सतलुज मूवी ने पंजाब के कोई राज खोले हो या नहीं लेकिन दिलजीत दोसांझ का मास्क जरूर उतार दिया है। अब तक हमेशा दिलजीत दोसांझ अपने आप को एक स्वीट, सुपरफ़न, जिंदादिल पंजाबी के तौर पर पेश करते आए हैं और चाहे खालिस्तान हो या पंजाब में खालिस्तानी आतंक की बात, उस पर क्वेशंस अवाइड करते आए हैं।
साथ ही वो कई बार ऐसे काम भी करते आए हैं, जिनसे उनकी लॉयल्टी कहाँ ज्यादा है, ये दिखता रहा है। सतलुज मूवी में भी CM बेअंत सिंह की हत्या को समहाउ जस्टिफाई करना, उसको बदले के तौर पर दिखाना, इसी मूवी में खालिस्तानी आतंक पर कहीं कम बात करना और सरकार को ईविल के तौर पर पेश करना उसका सबका रीसेंट एग्जाम्पल है।
साथ ही मूवी को OTT ZEE 5 पर रिलीज किए जाने का तरीका और हटाए जाने पर दिलजीत का ये कहना कि अब तो सब तक पहुँच ही गई, ये भी दिखाता है कि दिलजीत अपने एक्ट से ज्यादा कुछ मैसेज डिलीवर करना चाहते थे। अब इस मूवी की पंजाब में पायरेटेड कॉपीज दिखाई जा रही हैं, लेकिन दिलजीत को उससे भी कोई समस्या नहीं है।
हालाँकि, दिलजीत का ये स्टैंड कोई नया नहीं है। साल 2020 में किसानों के नाम पर तमाम खालिस्तानी एलिमेंट्स ने दिल्ली पर घेरा डाला था, तब भी दिलजीत उनके समर्थन में खड़े थे। उनसे जब एक डिबेट के दौरान कंगना रनौत ने खालिस्तान की आलोचना करने को कहा था तो वो उस पर भी चुप्पी साध गए थे।
इन फैक्ट इससे पहले एक और पंजाबी फ़िल्म रंगरूट में उन्होंने एक गाना गाया था जिसमें सीधे तौर पर कहा गया था की 1984 का बदला लेने के लिए AK 47 काम आएँगी। उन्होंने उस खालिस्तानी आतंकी जगतार सिंह जोहल के लिए भी आवाज उठाई है , जिसने हिंदू नेताओं की हत्या की।
बाक़ी उनका बार बार अपनी पंजाबी आइडेंटिटी को अपने भारतीय होने से ऊपर रखना, punjab को Panjab के रूप में स्पेल करना, ये सब कुछ उनको खालिस्तान सिंपाथाइज़र का शक गहरा करता रहा है। लेकिन सतलुज ने सारी बात स्पष्ट कर दी है, वैसे OpIndia ने साल 2020 में ही उनकी इस ड्यूल आइडेंटिटी को एक्सपोज़ किया था।





