Hum Dekhenge, Faiz Ahmed Faiz

‘हम देखेंगे’… फ़ैज़ की नज़्म और ‘लिबरल’ मुखौटे के पीछे का इस्लामी सच

Summary
‘हम देखेंगे’ से ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ तक का वैचारिक सफर। इंक़लाब की आड़ में रची गई पटकथा का स्याह सच। क्या फ़ैज़ अहमद की ‘हम देखेंगे’ महज़ एक क्रांतिकारी कविता है या बरसों से हमें परोसा जा रहा एक इस्लामी एजेंडा?

‘हम देखेंगे, लाज़िम है कि हम भी देखेंगे, हम देखेंगे…’ यह नज़्म हर क्रांतिकारी इंसान कभी न कभी गा ही लेता है। और आजकल के दौर में जब क्रांति डफ़ली बजाकर और रील बनाकर नाचने-गाने से आनी है, तब तो इसे गाना और भी लाज़िमी हो जाता है।

इंसान तो इंसान, अब कॉकरोच भी इसे गाने लगे हैं, जैसे ये मोहतरमा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के अनिश्चितकालीन प्रोटेस्ट में गाती दिखीं।

बड़ी शातिर हैं ये। इनको मालूम था कि इसी नज़्म के इसी हिस्से को लेकर बड़ा विवाद हुआ था, जब आज से लगभग छह साल पहले इसे सीएए (CAA) क़ानून के ख़िलाफ़ गाया गया था। तो इन्होंने सोचा कि उस विवाद का पहले ही जवाब दे दिया जाए। और जो एक वामपंथी से अपेक्षित है, यह जवाब या सफ़ाई झूठ और फ़रेब पर टिकी है।

पहली बात यह कि सिर्फ़ अल्लाह के नाम से कोई दुखी नहीं हो रहा था। अब इन्हें जैसे राम के नाम से मिर्ची लगती है, तो वैसा ही इन्हें लगता है कि बस अल्लाह के नाम से ही राइट विंग को मिर्ची लगती होगी। पर उस वक़्त लोगों को आपत्ति नज़्म के उस पूरे हिस्से से थी, जहां बुत तुड़वाने की बात होती है। जहां सब कुछ मिटाकर सिर्फ़ अल्लाह का नाम क़ायम करने की बात होती है। जहां इस्लाम की जीत को सबसे बड़ी क्रांति के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है।

उस पर भी इनका डिफेंस है कि यह तो मेटाफ़र (Metaphor) है, इसे लिटरली लेने की ज़रूरत नहीं है। उस पर बाद में आएंगे, पहले इस शातिर मोहतरमा का खेल समझ लें। इनका कहना है कि अल्लाह तो वह शक्ति है जो हम सब में है। और अगर मैंने सही सुना, तो वे इसे ‘हाईएस्ट वेदांत’ (Highest Vedanta) बता रही हैं। मतलब यह लोगों को समझाने या बरगलाने की कोशिश कर रही हैं कि अल्लाह का नाम सुनकर भड़क मत जाओ; यह तो वह परमात्मा है जिसका अंश हम सभी में है, और उस परमात्मा या ईश्वर की बात तो हिंदू धर्म में भी होती है।

गांधीजी ने भी यही कहा था – ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’। लेकिन गांधीजी के लिए मेरे दिल में इज़्ज़त है। वे बेवक़ूफ़ बन रहे थे, यह बेवक़ूफ़ बना रही हैं। क्योंकि अल्लाह या ईश्वर एक ही है, यह बेवक़ूफ़ी सिर्फ़ एक हिंदू ही पाल सकता है। जिससे उसे यह लगता है कि मस्जिद जाओ या मंदिर, बात एक ही है। एक मुसलमान के दिमाग़ में यह केमिकल लोचा नहीं है। उसे पता है कि अल्लाह बस एक है और वह वही है जिसकी बात क़ुरान और पैगंबर मोहम्मद करते हैं। वह किसी भी सूरत में यह नहीं मान सकता कि रघुपति राघव राजा राम, ईश्वर भी हो सकते हैं और अल्लाह भी।

