वो शख्स जिसकी हत्या ने बलूचिस्तान के आंदोलन की दिशा ही बदल दी। एक ऐसी हत्या, जिसके बाद बलूचिस्तान में विरोध की आग पहले से कहीं ज्यादा तेज हो गई। और अब एक महिला चेहरा जो उस बदले हुए आंदोलन की सबसे बड़ी आवाज बनकर उभरी। लेकिन आज उसकी अपनी आजादी और जिंदगी दोनों खतरे में हैं।
पहले हैं नवाब अकबर खान बुगती। बलूचिस्तान के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व राज्यपाल और कभी पाकिस्तान की सत्ता का हिस्सा रहे एक ऐसे नेता, जिनकी हत्या ने पूरे बलूच आंदोलन को नया मोड़ दे दिया।
और दूसरा चेहरा हैं डॉ. महरंग बलूच। एक डॉक्टर, एक मानवाधिकार कार्यकर्ता और आज लाखों बलूच युवाओं और महिलाओं की आवाज जिन्हें पाकिस्तान की एक अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई है।
तो सबसे पहले बात महरंग बलूच की। पाकिस्तान सरकार का आरोप है कि उन्होंने कानून-व्यवस्था को चुनौती दी, जबकि असल में उन्हें इस बात की सजा दी जा रही है कि उन्होंने बलूचिस्तान में हो रहे अत्याचारों और जबरन गुमशुदगियों के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने पाकिस्तान आर्मी और सरकार दोनों की नाक में दम करके रखा हुआ था।
लेकिन सवाल ये है कि क्यों पाकिस्तान की सेना और सरकार बलूचिस्तान में उठने वाली हर नई आवाज से डरती दिखाई देती है? इसका जवाब ढूंढने के लिए हमें थोड़ा सा पीछे जाना होगा और सबसे पहले बलूचिस्तान को समझना होगा।
बलूचिस्तान आखिर है क्या?
पाकिस्तान के इस नक्शे पर आप नजर डालिए। सबसे बड़ा प्रांत है बलूचिस्तान। क्षेत्रफल के हिसाब से देखें तो पाकिस्तान की लगभग 44 प्रतिशत जमीन इसी राज्य के पास है लेकिन आबादी पूरे देश की तुलना में बहुत कम है।
ये इलाका प्राकृतिक संसाधनों से भरा पड़ा है। यहां विशाल गैस भंडार हैं। तांबा है, सोना है और दुनिया की सबसे चर्चित खनन परियोजनाओं में से एक रेको डिक भी यहीं मौजूद है। यहीं ग्वादर बंदरगाह है, जो चीन के लिए अरब सागर तक पहुंच का महत्वपूर्ण रास्ता माना जाता है। यहीं से चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC गुजरता है, जिस पर अरबों डॉलर खर्च किए गए हैं। यानी अगर पाकिस्तान की इकॉनमी और चीन की क्षेत्रीय रणनीति को समझना है, तो बलूचिस्तान को समझना जरूरी है।
लेकिन इतने संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद यह इलाका दशकों से अशांत क्यों है?
