फिर सुबह के 11 बजे। अचानक तमाशा शुरू हुआ। कोई ढफली लेकर आया, तो कोई संविधान के नाम पर अपनी पर्सनल डायरी उठा लाया और बताने लगा कि बी.आर. अंबेडकर ने संविधान में क्या कमियाँ छोड़ दी थीं। इस जंतर-मंतर के जादू-मंतर में कुछ तो कमाल की बात रही होगी… कि यहाँ आया हुआ 60 साल का आदमी भी खुद को ‘GEN Z’ ही बता रहा था!
CJP की असलियत
आपको याद होगा, मैंने एक रात पहले ही ट्वीट किया था कि, ‘क्या ये सो-कॉल्ड GEN Z खुद सुबह 9 बजे उठकर प्रदर्शन में पहुँचेगी भी?’ लेकिन दीक्षा समय पर पहुँची और उसने जो देखा, वो हैरान करने वाला था। उसने कहा, ‘ये पीढ़ी GEN Z शब्द सुन-सुनकर पक चुकी है। कोई इस नाम पर राजनीतिक फायदा ढूंढ रहा है, तो कोई खुद को GEN Z बोलकर JNU और दिल्ली यूनिवर्सिटी वाले रटे-रटाए नारे लगा रहा है।’
वहाँ लोग हाथ में संविधान लेकर ऐसे पोज़ दे रहे थे, जैसे राहुल गांधी का लाइव शो चल रहा हो। गहरी विचारधारा की समझ – बिल्कुल शून्य! उन्हें खुद यह तक नहीं मालूम कि इस संविधान में कुल कितने अनुच्छेद हैं। लेकिन दिखावा यानी AESTHETICS, पूरे 100 में से 100!
दीक्षा ने बताया कि जो कॉकरोच अपने चार घंटे के कार्यक्रम की प्लानिंग तक ठीक से नहीं कर पाए, वो इस देश को नए सिरे से ‘बिल्ड’ करने का चूरन बेच रहे हैं! एक कोने से जय भीम, दूसरे कोने से राम के लिए गालियां, ब्राह्मणों के लिए गालियां और गोदी मीडिया के नारे एक साथ आ रहे थे। बिना दिशा के नैरेटिव बिल्डिंग का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा?
गायब था असली छात्र, लीडर्स पी रहे थे कोल्ड कॉफी
दीक्षा ने जब थोड़ा करीब से देखा, तो समझ आया कि वहाँ छात्रों के नाम पर हर कोई था, बस सरकारी परीक्षा के लिए दिन-रात पढ़ने वाला असली छात्र ही गायब था। वहाँ AISA और SFI के वही स्थायी प्रदर्शनकारी थे जो हर UGC विरोध-प्रदर्शन में दिख जाते हैं, जो हिडमा जैसे नक्सली के समर्थन में नारे लगाते हुए भी दिखते हैं। लेफ्ट-विंग के महिला संगठनों की वरिष्ठ महिला सदस्य थीं और वो बेचारे मीडिया के पत्रकार थे, जो दीक्षा को भोली-भाली समर्थक देखकर उसके मुँह में अपना नैरेटिव ठूँसने लगे।
तब तक इन ‘कॉकरोचों के बड़े लीडर्स’ भी ढेर हो चुके थे। एक बड़े नेता मस्त कोल्ड कॉफी पीते हुए प्रदर्शन का मज़ा ले रहे थे। एक दूसरे बड़े लीडर ‘भारत की गर्मी’ में 4 घंटे हिल तक नहीं पाए। और तीसरे लीडर? सबको धूप में बुलाकर खुद दोपहर के 2 बजे अपनी तशरीफ़ लाए! बाकी जो बचे, वो अपने-अपने तरीके से बाबा साहब को परिभाषित करने में लग गए।
द बिग क्लाइमेक्स: मास्क के पीछे का असली चेहरा
अब आप बोलेंगे… ‘ऋतिका, तू इतना बोल रही है, बकबक कर रही है… तो तू खुद उस जंतर-मंतर पर क्यों नहीं दिखी? तूने कैसे ये सब देख लिया?’ आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं।
क्योंकि ये किसी अज्ञात ‘कॉकरोच’ की कहानी नहीं थी। इस प्रदर्शन का पूरा विश्लेषण करने के लिए… मैं खुद एक मास्क पहनकर ‘दीक्षा’ बनकर उनके बीच उतरी थी!