गांधीजी ने भी यही कहा था – ईश्वर अल्लाह तेरो नाम। लेकिन गांधीजी के लिए मेरे दिल में इज़्ज़त है। वो बेवक़ूफ़ बन रहे थे, ये बेवक़ूफ़ बना रही है।

क्योंकि अल्लाह या ईश्वर एक ही है, ये बेवक़ूफ़ी सिर्फ़ एक हिन्दू ही पाल सकता है। जिससे उसे ये लगता है कि मस्जिद जाओ या मंदिर, बात एक ही है। एक मुसलमान के दिमाग़ में ये केमिकल लोचा नहीं है। उसे पता है कि अल्लाह बस एक है, और वो वही है जिसकी बात क़ुरान और पैगंबर मोहम्मद करते हैं। वो किसी भी सूरत में ये नहीं मान सकता कि रघुपति राघव राजा राम ईश्वर भी हो सकते हैं और अल्लाह भी।

किसी भी इस्लामिक स्कॉलर (Islamic Scholar) के यू-ट्यूब वीडियो देख लो या फिर देवबंद उलूम के फ़तवे पढ़ लो इस मसले पर; इसमें कोई कन्फ्यूजन नहीं है कि जब एक मुसलमान अल्लाह बोलता है, तो उसका मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ उस शक्ति से होता है जिसके बारे में क़ुरान में लिखा है। मुस्लिम मुल्क मलेशिया में तो क़ानून है कि अल्लाह शब्द का इस्तेमाल सिर्फ़ मुसलमान ही कर सकते हैं, यानी उधर अगर ‘ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम’ बोला, तो जेल भी हो सकती है।

मतलब अल्लाह शब्द को लेकर मुसलमानों के मन में न कोई कन्फ्यूजन है और न ही किसी क्रिएटिविटी का स्कोप है। उसे अल्लाह की बंदगी करनी है, आंख मूंद के। और अल्लाह को मूर्तिपूजा से नफ़रत है। अल्लाह को हर उस बंदे से प्रॉब्लम है जो क़ुरान के हिसाब से नहीं चल रहा। उन सब का हिसाब क़यामत के दिन होगा… मतलब ‘सब याद रखा जाएगा’ – यह भी वैसे सीएए (CAA) के दौरान बोला गया था, अगर याद हो तो।

बहरहाल, वापस लौटते हैं उस नज़्म पर जो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखी है। वह कॉकरोच बोल सकती है कि भाड़ में जाए इस्लामिक स्कॉलर या देवबंद, जब मैं अल्लाह वाली लाइन बोल रही हूं तो उसका मतलब वही शक्ति है जो वेदांत में है, वगैरह-वगैरह। यह एक टिपिकल यूज़फुल इडियट की पहचान है, जिसको लगता है कि वह ड्राइविंग सीट पर है। ऐसे प्रोटेस्ट किधर जाएंगे, वह ऐसे यूज़फुल इडियट्स के हाथ में नहीं है। उनके हाथ में बस एक माइक है जिस पर वे कुछ बोलकर वायरल हो सकते हैं। ऐसे प्रोटेस्ट्स की बागडोर किसी और के हाथों में होती है। और सामने जो दिखता है, वह बस मुखौटा या छलावा होता है, जिसके लिए इडियट्स यूज़फुल होते हैं।

याद रहे कि जब हम शाहीन बाग़ प्रोटेस्ट के दौरान ‘क़ुदरती बिरयानी’ वाली वायरल क्लिप पर हंस रहे थे, उसी वक़्त दिल्ली दंगों की प्लानिंग चल रही थी। कॉकरोच प्रोटेस्ट की आड़ में उसी दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की आज़ादी के लिए प्लानिंग चल रही है। नीट (NEET) पेपर लीक से इनका कोई मतलब नहीं है, वह तो बस जेन-ज़ी (GenZ) को बुलाने का बहाना है। कॉकरोचों के पहले प्रोटेस्ट के प्लान को उसी दिन अनाउंस किया गया था जब उमर ख़ालिद कुछ दिनों के लिए जेल से बाहर आया था। और उमर ख़ालिद के अब्बा भी इस प्रोटेस्ट में शामिल हुए हैं।

