अमेरिका - पाकिस्तान

डूरंड लाइन से POK… बगराम एयरबेस से लेकर बलूचिस्तान तक, लोकतंत्र की स्थापना के नाम पर अमेरिका खेलता है ये घिनौना खेल

Summary
अमेरिका के लिए रणनीतिक हित ही सबसे ऊपर रहते हैं। इसे ही स्ट्रेटेजिक हायपोक्रेसी कहते हैं जहाँ अमेरिका पाकिस्तानी सेना को ताकतवर बनाने करने का काम भी करता है

1952 में अमेरिका ने क्यूबा में राष्ट्रपति Batista को स्थापित किया ताकि वो अपने आर्थिक हितों के लिए वहाँ प्रभाव बनाए रख सके। साल 1954 में ग्वाटेमाला में जनादेश से चुनी गई जैकोबो आर्बेंज सरकार को गिराया गया। जिसके लिए CIA ने प्रोपैगैंडा, विद्रोही फोर्स और सैन्य कार्रवाई के ज़रिए ऑपरेशन PBSuccess चलाया।

1955 से 1975 तक अमेरिका ने वियतनाम, लाओस, कंबोडिया में युद्ध चलाया, इन सभी युद्ध में तीस लाख से ज़्यादा लोग मरे। इतने भयावह दृश्य कि अमेरिका के नागरिक भी सड़कों पर उतर आए और उनके ऊपर गोलियाँ चला दी गईं।

1980 के दशक में अमेरिका ने सोवियत संघ के खिलाफ अफगान मुजाहिदीन को हथियार और पैसे से मदद दी। इसका मकसद सोवियत को कमजोर करना था। लेकिन इसका नतीजा ये हुआ कि अफगानिस्तान एक परमानेंट वॉरजोन बन गया। और आज अमेरिका खुद वहीं से भाग चुका है।

2011 में अमेरिका ने खुद को ‘Watchdog of democracy’ बताकर सीरिया की असद सरकार को गिराने की साज़िश रची। ‘रोजा क्रांति’ के नाम पर हथियार और पैसा भेजा गया। और इसका नतीजा क्या हुआ? 

सीरिया हमेशा के लिए एक विशाल युद्धक्षेत्र में तब्दील हो गया। इसी अराजकता में ISIS जैसे आतंकवादी संगठन को पनपने का मौका मिला। लेकिन CIA और Pentagon के कई ख़ुफ़िया दस्तावेज़ और रिपोर्ट्स बताते हैं कि America की खुफिया एजेंसियां उग्रवादी गुटों को सहयोग दे रही थीं।

2015 में तुर्की के समुद्री किनारे पर सीरियाई बच्चे- ‘ऐलन कुर्दी’ की लाश बहती मिली थी। गृहयुद्ध से भागते वक्त उसकी ज़िंदगी का अंत हो गया। लेकिन सवाल उठता है कि आख़िर उसका घर क्यों बर्बाद हुआ था?

अब, साल 2025 में अमेरिका की फ़ॉरेन पालिसी को आप देखेंगे तो अमेरिका ने पूरी बेशर्मी के साथ खुद को बेनकाब कर दिया है। 

लोकतंत्र का सपोर्ट करने की बात करते-करते, अमेरिका लगातार पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही को समर्थन दे रहा है। वही पाकिस्तान, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं कुचल दी गईं, जहां पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को जेल में डाल दिया गया, और जहां हर चुनाव में गड़बड़ी की बात बहुत ही सामान्य है।

चाहे आर्थिक मदद के पैकेज हों, F-16 जेट्स का सपोर्ट, IMF के ग्रांट्स; ये सब मिलकर पाकिस्तान की सेना को मजबूत करने का ही काम कर रहे हैं। और ये एक ऐसा गिरोह बन रहा है जहाँ मानवाधिकार की पैरवी सिर्फ दिखावे के लिए की जाती है।

जबकि असलियत ये है कि अमेरिका के लिए रणनीतिक हित ही सबसे ऊपर रहते हैं। और इसे ही स्ट्रेटेजिक हायपोक्रेसी कहते हैं जहाँ पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश यूजफुल इडियट्स कहलाते हैं। इसीलिए अमेरिका पाकिस्तानी सेना को ताकतवर बनाने करने का काम भी करता है और पाकिस्तानी सेना के ताक़तवर बनने के क्या परिणाम हो रहे हैं, वो हम आपको इस वीडियो में बताने जा रहे हैं ।