जी हाँ, वो दीक्षा जिसके WOKE बयानों को मीडिया ने बिना सोचे-समझे चलाया, वो मैं ही थी। किसी भी मीडिया वाले ने मुझसे यह तक पूछना ज़रूरी नहीं समझा कि ‘जब तुम एक छात्रा हो और तुम्हारा मुद्दा पेपर लीक का है, तो तुम पढ़ाई छोड़कर इतनी भारी राजनीति पर बात क्यों कर रही हो?’ उन्हें सवाल से मतलब नहीं था, उन्हें बस सरकार के खिलाफ एजेंडा चलाना था।
जब प्रदर्शन की सुबह मैंने गोदी मीडिया के नारे सुनकर मीडिया पर हमले वाले वीडियो देखे, तो मैंने मन बनाया कि क्यों न जंतर-मंतर में जाकर आज उन लोगों को ही समझा जाए जो दूसरों को गोदी मीडिया कहते हैं?
तो मैंने एक पत्रकार की तरह ही उन्हें समझने के लिए दीक्षा का रूप ले लिया। मैंने उनके सवाल सुने, जिनका एकमात्र उद्देश्य था- सत्ता के खिलाफ ज़हर उगलवाना, और छात्र के मुद्दे एकदम गायब थे। तो फिर दूसरों को गोदी मीडिया बोलने वाले अपने गिरेबान में क्यों नहीं झाँकते? इन्हें फिर क्या नाम दिया जाए? टोपी मीडिया? ये कहते हैं कि मोदी मीडिया से बात नहीं करते, तो इन लोगों ने कितने छात्रों से बात की या उनके मुद्दों को समझा? ये तो बस इंगेजमेंट फार्मिंग करने गए थे; जो जितनी सत्ता के खिलाफ नफ़रत बेच सकता था, वो इनका पसंदीदा प्रदर्शनकारी बन गया। तो क्या मीडिया यह काम करता है?
प्रदर्शन करना कोई आसान बात नहीं है, और मास्क पहनकर प्रदर्शन करना और भी मुश्किल, खासकर तब, जब आपका दम घुट रहा हो। ‘दीक्षा’ का भी दम घुट रहा था। छात्रों की आवाज़ वाले इस मंच पर ‘आज़ादी’ और ‘उमर खालिद को रिहा करो’ के जो नारे लग रहे थे, वो किसी आम छात्र ने कभी सुने ही नहीं होते। लेकिन हाँ, ये नारे उनके लिए बहुत आसान थे जिनकी जुबान पर पहले से रटे-रटाए राजनीतिक नारे मौजूद हैं।
इस पूरे शोर-शराबे में… क्या किसी ने एक असली NEET एस्पिरेंट की आवाज़ सुनी? आज से लगभग 50 साल पहले जब प्रदर्शन होते थे तो दुष्यंत कुमार की लाइनें बोली जाती थीं कि—’सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए!’
लेकिन इस बिना उद्देश्य के प्रदर्शन ने दिखा दिया कि कुछ अराजकतावादी लोगों का कोई मकसद नहीं होता। वो बस चाहते हैं कि हंगामा होता रहे और उन्हें सस्ती लोकप्रियता मिलती रहे।
आपको याद होगा, कुछ समय पहले हमने ऐसा ही एक साइको-एनालिसिस डॉक्यूमेंट्री JNU जाकर भी किया था। इसीलिए मुझे पहले से अंदाजा था कि इस ‘बिना मकसद के प्रदर्शन’ की हकीकत क्या होने वाली है। और अगर प्रदर्शन ऐसे ही बिना सिर-पैर के होते आए हैं, तो मेरा दिमाग सीधा दिल्ली दंगों पर जाता है। उस मीडिया पर भी जाता है जो उमर खालिद को एक मामूली आदमी बताती है। दिल्ली दंगों में भी कुछ ऐसा ही देखा गया था, जिसकी पहचान सामने थी, उसे मार दिया गया, लेकिन जो शाहीन बाग में एक ही इंकलाबी नारे पर ताली बजा रहा था, उसे कोई समस्या नहीं आई।
सवाल तो ये होना चाहिए था कि इतनी तैयारियाँ इस प्रदर्शन की कब की गईं? वहाँ कॉकरोच वाले मास्क बाँटे जा रहे थे, इंकलाबी पर्चे पकड़ाए जा रहे थे, AL JAZEERA जैसी विदेशी मीडिया वहाँ मौजूद थी, फ्रांस की मीडिया कवर कर रही थी, THE GUARDIAN की सत्ता परिवर्तन वाली तथाकथित पत्रकार वहाँ घूम रही थी। इससे पहले यही सब लोग पत्रकारिता के नाम पर किसान आंदोलन में भी दिखे थे, और आप कहते हैं कि ये लोग मीडिया हैं? ये लोग कहते हैं कि सत्ता को उखाड़ फेंको? विदेशी मीडिया हमारे देश में छात्रों के नाम पर प्रोपेगैंडा प्लांट कर रहा है, और ये खुद को दीक्षा का हितैषी बताते हैं?
