पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ चल रही कार्रवाई को लेकर प्रकाशित The Wire की एक रिपोर्ट पर विवाद खड़ा हो गया है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत-बांग्लादेश सीमा के हकीमपुर इलाके में कई परिवार ‘पुश-बैक’ अभियान के डर से इकट्ठा हो रहे हैं और अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहे हैं।
द वायर की इस रिपोर्ट में अवैध घुसपैठ के कानूनी पहलू की बजाय भावनात्मक कहानियों को अधिक महत्व दिया गया है। रिपोर्ट में बार-बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो अवैध रूप से भारत में रह रहे लोगों की वास्तविक कानूनी स्थिति को धुंधला करता है।
‘इलीगल इमिग्रेंट’ की जगह सिर्फ ‘माइग्रेंट’ शब्द पर सवाल
द वायर की रिपोर्ट में घुपैठियों के लिए “Illegal Immigrant” या “Illegal Infiltrator” जैसे शब्दों के बजाय केवल “Migrant” और “Immigrant” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। ऑपइंडिया का कहना है कि यदि संबंधित लोग वैध दस्तावेजों के बिना भारत में रह रहे हैं, तो उनकी कानूनी स्थिति को स्पष्ट रूप से लिखना पत्रकारिता की जिम्मेदारी है।
द वायर की रिपोर्ट में कई स्थानों पर ऐसे लोगों की व्यक्तिगत परेशानियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि वे भारत में किस आधार पर रह रहे थे और उनके पास वैध नागरिकता या निवास संबंधी दस्तावेज थे या नहीं। इन व्यक्तिगत कहानियों के माध्यम से पाठकों में सहानुभूति पैदा करने की कोशिश की गई, जबकि मूल प्रश्न यह है कि यदि कोई व्यक्ति अवैध रूप से किसी दूसरे देश में प्रवेश करता है, तो उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई होना स्वाभाविक प्रक्रिया है।
सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित की बहस
पत्रकार अनुराग मिश्रा के मुताबिक संप्रभु देश को अपनी सीमाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और अवैध घुसपैठ पर कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। उनके अनुसार भारत-बांग्लादेश सीमा पर वर्षों से अवैध घुसपैठ, फर्जी दस्तावेजों, तस्करी और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को लेकर बहस होती रही है। ऐसे में यदि राज्य सरकार या सुरक्षा एजेंसियां अवैध रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई करती हैं, तो उसे केवल मानवीय संकट के रूप में प्रस्तुत करना एकतरफा दृष्टिकोण माना जा सकता है।
ऐसे में पत्रकारिता का दायित्व तथ्यों को संतुलित तरीके से प्रस्तुत करना है। यदि किसी रिपोर्ट में केवल एक पक्ष की पीड़ा दिखाई जाए और कानूनी या प्रशासनिक पक्ष को अपेक्षित महत्व न मिले, तो इससे पाठकों के बीच अधूरी तस्वीर बन सकती है।
फिलहाल यह मुद्दा केवल अवैध घुसपैठ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि सीमा सुरक्षा, नागरिकता, मानवाधिकार और मीडिया नैरेटिव जैसे बड़े विषयों से जुड़ चुका है। ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष तथ्यों, आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही तय होंगे, न कि केवल भावनात्मक दावों के आधार पर।
आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अवैध घुसपैठियों को देश से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए पुस बैक अभियान चलाने की बात कही थी, जिसके बाद से बांग्लादेश की सीमा पर अवैध घुसपैठियों की भीड़ जमा है और उन्हीं घुसपैठियों को द वायर की रिपोर्ट में पीड़ित बताया जा रहा है।