आपने अक्सर देखा या सुना होगा जब अमेरिका कहता है कि वो आतंकवाद के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहता है, लेकिन क्या सचमुच पाकिस्तान के साथ उसकी ये साझेदारी आतंकवाद के खिलाफ है?.. या बस चीन और भारत जैसी क्षेत्रीय ताकतों को काउंटर बैलेंस करने के लिए उनके खिलाफ ताकत का खेल है?

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबानी सरकार के विदेश मंत्री भारत आए हैं। आपको याद होगा कि Trump ने कुछ ही दिन पहले कहा था कि 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमेरिकी फोर्सेज द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले  बगराम एयरबेस का कंट्रोल अमेरिका वापस चाहता है।

लेकिन अफगान सरकार साफ बोल चुकी है कि “हमें अमेरिका की फौज की अब कोई ज़रूरत नहीं है।”  यानी जिस बगराम एयरबेस से कभी अमेरिका पूरे क्षेत्र की नाक में दम करता था, उस पर अमेरिका को क़ब्ज़ा वापस देने के लिए अब तालिबान तैयार नहीं है।

ट्रम्प इस बात से भी बौखलाए हैं। ट्रंप ने धमकी भरे अंदाज में कहा कि अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो आपको पता चल जाएगा कि मैं क्या करने वाला हूं। मतलब साफ साफ़ कह रहे हैं कि अगर अफगानिस्तान ने लाइन में नहीं आया, तो “मैं कुछ ऐसा कर दूंगा कि हमेशा याद रखोगे।”

ट्रंप का असली प्लान तो बगराम पर वापसी का है। क्योंकि बगराम सिर्फ़ अफगानिस्तान का बेस नहीं है, ये तो पूरा “गेमिंग कंसोल” है- एक तरफ़ ईरान, दूसरी तरफ़ पाकिस्तान,- थोड़ी दूरी पर चाइना का शिनजियांग, और ऊपर से पूरा का पूरा मध्य एशिया।

ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका फिर से वहाँ बैठकर सबको टेलीस्कोप से देखे- रूस की सैन्य ताक़त, चीन का Belt and Road प्रोजेक्ट, और बाकी जो कुछ भी चल रहा हो। ख़ास बात ये है कि ये सिर्फ फौज का ठिकाना नहीं बल्कि ये Signal Intelligence Center है। मतलब जो कॉल, मेल, सैटेलाइट पर बात होगी, सब सीधा बगराम से अमेरिका के कानों तक पहुँच रही होगी।

इस डेवलपमेंट के बीच एक और न्यूज़ ये है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से एक अहम द्विपक्षीय बैठक कर चुके हैं।इस मुलाकात में पाकिस्तानी आर्मी चीफ और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर भी शामिल थे।

इससे पहले पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्हाइट हाउस में 18 जून 2025 को एक बंद कमरे में बैठक हुई थी। ये अमेरिका के इतिहास में पहली बार था जब किसी पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी को इस स्तर पर बिना किसी नागरिक प्रतिनिधि की हैसियत से आमंत्रित किया गया।

पाकिस्तान में तानाशाही शासन को बढ़ावा देने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प पर फंडिंग देने के भी आरोप लगते रहे हैं। और ऐसा America भारत की बढ़ती ताक़त को दबाने के लिए करता है। अमेरिका और पाकिस्तान के बीच ये लेन-देन IMF से पाकिस्तान को निरंतर मिलने वाली फंडिंग में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संभाले हुए है, बावजूद इसके कि पाकिस्तान आतंकवादियों को पनाह देने का काम करता रहा है।

2025 की भयानक बाढ़ में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की सेना के साथ मिलकर राहत सामग्री पहुंचाई। टेंट, पंप, जेनरेटर… सब मिलिटरी फ्लाइट्स से पाकिस्तान पहुँच रहे थे। और फिर, US सेंट्रल कमांड की ओर से पाकिस्तान की सेना की तारीफ होती है कि ये ‘Life-Saving Assistance’ था। जबकि सवाल इस बात पर उठना था कि पाकिस्तान की सरकार की ये हार है जो अपनी ही जनता को  बाढ़ से भी नहीं बचा सकती। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये सहायता असली मदद है, या पाकिस्तानी सेना को और मजबूत करने का एक तरीका?

ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट का विश्लेषण देखिए- ये कहता है कि पाकिस्तानी आर्मी वहां की लोकतांत्रिक तरीकों को भी ख़राब करती है फिर भी अमेरिका उसे “स्थिरता की गारंटी” मानता है। लेकिन क्या लोकतंत्र को कुचलकर, Pak सेना को हरी झंडी देना ही अमेरिका की स्थिरता है?

अमेरिकी अधिकारी नताली बेकर ने भी खुलकर कहा था कि ‘हम आपदा प्रबंधन में पाकिस्तान के साथ पार्टनरशिप बनाए रखेंगे।’ लेकिन ध्यान देने की बात ये है कि ये पार्टनरशिप उस सेना को वैधता देती है, जो पाकिस्तान के आम नागरिकों की जिंदगी  में दखलअंदाजी करती रही है।

अमेरिका हमेशा दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाता रहा है। लेकिन जब बात आती है पाकिस्तान की, तो उसका व्यवहार पूरी तरह उल्टा ही नजर आता है। अब अमेरिकी संसद में साल 2025 में पास किया गया Pakistan Democracy Act देखिए- जिसमें साफ कहा गया कि अमेरिका नागरिक कानूनों और स्वतंत्र चुनाव का समर्थन करता है। यहाँ तक कि इस Act में पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रावधान है, यदि वह नागरिक शासन की बहाली और राजनीतिक बंदियों की रिहाई में सहयोग नहीं करते।

लेकिन असली तस्वीर क्या है? अमल में आने की बात पर तो यही बातें फिजूल साबित हो रही हैं। यानी ये एक्ट क्या है? सिर्फ़ और सिर्फ़ कागज पर लिखी मधुर कथाएँ। लेकिन असल में क्या हो रहा है? चुनावों में गड़बड़ी! पाकिस्तान की सरकार वहाँ के लोकतांत्रिक नेताओं से जेलें भरती जा रही हैं, और अमेरिका? वह चुपचाप देखता रहता है… इमरान खान जैसे लोकतांत्रिक नेता जेलों में, और अमेरिका एकदम मौन बैठा पाकिस्तान के साथ बिजनेस डील कर रहा है। 

शहबाज और पाक आर्मी पर लगातार ये आरोप लगता रहा है कि चुनाव निष्पक्ष नहीं था। आज भी जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को पाकिस्तान का सबसे लोकप्रिय नेता माना जाता है। चुनाव में भी इमरान खान का दबदबा दिखा था। ऐसे में मुनीर और शहबाज चाहते हैं कि इमरान खान जेल में ही रहें।

अमेरिकी कांग्रेस द्वारा पाकिस्तान के भ्रष्ट और धांधली भरे चुनावों की कड़ी जांच हुई। वार्निंग दी गईं कि ग़ैर लोकतांत्रिक तरीके से हुए चुनाव के करण अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते तनावपूर्ण हो सकते हैं। फिर भी अमेरिका का पाक्सितान से सरकार स्तर पर संपर्क लगातार जारी है।

विश्लेषक, हुसैन हक्कानी ने इसे ‘लेन-देन की राजनीति’ बताया है। जहां मानवाधिकार नहीं, सिर्फ सैन्य गठजोड़ को प्राथमिकता दी जाती है।  

और यह सब क्यों? सिर्फ़ और सिर्फ़ रणनीतिक हित के लिए। अमेरिका ये सब करता है क्योंकि यही उसकी चीन को रोकने की चाल है भारत को दबाने की पॉलिसी। चीन को रोकने और दक्षिण एशिया में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान के तानाशाही शासन को झेलता है उसे बढ़ावा भी देता है; यहाँ तक कि आतंकवाद का समर्थन करने के मामले में भी अमेरिका पाकिस्तान की सेना को संरक्षण देता है, ताकि वो भारत के सामने एक barrier बना रहे।