उमर ख़ालिद के साथ उसके साथी शरजील इमाम का नाम मैंने जानबूझकर लिया। इसने नॉर्थ ईस्ट इंडिया (North East India) को भारत से काटकर अलग करने की बात की थी, ‘चिकन नेक’ काटने की बात की थी। इस फ़सादी को न्यूज़ आर्टिकल्स में स्कॉलर कहकर बुलाया जाता है, क्योंकि जेएनयू (JNU) में इसने कुछ पढ़ाई की थी। जेएनयू के दौरान इसने एक लेख लिखा था – फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पर।

वही फ़ैज़, जिसकी नज़्म ‘हम देखेंगे’ की बात से हमने इस वीडियो की शुरुआत की थी। आज से लगभग नौ साल पहले लिखे इस लेख में उसने फ़ैज़ को एक इस्लामी क्रांतिकारी बताया था। याद रहे कि जो हिंदू नाम वाले वामपंथी हैं, वे फ़ैज़ को प्रोग्रेसिव पोएट (Progressive Poet) बताते हैं। वे राइट विंग पर हंसते हैं कि बताओ, ये फ़ैज़ को भी जिहादी समझते हैं, जबकि वे तो एथिस्ट (Atheist) और कम्युनिस्ट थे। ‘हम देखेंगे’ नज़्म में जो इस्लाम की जीत का एक्सप्लिसिट रेफरेंस (Explicit Reference) है, उसे वे बस मेटाफ़र बताते हैं।

पर उनका नन्हा-प्यारा शरजील इमाम ही बोल रहा है कि यह ग़लत इंटरप्रिटेशन है। अपने लेख में वह इसी ‘हम देखेंगे’ नज़्म की बात करता है। वह लिखता है कि इस नज़्म का एक बड़ा हिस्सा – और ख़ासकर वह हिस्सा जिस पर CAA के दौरान लोगों ने ऐतराज़ जताया था – वह दिखाता है कि फ़ैज़ कोई नास्तिक नहीं, बल्कि दीन पर ईमान रखने वाले एक सच्चे मुसलमान थे। शरजील एक किताब का भी ज़िक्र करता है जहां फ़ैज़ ख़ुद के नास्तिक होने की बात को ख़ारिज कर रहे हैं और बता रहे हैं कि वे सच्चे मुसलमान हैं।

शरजील तो यहां तक कहता है कि ‘हम देखेंगे’ नज़्म में जो जज़्बा है, वह इस्लामिक शहादे से आया है। यानी आप ‘हम देखेंगे’ गाओ या फिर बोलो ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’, बात एक ही है। यह कोई राइट-विंगर नहीं, लिबरल्स का प्यारा, उमर ख़ालिद का दुलारा शरजील इमाम बोल रहा है। याद है कश्मीर में वे क्या बोलते थे – ‘पाकिस्तान से रिश्ता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह’। इसी नारे का एक वर्जन एंटी-सीएए प्रोटेस्ट (Anti-CAA Protest) में भी सुना गया था।

ये सब शरजील इमाम और उमर ख़ालिद जैसे लोग ख़ुद बोल और लिख रहे हैं। जब ये ‘हम देखेंगे’ गाते हैं, तो वे कोई कम्युनिस्ट क्रांतिकारी के विचार नहीं प्रकट कर रहे होते हैं, वे बस सॉफ्ट तरीक़े से वही कह रहे होते हैं जो कि कश्मीर में ख़ुलेआम जिहादियों ने कहा था। यह उन्हीं की सोच है, उन्हीं की कथनी में और उन्हीं की करनी में।

By the way, फ़ैज़ का एक कनेक्शन कश्मीर से भी है। शायरी और लेखनी को अपना फ़ुल-टाइम करियर बनाने से पहले फ़ैज़ ब्रिटिश इंडियन आर्मी (British Indian Army) में थे। यह पार्टिशन (Partition) के पहले की बात है। पार्टिशन के बाद उन्होंने फ़ौज की नौकरी तो छोड़ दी, पर फ़ौजियों का साथ नहीं छूटा। सितंबर 1947 में, यानी पार्टिशन के अगले ही महीने, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने एक मीटिंग बुलाई थी, जिसमें यह प्लान बनाया गया कि पाकिस्तानी फ़ौज उन जिहादियों का साथ देगी जो कश्मीर पर हमला करके उसे पाकिस्तान में मिला लेंगे।