1947 में भारत का विभाजन हुआ। भारत और पाकिस्तान दो नए देशों के रूप में दुनिया के सामने आए लेकिन आज का बलूचिस्तान पूरी तरह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं था। यहां कलात नाम की रियासत मौजूद थी।
कलात के शासक स्वतंत्र रहना चाहते थे और उन्होंने कुछ समय तक खुद को एक अलग राज्य के रूप में बनाए रखने की कोशिश भी की। लेकिन मार्च 1948 में पाकिस्तान ने कलात का विलय कई तरह के हथकंडे अपनाकर अपने साथ कर लिया।
यहीं से बलूच राष्ट्रवाद और असंतोष की शुरुआत हुई। इसके बाद अलग-अलग समय पर कई विद्रोह हुए। कई बार सैन्य अभियान चले। लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई।
वो आदमी जिसकी हत्या ने आज का बलूचिस्तान बदल दिया
बलूचिस्तान के इतिहास में कई नेता आए और गए। लेकिन अगर पूछा जाए कि आज के बलूच आंदोलन को सबसे बड़ा मोड़ किसने दिया, तो जवाब होगा, नवाब अकबर खान बुगती।
दिलचस्प बात यह है कि बुगती कोई कट्टर अलगाववादी नेता नहीं थे। वे पाकिस्तान की सत्ता का हिस्सा रह चुके थे। वे पाकिस्तान के रक्षा राज्य मंत्री बने। बलूचिस्तान के मुख्यमंत्री बने। राज्यपाल भी बने।
यानी उन्होंने पाकिस्तान की व्यवस्था के भीतर रहकर राजनीति की थी। लेकिन पाकिस्तान सरकार का बलूचिस्तान के प्रति रवैये और लूट-खसोट के कारण उनका मोहभंग होने लगा।
उनका मानना था कि बलूचिस्तान पाकिस्तान को गैस दे रहा है, खनिज दे रहा है, जमीन दे रहा है, लेकिन बदले में उसे गरीबी, बेरोजगारी, बलूचों पर जुल्म और केवल सैन्य चौकियां मिल रही हैं। यानी हर तरफ पाकिस्तान आर्मी डेरा डाले हुए है।
बुगती का कहना था कि अगर बलूचिस्तान के संसाधन बलूचिस्तान की धरती से निकलते हैं, तो उनका पहला अधिकार भी बलूच लोगों का होना चाहिए।
यहीं से उनकी टक्कर इस्लामाबाद से शुरू हुई। लेकिन हालात को सबसे ज्यादा बिगाड़ने वाली घटना 2005 में हुई। जनवरी 2005 में सुई गैस क्षेत्र में काम करने वाली एक महिला डॉक्टर, डॉ. शाजिया खालिद ने आरोप लगाया कि उनके साथ बलात्कार हुआ है और ये बलात्कार किया था पाकिस्तान आर्मी के एक मेजर ने।
ये मामला पूरे बलूचिस्तान में गुस्से का कारण बन गया। अकबर बुगती खुलकर डॉ. शाजिया खालिद के समर्थन में आ गए।
उन्होंने मांग की कि दोषी को सजा दी जाए। लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने इस मुद्दे को अलग तरीके से ही पेश किया। इसके बाद इस्लामाबाद और बुगती के बीच तनाव तेजी से बढ़ने लगा।
2005 और 2006 तक बलूचिस्तान में लगातार झड़पें होने लगीं। पाकिस्तान सेना और बुगती समर्थकों के बीच संघर्ष बढ़ गया। मुशर्रफ सरकार ने बुगती को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताना शुरू कर दिया।
दूसरी तरफ बलूच युवाओं की नजर में बुगती एक ऐसे नेता बन चुके थे जो पहली बार खुलकर इस्लामाबाद को चुनौती दे रहा था। फिर आया 26 अगस्त 2006। पाकिस्तान सेना ने कोहलू जिले के पहाड़ी इलाके में बड़ा सैन्य अभियान चलाया।
जिस गुफा में अकबर बुगती मौजूद थे, उस पर गोला-बारूद बरसाए गए। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक तो हेलीकॉप्टर और भारी हथियारों का इस्तेमाल किया गया और इसी ऑपरेशन में अकबर बुगती मारे गए।
जब उनकी मौत की खबर फैली तो पूरा बलूचिस्तान सड़कों पर उतर आया। दुकानें बंद हो गईं। प्रदर्शन शुरू हो गए। कई जगह हिंसक झड़पें हुईं। इस सब से पाकिस्तान की सरकार इतनी ज्यादा घबरा गई कि पाकिस्तानी प्रशासन ने उनके क्षत-विक्षत शव को जिस ताबूत में बंद किया था उस ताबूत पर दो ताले जड़ दिए। ताबूत में ताला लगाने और उसे चुपचाप दफनाने की यह घटना इसलिए हुई थी क्योंकि सरकार को डर था कि शव को सार्वजनिक करने या परिवार को सौंपने से बलूचिस्तान में व्यापक हिंसा और उग्र प्रदर्शन भड़क सकते हैं। अंत में हुआ ये कि कड़े सुरक्षा पहरे में नवाब अकबर बुगती के परिवार की गैर-मौजूदगी में उस ताला लगे ताबूत को दफना दिया गया था
उस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ थे और शायद ये संदेश देने की कोशिश की कि ये केवल सैन्य कार्रवाई नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश था। संदेश ये कि जो भी इस्लामाबाद को चुनौती देगा, उसका अंजाम यही होगा।
बाद में अकबर बुगती की मौत को लेकर मुकदमे चले। परवेज मुशर्रफ समेत कई अधिकारियों के नाम सामने आए। लेकिन वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बावजूद किसी को सजा नहीं हुई।
यहीं से बलूच आंदोलन ने नया रूप लेना शुरू किया। पहले आंदोलन की कमान मुख्य रूप से कबायली सरदारों के हाथ में थी। लेकिन बुगती की मौत के बाद पढ़े-लिखे युवाओं, छात्रों और नई पीढ़ी ने इसे अपने हाथ में लेना शुरू किया। बहुत से युवाओं ने ये सोचना शुरू कर दिया कि अगर पाकिस्तान का पूर्व मुख्यमंत्री और पूर्व राज्यपाल भी अपनी बात नहीं मनवा सका, तो साधारण लोगों की आवाज कैसे सुनी जाएगी?
