, लेकिन जमीनी हकीकत भयावह थी। फैक्ट्रियों में बना घटिया, सब-स्टैंडर्ड माल बोरियों में भरकर सेंटर्स तक पहुंचता था। बच्चे उसे खाने से कतराते थे, जानवर भी मुंह फेर लें ऐसी क्वालिटी। 

लेकिन सरकारी खजाने से हजारों करोड़ रुपये सीधे चंद बड़ी कंपनियों की जेब में जा रहे थे। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने उस दौरान गोरखपुर और पूर्वांचल के इलाकों में सप्लाई होने वाले माल की खराब गुणवत्ता को लेकर गंभीर टिप्पणियां की थीं। साल 2012 में एक सनसनीखेज गैंगवार में पोंटी चड्ढा की हत्या हो गई, लेकिन उनका बनाया हुआ वो ‘राशन सिंडिकेट’ मरा नहीं। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, मगर बच्चों के हक पर डाका डालने वाला वो नेटवर्क जस का तस चलता रहा।

फिर आता है साल 2017। सत्ता की कमान संभालते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक ऐसी फाइल पर दस्तखत किए, जिसने लखनऊ के वातानुकूलित कमरों में बैठे बड़े-बड़े ठेकेदारों की रातों की नींद उड़ा दी। सरकार का साफ निर्देश था, “अब उत्तर प्रदेश के बच्चों का पोषण कोई कॉर्पोरेट माफिया तय नहीं करेगा, बल्कि गांव की चौपाल पर बैठी हमारी माताएं और बहनें तय करेंगी।” और यहीं से जन्म होता है उत्तर प्रदेश के ‘टेक होम राशन’ यानी THR डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल का।

जरा सोचिए, जिस राज्य की आबादी दुनिया के कई बड़े देशों से ज्यादा हो, वहां हर महीने करोड़ों बच्चों तक राशन पहुंचाना कितना बड़ा लॉजिस्टिक्स चैलेंज है। पुरानी सरकारों का तर्क था कि यह काम सिर्फ बड़ी मशीनरी वाली प्राइवेट कंपनियां ही कर सकती हैं। लेकिन साल 2020-21 में यूपी सरकार ने इस ‘मोनोपॉली’ को हमेशा के लिए दफन कर दिया।

यहाँ पर योगी सरकार ने अपनाया डिसेंट्रलाइज्ड मॉडल। इसके तहत जिम्मेदारी सौंपी गई उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (UPSRLM) को। यानी, अब राशन किसी रिमोट शहर की बंद फैक्ट्री में नहीं बनेगा, बल्कि आपके अपने ब्लॉक में, आपके अपने गांव की महिलाएं उसे खुद तैयार करेंगी, पैक करेंगी और आंगनवाड़ी केंद्रों तक पहुंचाएंगी।

चलिए, इसके स्केल को आंकड़ों के चश्मे से देखते हैं। शुरुआती फेज में ही 68,000 से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों को इस मिशन से जोड़ा गया। अगर एक समूह में औसतन 10 से 12 महिलाएं हैं, तो इसका सीधा मतलब है कि 6.8 लाख से 8 लाख ग्रामीण बहनें रातों-रात सीधे रोजगार से जुड़ गईं।

शुरुआत 43 जिलों के 204 ब्लॉक्स से हुई और आज यह मॉडल उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में पूरी तरह लागू हो चुका है। नतीजा? हर महीने 1.6 करोड़ से ज्यादा लाभार्थी, जिनमें 6 महीने से 6 साल के बच्चे, गर्भवती महिलाएं और किशोरियां शामिल हैं, उन्हें फ्रेश और न्यूट्रिशियस खाना मिल रहा है।

इसके जरिए 16,000 से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों तक स्थानीय स्तर पर सीधी सप्लाई सुनिश्चित की जा रही है। यह सिर्फ एक सरकारी स्कीम नहीं थी। यह ग्रामीण उत्तर प्रदेश की महिलाओं का ‘आर्थिक सशक्तिकरण’ था। जो महिलाएं कभी घूंघट के पीछे सिर्फ घर के चूल्हे-चौके तक सीमित थीं, वे आज बड़ी-बड़ी मिक्सिंग और पैकेजिंग यूनिट्स की ऑपरेटर और मैनेजर बन चुकी थीं।

इस मॉडल की सबसे खूबसूरत बात है इसमें छुपा ‘लोकल तड़का’। पहले जो कंपनियों से राशन आता था, उसमें सिंथेटिक प्रिजर्वेटिव्स और एक जैसा बेस्वाद पाउडर होता था। लेकिन स्वयं सहायता समूहों ने इसमें स्थानीय संस्कृति और स्वाद को जोड़ा। प्रतापगढ़ की यूनिट्स में आंवले का इस्तेमाल हुआ, कहीं बुंदेलखंड का बाजरा और ज्वार शामिल हुआ, तो कहीं शुद्ध गुड़ और स्थानीय अनाजों से इस पुष्टाहार को तैयार किया गया।

इससे दो बड़े फायदे हुए-  पहला, बच्चों को वो स्वाद मिला जिससे वे परिचित थे, जिससे कुपोषण की दर में तेजी से गिरावट आई। और दूसरा, स्थानीय किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ा; उन्हें अपने ही ब्लॉक में एक परमानेंट खरीदार मिल गया।

लेकिन आपके मन में एक सवाल जरूर आ रहा होगा, “कंपनियां तो बड़ी थीं, उनके पास क्वालिटी चेक करने के लिए लैब्स थीं। क्या गांव की महिलाएं क्वालिटी मेंटेन कर पा रही हैं? कहीं इसमें कोई धांधली तो नहीं हो रही?”

