एक सैनिक जिसने जवानी में देश के लिए तीन युद्ध लड़े उन्हें अब 92 साल के बुढ़ापे में एक और युद्ध लड़ना पड़ रहा है और ये चीन या पाकिस्तान से नहीं, बल्कि अपने ही देश के उन कॉक्रोच और दीमकों से है जो सिस्टम को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं।
ये कहानी है रिटायर्ड आर्मी कैप्टन चुन्नी लाल ठाकुर और उनकी जमीन हड़पे जाने की। कैप्टन चुन्नी लाल हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के रहने वाले हैं। वो पौंग डैम विस्थापित परिवार में से एक हैं। जब पौंग डैम बना तो उनकी पुश्तैनी जमीन सरकार ने ली और बदले में राजस्थान के जैसलमेर जिले के मोहनगढ़ में 25 बीघा कृषि भूमि दी।
कैप्टन चुन्नी लाल कहते हैं कि जब वो पहली बार मोहनगढ़ पहुंचे तो वहां चारों तरफ सिर्फ रेत ही रेत थी। वर्षों की मेहनत के बाद उन्होंने उस बंजर जमीन को उपजाऊ बनाया।
अब हाल में उनके खेत की देखभाल करने वाले किसान ने फोन किया और बताया कि कैप्टन साहब, आपकी जमीन बिक चुकी है। ये सुनकर तो 92 वर्षीय कैप्टन चुन्नी लाल के पैरों तले मानो जमीन खिसक गई।
उनके मुताबिक, 16 जून को किसी ने फर्जी दस्तावेज तैयार किए, उनकी जगह किसी दूसरे व्यक्ति को खड़ा कर दिया और जमीन की रजिस्ट्री करा दी और इसके सिर्फ दस दिन बाद जमीन का म्यूटेशन भी हो गया, यानी सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में भी नए व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब असली मालिक वहां मौजूद ही नहीं था तो रजिस्ट्रेशन कैसे हो गया? फिंगरप्रिंट, फोटो या अन्य पहचान की ठीक से जांच क्यों नहीं की गई? आखिर जिम्मेदार कौन-कौन हैं? जमीन बेचने वाले के साथ-साथ वो प्रशासन जिसने कागजात वेरीफाई नहीं किए? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि जब कैप्टन चुन्नी लाल हिमाचल से सैकड़ों किलोमीटर दूर जैसलमेर पहुंचे तो उन्हें एक थाने से दूसरे थाने भेजा जाता रहा और शुरुआत में तो FIR तक दर्ज नहीं की गई।
वो तो जैसलमेर के एसपी अभिषेक शिवहरे के हस्तक्षेप के बाद धोखाधड़ी से जुड़ी धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई।
अब कैप्टन चुन्नी लाल की कहानी सामने आई तो पता चला कि ये दर्द शायद सिर्फ उनका नहीं है। एयरफोर्स के रिटायर्ड सार्जेंट लाला राम कहते हैं कि कुछ जमीन दलाल खास तौर पर पौंग डैम विस्थापित परिवारों और रिटायर्ड सैनिकों को निशाना बनाते हैं। चूंकि वो अपने गांव से सैकड़ों किलोमीटर दूर रहते हैं तो उनकी जमीन पर नजर रखने वाला कोई नहीं होता और इसी का फायदा उठाकर जमीन हड़पने की कोशिश की जाती है।
आज कैप्टन चुन्नी लाल 92 साल के हैं। क्या वो इस हालत में है कि वो हिमाचल से जैसलमेर जाते रहें और अपनी जमीन के लिए कोर्ट के चक्कर काटते रहें… इस उम्र में वो ये तो नहीं डिजर्व करते थे। अब उन्होंने एक गुहार लगाई है कि ये मामला हिमाचल प्रदेश ट्रांसफर किया जाए ताकि वे आसानी से अदालती कार्रवाई में भाग ले सकें।
आप सोचिए, जिसने अपनी जवानी में देश के लिए चीन, पाकिस्तान के खिलाफ तीन बड़ी लड़ाई लड़ी, देशहित में अपनी पैतृक जमीन सरकार को दी और उस जमीन पर बने इस डैम से आज राजस्थान को पानी और बिजली दोनों मिल रहा है और बदले में उन्हें क्या मिला? राजस्थान के दलालों ने उनकी जमीन किसी और को बेच डाली।






