kheer-bhawani-mela-kashmiri-pandits-kashmiriyat-truth

खीर भवानी मेला: क्या यह वाकई ‘कश्मीरियत’ का प्रतीक है या सिर्फ एक छलावा?

Summary
क्या कश्मीरी पंडितों की खीर भवानी यात्रा वाकई 'कश्मीरियत' का प्रतीक है? मीडिया के नैरेटिव और नब्बे के दशक के कड़वे सच पर एक तीखा संपादकीय विश्लेषण।

जम्मू-कश्मीर के गांदरबल जिले के तुलमुल्ला गाँव में माता खीर भवानी मेले की शुरुआत हो चुकी है। देश भर से कश्मीरी पंडित माता खीर भवानी की पूजा के लिए कश्मीर पहुँच रहे हैं। लेकिन कहानी बस इतनी सी नहीं है, उनके इस चार दिन के ‘Tourism’ को ‘कश्मीरियत’ का उदाहरण और ‘Communal Harmony’ का प्रतीक बताया जा रहा है। मीडिया का एक वर्ग हिंदुओं के इस त्योहार को ‘Isolate’ करते हुए इसे ‘Secularism’ और ‘कश्मीरियत’ का उत्सव करार देने पर तुला है।

परंतु, सच क्या है? क्यों ये कश्मीरी पंडित दिल्ली, पंजाब या हिमाचल से कश्मीर वापस जाकर इस पूजा को करने के लिए मजबूर हैं? इस सवाल को इस कदर किनारे लगा दिया गया है, जैसे इन कश्मीरी पंडितों को नब्बे के दशक में उन्हीं की ज़मीन से ‘Secular Muslims’ ने ‘रालिब-ग़ालिब-चालिब’ कहकर घाटी से खदेड़ दिया था। इनका कत्ल किया गया, इनकी बहू-बेटियों की अस्मत लूटी गई और इन्हें अपने घरों को छोड़कर हमेशा के लिए पलायन करने पर मजबूर किया गया।

खीर भवानी के मेले में आने वाले कश्मीरी पंडित ‘कश्मीरियत’ का प्रतीक नहीं हैं। ‘Photo Ops’ के लिए जो लोग इनका स्वागत कर रहे हैं, याद रखा जाना चाहिए कि यही इनके कातिल भी थे। हेडलाइन में यह लिखना कि ‘Kheer Bhawani Mela Rekindles Spirit of Kashmiriyat as Pandits Return to Tulmulla’ भले ही आनंद दे सकता है, लेकिन सच यह है कि हर बार जब देश के किसी हिस्से से कोई कश्मीरी पंडित कश्मीर जाता है, तो उसके दिल पर तलवार चलती है। उन वादियों में उसे ‘Halamav, Halmav, Gulab’ नहीं सुनाई देता, उसे आज भी ‘अल्लाह-हू-अकबर’ के नारों के बीच वही ‘रालिब-ग़ालिब-चालिब’ का शोर सुनाई देता है।

कितना दुमुंहापन लगता है यह लिखना कि ‘Kashmiri Pandits visit Kheer Bhawani temple for mela, welcomed by residents’। अगर मुसलमान ही ‘Residents’ हो गए, तो ये कश्मीरी पंडित कौन हैं? क्या ये ‘Residents’ नहीं थे? क्या ये कोई ‘Alien’ हैं? इनके नाम में और इनकी पहचान में जो ‘कश्मीर’ जुड़ा है, क्या वह किसी अंग्रेज़ ‘Lord’ द्वारा दिया गया टाइटल है?

खीर भवानी के मेले में कश्मीर लौट रहा हर कश्मीरी पंडित इस पूरे देश और मानव सभ्यता को इतिहास के सबसे क्रूर और निर्मम अध्याय की याद दिलाता है। इसे ‘कश्मीरियत’ और ‘Secularism’ की चाशनी में लपेटने की कोशिश ‘Intellectual Dishonesty’ और निहायत बेशर्मी से अधिक कुछ भी नहीं है। हमें इस पैटर्न को ध्यान में रखना चाहिए कि यह कातिल को रहनुमा बताने की एक पुरानी ‘Age-old Tactic’ है।

चाहे वह दिल्ली दंगों का समय रहा हो, या बेंगलुरु के पुलकेशी में हिंदुओं पर हमलों के दौरान की वह तस्वीर, जिसमें हिंदुओं के खिलाफ हिंसा मुसलमान कर रहे थे, लेकिन अचानक उसके ऊपर यह नैरेटिव तैर गया कि ‘मंदिर बचाने के लिए मुसलमानों ने बनाई Human Chain’। दरअसल, यह उनके गुनाह पर पर्दा डालने की एक तकनीक है और हिंदुओं को इसे पहचानना चाहिए।

Editorial team:
Production team:

More videos with Ritika Chandola as Anchor/Reporter