उत्तराखंड के केतन लाल हत्या के मामले में आई एक अपडेट से ऑपरेशर और विक्टिम की कल्चरल मार्क्सिज्म थ्योरी याद आती है जिसमें सच या सबूत देखने से पहले ये देखा जाता है कि समाज में कौन सा वर्ग कमजोर है और बिना जांच पड़ताल के ही उसी वर्ग को तुरंत सही मान लिया जाता है।
टिहरी गढ़वाल के एक गांव में जो हुआ, वो इसी सोच का एक बड़ा एग्जाम्पल है। शुरुआती नैरेटिव ये बन गया कि केतन लाल नाम के एक दलित लड़के की गाँव वालों ने पीट-पीटकर हत्या कर दी।
सोशल मीडिया पर और कुछ नेताओं ने तुरंत इसे “जातिवाद” का मामला बता दिया। उनके लिए यह ‘ताकतवर बनाम कमजोर’ की एक परफेक्ट कहानी बन गई। दलित उत्पीड़न का आदर्श एग्जाम्पल बन गया।
लेकिन इसमें छिपे हुए लूपहोल्स क्या थे? मीडिया ने जानबूझकर इस कहानी का दूसरा पहलू हम सभी से छिपाया। पहला लूपहोल ये था कि केतन के साथ उसका ब्राह्मण दोस्त दिवाकर डिमरी भी उस रात नाबालिग राजपूत लड़की से मिलने गया था और उसकी भी पिटाई हुई थी लेकिन फिर भी ये मामला केवल एक जाति यानी दलित तक सीमित कर दिया गया।
सबसे बड़ा लूपहोल तब सामने आया जब मामला उत्तराखंड हाईकोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने नाबालिग की मां की गुहार पर मेडिकल टेस्ट करवाया तो पता चला कि लड़की का रेप हुआ है। सच ये था कि उस नाबालिग बच्ची का दुष्कर्म किया गया था, जिसके बाद पीड़िता के घर वाले अपना आपा खो बैठे और वो हिंसा पर उतर आए। हिंसा की निंदा हर बार होनी चाहिए लेकिन क्या वो नेता, वो रिपोर्ट्स उस पीड़ित लड़की के घर गए? क्या उन्होंने दूसरे पक्ष को समझने की जरा भी कोशिश की? आखिर क्यों चंद्रशेखर रावण के लिए एक नाबालिग के साथ हुए दुष्कर्म से ज्यादा जाति की राजनीति ही सबसे ऊपर होती है?
यहां पर जातिवाद के नाम पर आक्रोश पैदा करके एक नाबालिग के बलात्कार जैसे अपराध को दबा देना मीडिया का सबसे बड़ा झूठ था लेकिन ये याद रखा जाना चाहिए कि कानून भावनाओं या सोशल मीडिया के नैरेटिव से नहीं, बल्कि सबूतों से चलता है और मैं उम्मीद करती हूं कि उस नाबालिग पीड़िता को भी न्याय मिले, कानूनन भी और सामाजिक तौर पर भी।






