दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश इंडोनेशिया में आज हिंदू मंदिरों का पुनर्जागरण हो रहा है। भारत का एक खास वामपंथी इकोसिस्टम और ‘द कारवां’ जैसे संस्थान अक्सर एक नैरेटिव गढ़ने में दिन-रात एक कर देते हैं। उनका दावा होता है कि भारत में आज पॉलिटिक्स केवल ‘मंदिरों’ तक सिमट कर रह गई है। वे यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि अपनी कल्चरल रूट्स की ओर लौटना एक पिछड़ी हुई सोच है।
लेकिन, जब भारत के अंदर बैठे स्वघोषित बुद्धिजीवी अपनी इसी खोखली बहस में उलझे होते हैं, तब दुनिया के नक्शे पर एक बिल्कुल अलग और ऐतिहासिक कहानी लिखी जा रही होती है। आज मैं आपको उस ‘कल्चरल डिप्लोमेसी’ की कहानी सुनाने जा रही हूँ, जो भारत की सरहदों को पार कर चुकी है। यह कहानी है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया भर में हो रहे हिंदू मंदिरों के पुनर्जागरण की। और इस कहानी का सबसे नया और सबसे हैरान करने वाला अध्याय लिखा जा रहा है दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश- इंडोनेशिया में।
इस देश की सबसे बड़ी खूबी इसका मजहब नहीं, बल्कि इसकी वह सोच है जो अपने इतिहास को नकारती नहीं, बल्कि उसे गले लगाती है।
8 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी इंडोनेशिया यात्रा के दौरान योग्याकार्ता स्थित ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर पहुँचे। उनके साथ इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भी मौजूद थे। दोनों टॉप लीडर्स ने मिलकर लगभग एक हजार साल पुराने इस मंदिर के कंजर्वेशन (Conservation) और रेस्टोरेशन (Restoration) प्रोजेक्ट का उद्घाटन किया।
प्रम्बानन केवल एक मंदिर नहीं है; यह साउथ-ईस्ट एशिया में कंबोडिया के अंगकोर वाट के बाद दूसरी सबसे बड़ी हिंदू विरासत है। 9वीं शताब्दी में हिंदू-बौद्ध मातरम साम्राज्य द्वारा बनवाया गया यह परिसर कभी 240 मंदिरों से सजा होता था। आज भी इसके केंद्र में भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा के भव्य मंदिर सीना ताने खड़े हैं। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई रामायण की कहानियां आज भी उस दौर की गवाही देती हैं जब सनातन की जड़ें पूरे एशिया में फैली थीं। प्रधानमंत्री मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति से 2029 तक इस रेस्टोरेशन को पूरा करने का वादा लिया है।
यह सब अचानक नहीं हुआ। फरवरी 2022 में इंडोनेशिया सरकार ने एक बहुत बड़ा और साहसिक फैसला लिया था। उन्होंने ऐलान किया कि प्रम्बानन और बोरोबुदुर जैसे पुराने हिंदू और बौद्ध मंदिर अब केवल टूरिज्म या रिसर्च सेंटर नहीं रहेंगे, अब इन्हें अंतरराष्ट्रीय पूजा स्थलों के रूप में मान्यता दी जाएगी। जहाँ एक तरफ दुनिया के कई हिस्सों में रिलिजियस इनटोलरेंस (Religious Intolerance) चरम पर है, वहीं एक मुस्लिम बहुल देश ने अपनी हिंदू और बौद्ध सांस्कृतिक विरासत को अपनी साझी पहचान माना है।
इंडोनेशिया का यह प्रम्बानन मंदिर तो इस ग्लोबल रेस्टोरेशन की केवल एक झलक है। हकीकत यह है कि भारत सरकार ने विदेशी धरती पर बिखरी पड़ी हिंदू विरासतों को सहेजने के लिए एक साइलेंट, लेकिन बेहद शक्तिशाली अभियान छेड़ रखा है। यह प्रयास उन तमाम आलोचकों के मुंह पर तमाचा है जो मानते हैं कि वर्तमान सरकार की दृष्टि केवल घरेलू राजनीति तक सीमित है।
चलिए, आपको वियतनाम के जंगलों में ले चलते हैं। वियतनाम के क्वांग प्रांत में स्थित है ‘माई सन सैंक्चुअरी’ (My Son Sanctuary)। यह जगह कभी चम्पा साम्राज्य का सबसे इंपॉर्टेंट रिलिजियस सेंटर हुआ करती थी, जो पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित थी। वियतनाम वॉर के दौरान अमेरिकी बमबारी ने इस ऐतिहासिक शिव मंदिर प्रिसिंक्ट को भारी नुकसान पहुंचाया था। लेकिन आज भारत सरकार और एएसआई (ASI) अपने इक्विपमेंट और टेक्नोलॉजी की मदद से इस प्राचीन शिवधाम को फिर से जीवंत करने में जुटे हैं।
वियतनाम से थोड़ा आगे बढ़ें तो लाओस में मेकोंग नदी के किनारे ‘वैट फौ’ (Vat Phou) का प्राचीन मंदिर परिसर नजर आता है। यह 1000 साल से भी अधिक पुराना यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल है। मूल रूप से भगवान शिव को समर्पित इस प्राचीन मंदिर के संरक्षण की जिम्मेदारी भी भारत ने उठाई है। मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान, एएसआई ने 2007 से 2017 तक इसका पहला चरण पूरा किया और 2018 से इसके दूसरे चरण का नेतृत्व कर रहा है।