इस मीटिंग का हिस्सा थे फ़ैज़ अहमद फ़ैज़। पाकिस्तान और जिहादियों ने कोशिश की भी और उन्हें थोड़ी सफलता मिली। आज पाकिस्तान के कब्ज़े में जो कश्मीर है, जिसे वह आज़ाद कश्मीर कहता है, वह इसी हमले की वजह से है जिसकी प्लानिंग में फ़ैज़ शामिल थे। ‘आज़ाद कश्मीर’ का प्रोक्लेमेशन ऑफ़ फ्रीडम (Proclamation of Freedom) डॉक्यूमेंट लिखने वालों में भी फ़ैज़ शामिल थे।

इसके अलावा यह जान लेना भी ज़रूरी है कि जिस फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की क़लम से क्रांति की नज़्में निकलीं, वे अपनी पर्सनल लाइफ़ में ऐसे कोई क्रांतिकारी भी नहीं थे। वे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़ीकार अली भुट्टो के ख़ास दोस्त थे। भुट्टो की सरकार में उन्हें कई अच्छे ओहदे भी मिले थे। जब प्रधानमंत्री होते हुए भुट्टो ने पाकिस्तान में ऐसा क़ानून बनाया जिससे अहमदिया मुसलमानों से अपने आपको मुसलमान कहने का हक़ छीन लिया गया, तो फ़ैज़ ने उनका कोई विरोध नहीं किया। एक क्रांतिकारी से कम से कम इतनी उम्मीद तो होनी चाहिए न? ‘स्पीकिंग ट्रुथ टू पावर’ (Speaking truth to power)।

वैसे ही जब भुट्टो ने पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर ज़ुल्म करने शुरू किए, जिसके बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ, तब भी फ़ैज़ ने खुलकर भुट्टो का विरोध किया हो, ऐसी कोई जानकारी नहीं है। याद रहे, लाखों लोग मारे गए थे, महिलाओं का बलात्कार हुआ था और हिंदुओं को तो ख़ासकर टारगेट किया गया था। पर ये सब करने वालों के ख़िलाफ़ फ़ैज़ की क़लम ने आग उगली हो, ऐसा नहीं दिखता।

पर बात फ़ैज़ की नहीं है। मैं वामपंथी नहीं हूं जिसकी नज़र में हर एक शायर, या फिर एक एक्टर या क्रिकेटर भी, जब तक एक क्रांतिकारी न बने, उसकी कोई अहमियत नहीं। फ़ैज़ ने अच्छी ग़ज़लें लिखीं, अच्छी नज़्में लिखीं, मेरे लिए वह बहुत है। लेकिन उनका क्या, जिनको ‘हम देखेंगे’ में ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ दिखता है?

इसमें कोई शक़ नहीं होना चाहिए कि शरजील इमाम जैसे लोगों के लिए फ़ैज़ न सिर्फ़ एक इस्लामी शायर थे, जो कि उसने साफ़ अपने लेख में लिखा है, बल्कि उनकी नज़रों में फ़ैज़ एक पक्के जिहादी भी थे, जिन्होंने कश्मीर को आज़ाद करने की पूरी कोशिश की और जिनका ज़मीर लाखों लोगों के, ख़ासकर हिंदुओं के क़त्लेआम पर नहीं दुखा। और इसलिए जब ये जमात ‘हम देखेंगे’ गाती है और ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ चिल्लाती है, तो वे क्रांति नहीं, जिहाद के सपने देख रहे होते हैं। अगर आप इस जमात की साफ़ दिख रही इस्लामी मंसूबों को नकार कर अब भी मेटाफ़र वाली बात से ही बेवक़ूफ़ बनना चाहते हैं, तो मर्ज़ी आपकी। हम देखेंगे।

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