क्या दीक्षा बनना आसान है?
दीक्षा के अनुभव से यही संदेश जाता है कि जब एक आंदोलन का कोई स्पष्ट उद्देश्य और दिशा ही न हो, तो वो सिर्फ एक हिंसक भीड़ बनकर रह जाता है, जो बाद में दंगों में बदल जाती है।
आपको अग्निवीर योजना के खिलाफ हुए प्रदर्शन याद हैं? सोचिए, सेना में जाने के लिए तत्पर नौजवान क्या ट्रेनें जलाएगा? लेकिन ट्रेन और बसें जलाई गईं, हंगामा हुआ और दंगा हुआ। क्यों? क्योंकि किसी के पास जवाब ही नहीं था कि असल में अग्निवीर के खिलाफ क्या बोलना है, बस भीड़ इकट्ठा हुई और दंगाई समूह में बदल गई।
मास्क पहनकर लोगों के बीच रहने का मेरा यह व्यक्तिगत अनुभव यही कहता है कि सोशल मीडिया पर लाखों की हवा बनाना और शोर मचाना बहुत आसान है… पर ग्राउंड पर एजेंडा चलाने और हक की बात करने में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है।
ऐसी कितनी दीक्षाएँ हैं, जो शायद प्रदर्शन का हिस्सा बनना वहन नहीं कर पाती हैं… क्योंकि जब भी उनके हिस्से की बात करने कोई आता है, तो उसे केजरीवाल या कॉकरोच जैसे लोग अपने व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए हाइजैक कर लेते हैं, क्योंकि वो राजनीति में अपनी ज़मीन तलाश रहे होते हैं…
गोदी मीडिया का हल्ला मचाने वालों ने मेरे साथी अनुराग मिश्रा को भी घेरा था, मैं कुछ दूर से मास्क के पीछे से सब देख रही थी। और आपको पता है कि अनुराग को क्यों घेरा जा रहा था? क्योंकि उन्होंने प्रदर्शन करने आए लोगों से पूछ लिया था कि आखिर समाधान क्या है? उन्होंने वो सवाल पूछ लिया था जो इस प्रदर्शन में पूछा जाना चाहिए था।
अनुराग ने इंगेजमेंट फार्मिंग के सवालों को छोड़कर प्रदर्शनकारी बने लोगों से यह पूछा था कि व्यवस्था बदलोगे कैसे? लेकिन छात्रों के नाम पर हल्ला मचाने आई भीड़ को यह रास नहीं आया। नतीजा, अनुराग को घेरने का प्रयास हुआ, उनके साथ धक्का-मुक्की करने की कोशिश हुई।
यानी जहाँ ढंग के सवाल पूछे जा रहे थे वहाँ गोदी मीडिया के नारे लग रहे थे और जहाँ कोई वास्तविक बातें कह रहा था, उन्हें टोपी मीडिया सुनना नहीं चाहता था। क्योंकि इससे उनको वो क्लिक्स नहीं मिलते जिसके लिए वो जंतर-मंतर पर आए थे।
प्रदर्शन में न जाने मास्क के पीछे कितनी और दीक्षाएँ शायद इस उम्मीद के साथ आई होंगी कि आज उनसे मुद्दे की बात पूछी जाएगी, शायद उनके युवा दिमाग में बहुत सारे समाधान रहे होंगे, लेकिन मौका उन दीक्षाओं को नहीं बल्कि रंग-बिरंगे अटेंशन सीकर्स को मिला।
जो खुद को गोदी मीडिया से अलग बताते हैं, उन्होंने पूरी कोशिश नए उमर खालिद तलाशने में की। कुछ ने इस नई कथित पार्टी से उपजे कांग्रेस के खतरे का आकलन करना चाहा और अंत में क्या हुआ?
अंत में कई सारी दीक्षाएँ ठगी सी वापस लौट गईं और एक और क्रांति उसी तरह गायब हो गई जैसे पैरों की आहट सुनने पर कॉकरोच गायब हो जाते हैं।