इतिहास केवल समय के साथ खंडहर नहीं होता, कई बार उसे नफरत की आग में जलाया भी जाता है। बांग्लादेश की राजधानी ढाका का ऐतिहासिक ‘रमना काली मंदिर’ इसी नफरत का शिकार हुआ था। 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ चलाया था। जिहादी पाकिस्तानी सेना ने इस मंदिर को पूरी तरह तबाह कर दिया और सैकड़ों निहत्थे लोगों का कत्लेआम किया। दशकों तक यह स्थान उस बर्बरता का गवाह बनकर खामोश रहा।
लेकिन भारत सरकार ने इस ऐतिहासिक घाव को भरने का संकल्प लिया। भारत सरकार ने इस मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए पूरी फंडिंग कर दी। और वह दिन ऐतिहासिक था जब भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ढाका जाकर इस नए रमना काली मंदिर का उद्घाटन किया। यह उस इस्लामी कट्टरपंथ पर सनातन की विजय का प्रतीक था जिसने इसे नष्ट किया था।
इसी तरह, बांग्लादेश में ही 300 साल पुराने ‘जॉय काली माता मंदिर’, जिसे 18वीं सदी में दीवान दयाराम रॉय ने बनवाया था, उसके जीर्णोद्धार का पूरा खर्च भी भारत सरकार ने उठाया और 2020 में इसे फिर से श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया।
भारत की यह सांस्कृतिक पहुंच केवल युद्ध से तबाह हुए देशों तक सीमित नहीं है। कंबोडिया का अंगकोर वाट, जो दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है, उसकी दीवारों पर आज भी रामायण और महाभारत के दृश्य उकेरे हुए हैं। भारत लंबे समय से इसके संरक्षण से जुड़ा रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों में ‘ता प्रोहम’ और ‘प्रेह विहार’ जैसे महत्वपूर्ण हिस्सों के जीर्णोद्धार में भारत ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
श्रीलंका के मन्नार जिले में स्थित ऐतिहासिक ‘थिरुकेथीस्वरम मंदिर’, जो श्रीलंका के सबसे पवित्र शैव तीर्थों में से एक है, उसके कायाकल्प के लिए भी भारत ने 326 मिलियन श्रीलंकाई रुपये की भारी सहायता की है।
और बात जब विदेशों में मंदिर निर्माण की आती है, तो खाड़ी देशों को कैसे भुलाया जा सकता है? एक समय था जब अरेबिक कंट्रीज में मंदिर के बारे में सोचना भी अकल्पनीय लगता था। लेकिन जब नरेंद्र मोदी बहरीन का दौरा करने वाले भारत के पहले प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने राजधानी मनामा में स्थित 200 साल पुराने ‘श्रीनाथजी (श्री कृष्ण) मंदिर’ के लिए 42 लाख डॉलर की विशाल पुनर्विकास परियोजना की घोषणा की। यह भारत की बदलती हुई डिप्लोमेटिक पावर का सीधा प्रमाण है।
जब देश के अंदर लेफ्ट मीडिया यह सवाल उठाती है कि पॉलिटिक्स में मंदिरों की बात क्यों हो रही है, तब उसे दुनिया की तरफ भी देखना चाहिए। आज दुनिया के कई बड़े मुस्लिम देश भी यह समझ चुके हैं कि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी सभ्यता, संस्कृति और इतिहास में होती है। इंडोनेशिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसने दुनिया को दिखाया है कि अपने इतिहास को मिटाकर कोई देश आधुनिक नहीं बनता। असली आधुनिकता वही है, जो अपनी विरासत को साथ लेकर आगे बढ़े।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिर्फ भारत में केदारनाथ, काशी विश्वनाथ, सोमनाथ और महाकाल लोक जैसे तीर्थों का जीर्णोद्धार ही नहीं कराया, बल्कि भारत की विदेश नीति में भी हमारी सभ्यतागत विरासत को एक नई पहचान दी है।
आज जब इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर में भगवान शिव की पूजा के लिए फिर से द्वार खुल रहे हैं, या वियतनाम के जंगलों में कोई भारतीय पुरातत्वविद् किसी प्राचीन शिवलिंग को संभाल रहा होता है, तो वह सिर्फ एक पुराना मंदिर या मूर्ति नहीं बचा रहा होता। वह उस इतिहास को फिर से सामने ला रहा होता है, जिसने कभी पूरे एशिया को भारतीय संस्कृति, ज्ञान और शांति से जोड़ा था।
यही नए भारत की नई कूटनीति है। एक ऐसा भारत, जो अपनी पहचान छिपाने की बजाय उस पर गर्व करता है। जो दुनिया को यह बता रहा है कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना सिर्फ अतीत की बात नहीं, बल्कि भविष्य बनाने का भी सबसे मजबूत आधार है।




