स्वर्ग का ‘आउटसाइडर’: त्रिशंकु का वो टिकट जो इंद्र ने भी कैंसिल कर दिया था

Summary
त्रिशंकु की कथा केवल उनकी महत्वाकांक्षा या शाप की कहानी नहीं है। यह उस पुण्य कर्म की भी कथा है, जब उन्होंने भीषण अकाल में ऋषि विश्वामित्र के परिवार को भूख से बचाया।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा सत्यव्रत वनवास का जीवन बिता रहे थे, उसी समय अयोध्या भीषण अकाल की चपेट में आ गई। कहा जाता है कि राजा अरुण के राज्य छोड़कर तपस्या के लिए वन चले जाने से देवराज इंद्र कुपित हो गए और बारह वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। परिणामस्वरूप पूरा राज्य सूख गया, खेत बंजर हो गए और लोगों के सामने भोजन का संकट खड़ा हो गया।

अकाल के दौरान सत्यव्रत ने वन में एक स्त्री को अपने पुत्र के गले में रस्सी बांधकर ले जाते देखा। पूछने पर उसने स्वयं को ऋषि विश्वामित्र की पत्नी बताया। उसने कहा कि आश्रम में भोजन का कोई साधन नहीं बचा है और बाकी बच्चों को बचाने के लिए वह अपने एक पुत्र को बेचने जा रही है। यह सुनकर सत्यव्रत का हृदय द्रवित हो उठा।

विश्वामित्र की पत्नी की पीड़ा सुनकर सत्यव्रत ने उसे पुत्र न बेचने की सलाह दी और भोजन की व्यवस्था का वचन दिया। मान्यताओं के अनुसार, वह प्रतिदिन विश्वामित्र के आश्रम के पास भोजन रख आते थे। इसी कारण अकाल के उस भीषण काल में भी विश्वामित्र का पूरा परिवार जीवित रह सका। यही वह पुण्य कर्म था जिसने आगे चलकर सत्यव्रत के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

तपस्या से लौटे विश्वामित्र घटना सुनकर हुए भावुक

जब ऋषि विश्वामित्र अपनी तपस्या पूरी कर आश्रम लौटे तो उन्हें आशंका थी कि उनका परिवार अकाल का शिकार हो चुका होगा, लेकिन आश्रम पहुंचने पर उन्होंने सबको सुरक्षित पाया। पत्नी ने उन्हें बताया कि इक्ष्वाकु वंश के राजा सत्यव्रत ने कठिन समय में उनके परिवार की रक्षा की थी। तब तक सत्यव्रत, ऋषि वशिष्ठ के शाप से त्रिशंकु बन चुके थे और चांडाल रूप में वन में जीवन व्यतीत कर रहे थे।

विश्वामित्र ने त्रिशंकु से मिलकर उनकी स्थिति जानी और उनके उपकार को स्मरण करते हुए उन्हें सशरीर स्वर्ग पहुंचाने का वचन दिया। जब अन्य ऋषि और ब्राह्मण इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए तैयार नहीं हुए, तब विश्वामित्र ने अपने तपोबल और पुण्य के प्रभाव से त्रिशंकु को स्वर्ग भेजने का प्रयास किया।

इंद्र ने रोका, फिर भी पूरा हुआ त्रिशंकु का स्वप्न

स्वर्ग पहुंचने पर देवताओं ने चांडाल रूपधारी त्रिशंकु को स्वीकार नहीं किया और इंद्र ने उन्हें वापस लौटा दिया। त्रिशंकु पृथ्वी की ओर गिरने लगे तो उन्होंने विश्वामित्र को पुकारा। तब विश्वामित्र ने उन्हें आकाश में ही रोक दिया और नया स्वर्ग रचने का संकल्प ले लिया। अंततः इंद्र और विश्वामित्र के बीच संवाद हुआ तथा त्रिशंकु को दिव्य स्वरूप देकर स्वर्ग में स्थान प्रदान किया गया। इस प्रकार त्रिशंकु का सशरीर स्वर्ग जाने का स्वप्न पूर्ण हुआ।

बताा दें कि त्रिशंकु की कथा केवल उनकी महत्वाकांक्षा या शाप की कहानी नहीं है। यह उस पुण्य कर्म की भी कथा है, जब उन्होंने भीषण अकाल में ऋषि विश्वामित्र के परिवार को भूख से बचाया। पौराणिक ग्रंथों में वर्णित इसी उपकार को वह कारण माना गया है जिसके चलते विश्वामित्र ने उनके लिए अपना तपोबल तक अर्पित कर दिया और अंततः त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग प्राप्त हुआ।

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