यहीं से धीरे-धीरे बलूच आंदोलन की नई इबारत लिखी गई। कई विश्लेषक मानते हैं कि आधुनिक बलूच आंदोलन को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है।
अकबर बुगती से पहले और अकबर बुगती के बाद। क्योंकि उनकी मौत ने एक पूरे आंदोलन को नया चेहरा, नई ऊर्जा और नई दिशा दे दी।
चीन, CPEC और नया संघर्ष
इसी दौरान चीन और पाकिस्तान ने CPEC परियोजना शुरू की। अरबों डॉलर का निवेश हुआ। ग्वादर बंदरगाह विकसित हुआ। नई सड़कें बनीं। नई परियोजनाएं शुरू हुईं। लेकिन यहीं से एक नया विवाद भी शुरू हो गया।
बलूच नेताओं का आरोप है कि उनकी जमीन से निकलने वाले संसाधनों का फायदा इस्लामाबाद और बीजिंग उठा रहे हैं, जबकि स्थानीय लोगों को बेहद कम हिस्सा मिलता है।
इसी वजह से चीनी इंजीनियरों, CPEC परियोजनाओं और ग्वादर क्षेत्र पर कई बार हमले हुए। आज चीन भी बलूचिस्तान की अस्थिरता को अपनी बड़ी सुरक्षा चिंता मानता है।
अगर अकबर बुगती बीते दौर के प्रतीक थे, तो आज उसी संघर्ष का सबसे बड़ा चेहरा हैं डॉ. महरंग बलूच। महरंग पेशे से डॉक्टर हैं।
लेकिन उनकी जिंदगी तब बदल गई जब उनके पिता अब्दुल गफ्फार बलूच को पाकिस्तान की आर्मी ने अगवा कर लिया था और कुछ महीने बीतने के बाद फिर उनका शव ही मिला। इसके बाद उनके भाई को भी हिरासत में लिया गया।
इन घटनाओं ने महरंग को आंदोलन की राह पर ला दिया। आज वे बलूच यकजेती कमेटी यानी BYC का नेतृत्व करती हैं। उनकी एक अपील पर हजारों लोग सड़कों पर उतर आते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि उन्होंने बड़ी संख्या में बलूच महिलाओं और युवाओं को इस आंदोलन से जोड़ा है।
आज महरंग बलूच पाकिस्तान के लिए उतनी ही बड़ी चुनौती मानी जाती हैं जितने हथियारबंद विद्रोही संगठन।
आज पाकिस्तान के सामने बलूचिस्तान में तीन बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं। पहली चुनौती है BLA और दूसरे हथियारबंद संगठन।
दूसरी चुनौती है जनता का घटता भरोसा और तीसरी चुनौती है महरंग बलूच जैसे नेताओं के नेतृत्व में उभरता जन आंदोलन। यही वजह है कि आज का बलूचिस्तान संकट पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल और गंभीर हो चुका है।
करीब आठ दशक बीत चुके हैं, सरकारें बदलीं, सैन्य अभियान चले, नेता आए और चले गए लेकिन बलूचिस्तान पर ज्यादती का सवाल आज भी वहीं खड़ा है और शायद यही वजह है कि महरंग बलूच को सुनाई गई उम्रकैद सिर्फ एक अदालत का फैसला नहीं है। ये उस लंबे संघर्ष का नया अध्याय है जो 1948 में शुरू हुआ था और आज भी खत्म नहीं हुआ।