इसका जवाब है, योगी सरकार का ‘कड़ा पहरा’। इस पूरे मॉडल में पारदर्शिता लाने के लिए बिचौलियों का पत्ता पूरी तरह काट दिया गया। कोई ठेकेदार नहीं, कोई एजेंट नहीं। फंड सीधा स्वयं सहायता समूहों के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर होता है। रही बात क्वालिटी की, तो देश की सबसे प्रतिष्ठित संस्था नैफेड (NAFED) को इसकी जिम्मेदारी दी गई है। हर एक बैच की सख्त लैब टेस्टिंग होती है। FSSAI के कड़े मानकों पर खरा उतरने के बाद ही उस पैकेट पर मुहर लगती है। जो पुरानी कंपनियां नियमों में कोताही बरत रही थीं, उन्हें ब्लैकलिस्ट कर दिया गया। यानी स्वाद गांव का, लेकिन स्टैंडर्ड इंटरनेशनल! खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महिला-केंद्रित मॉडल की तारीफ की और इसे देश के लिए एक मिसाल बताया।

मगर जैसा कि इतिहास गवाह है, जब भी आप किसी बरसों पुराने जमे-जमाए सिंडिकेट पर चोट करते हैं, जब आप किसी की हजारों करोड़ की मलाई बंद करते हैं, तो वो खामोश नहीं बैठता। ‘साम्राज्य’ पलटवार करता है।

पिछले कुछ महीनों से इस बेहतरीन मॉडल को डिरेल करने की एक सोची-समझी साजिश बैकग्राउंड में चल रही है। पोंटी चड्ढा के पुराने नेटवर्क के लोग और कुछ बड़े कॉर्पोरेट घराने, जो इस सरकारी पैसे पर कुंडली मारकर बैठे थे, वो दोबारा सिस्टम में घुसने के लिए छटपटा रहे हैं। टूलकिट बड़ा सिंपल है – भ्रम फैलाओ, बदनाम करो।

सोशल मीडिया पर नैरेटिव बनाया जा रहा है कि “महिलाएं यह काम नहीं कर पा रही हैं, इसे वापस प्राइवेट कंपनियों को दे देना चाहिए।” कुछ मीडिया हाउसेज को प्लांटेड लेटर्स भेजे जा रहे हैं, राजनेताओं और रसूखदारों के जरिए प्रेशर बनवाने की कोशिशें हो रही हैं। यहां तक कि गलियारों में यह भी चर्चा है कि इस पूरे मॉडल को फेल साबित करने के लिए करीब 100 करोड़ रुपये का एक बहुत बड़ा फंड एक्टिव किया गया है।

लेकिन इस बार पासा उलटा पड़ गया। जैसे ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक यह फीडबैक पहुंचा कि इस महिला सशक्तिकरण के मॉडल के खिलाफ लॉबिंग हो रही है, उन्होंने बिना वक्त गंवाए एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन कर दिया। उनका संदेश साफ़ है, जांच होगी, दूध का दूध और पानी का पानी होगा, लेकिन माफियाओं की वापसी के लिए दरवाजे हमेशा के लिए बंद रहेंगे।

चाहें तो हम अफवाह और सच्चाई का एक सीधा गणित देख सकते हैं –

पहली अफवाह यह फैलाई गई कि बिना भारी-भरकम मशीनों के बना राशन असुरक्षित है, जबकि सच्चाई यह है कि नैफेड और सरकारी लैब से हर बैच की कड़ाई से जांच होने के बाद ही यह राशन बाहर निकलता है। दूसरी अफवाह यह उड़ी कि ग्रामीण महिलाएं इतना बड़ा प्रोडक्शन नहीं संभाल सकतीं, जबकि हकीकत में हजारों स्वयं सहायता समूह आज पूरी लीडरशिप और टेक्निकल ट्रेनिंग के साथ सफलतापूर्वक इन यूनिट्स को ऑपरेट कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश का यह ‘टेक होम राशन’ मॉडल सिर्फ बच्चों के पेट भरने की योजना नहीं है। यह कहानी है उस बदलाव की, जहां सत्ता का विकेंद्रीकरण  सही मायनों में जमीन पर उतरा है। यह कहानी उन लाखों बहनों की है जिन्होंने साबित कर दिया कि अगर उन्हें सही अवसर और ट्रेनिंग मिले, तो वे किसी भी बड़े कॉर्पोरेट से बेहतर मैनेजमेंट संभाल सकती हैं।

साजिशें होती रहेंगी, अफवाहें उड़ती रहेंगी, लेकिन ग्रामीण उत्तर प्रदेश की जागृत हो चुकी जनता अब सब समझती है। इस व्यवस्था को और मजबूत करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि अगली बार जब आप अपने गांव या कस्बे से गुजरें, तो जरा रुककर वहां के आंगनवाड़ी केंद्र पर जाएं। उन स्वयं सहायता समूह की बहनों से मिलें, उस राशन की क्वालिटी को खुद देखें। क्योंकि जब देश की मातृशक्ति मजबूत होगी, तभी हमारा समाज सुपोषित होगा।

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