लोकतंत्र की वकालत करने वाले अमेरिका का ये सच है दूसरों के मानवाधिकार हनन पर हल्ला मचाता है, लेकिन पाकिस्तान में लोकतंत्र की हत्या पर आंखें मूंद लेता है।

ये धोखाधड़ी की परंपरा, 1971 के युद्ध के समय से चली आ रही है। जब अमेरिका ने पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया, भारत को सैन्य चेतावनी दी और युद्ध को रोकने के लिए गुप्त रूप से पाकिस्तान को हथियार प्रदान किए और आज, 2025 में भी यही सिलसिला जारी है। क्षेत्रीय तनाव बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन अमेरिकी सहायता जारी है।

कुछ ही समय पहले  जब अमेरिका पाकिस्तान में  मिलिट्री एक्सरसाइज़ कर रहा था, उसी दौरान, एक रात करीब 2 बजे पाकिस्तान एयरफोर्स ने हमला कर दिया। उन्होंने चीन से मिले J-17 लड़ाकू विमानों से 8 laser-guided bombs गिराए। ये हमला खैबर पख्तूनख्वा के तिराह घाटी के एक गाँव पर हुआ। इसमें लगभग 30 लोग मारे गए, जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल थे।

इसके कुछ ही दिन बाद पाकिस्तान के एक नए आतंकी कैंप का खुलासा हुआ। ऑपरेशन सिंदूर के बाद तमाम आतंकी ठिकाने ख़त्म कर दिए गए थे, लेकिन अब अफ़ग़ान बॉर्डर से सटे खैबर पख़्तूनख़्वाह में फिर से ये ठिकाने बनाए जा रहे हैं।

पाकिस्तान आर्मी चीफ़ असीम मुनीर दिन-रात आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तैयब्बा, जैश-ए-मोहम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन को सुरक्षित ठिकाने मुहैया करवा रहे हैं। हाफ़िज़ सईद के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) ने अब इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस (ISKP) यानी ISIS के दक्षिण एशियाई विंग के साथ एक सीक्रेट पैक्ट बनाया है। इस गठबंधन की योजना बलूच लोगों पर हमले करने की है, और आगे चलकर इसका दायरा जम्मू-कश्मीर तक बढ़ाया जा सकता है। बताया जा रहा है कि इस पूरे गठबंधन को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने तैयार और फंड किया है।

सवाल यह है कि जो डेवलपमेंट सामने आ रहे हैं, क्या उसमें अमेरिका ने पाकिस्तान की मदद की है? जब वो जॉइंट एक्सरसाइज और बाढ़ आपदा में मदद की बात कर रहे थे, क्या उसी दौरान ये सहयोग भी हो रहा था? आने वाले दिनों में इन आतंकियों को ट्रेनिंग देकर POK से भारत भेजने की तैयारी है, ताकि किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम दिया जा सके।

ISI और पाकिस्तानी सेना इन समूहों को पूरी तरह पनाह दे रही है। यह वही रणनीति है, जिसका इस्तेमाल 1990 के दशक में भी भारत के ख़िलाफ़ किया गया था। यानी लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर अमेरिका का दोगला रवैया ही सबके सामने आ रहा है।  

और इसका शिकार कौन बनते हैं?  निर्दोष बलोच,निर्दोष पाकिस्तानी, सीमा पर रहने वाले लोग – जिसमें हिंदू भी होते हैं और मुसलमान भी। पाकिस्तान ने आज अमेरिका के सामने जो सरेंडर किया है, उसके ख़िलाफ़ अमेरिका की सड़कों पर वहाँ के ही लोग उतर आए हैं। इसे पाकिस्तान का Gen Z विद्रोह बताया जा रहा है।

हकीकत ये है कि अमेरिकी फौज की पाकिस्तान में मौजूदगी ही आज उस देश की दिशा तय कर रही है। पाकिस्तान इस वक्त पूरी तरह अपने सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के इशारों पर चल रहा है और दुनिया देख रही है कि एक आतंकी देश को अब सबसे बड़ा सहारा वॉशिंगटन से मिल रहा है। यानी इस्लामी आतंक को स्पॉन्सर करने वाला अमेरिका पाकित्सान को चला रहा है। 

मुनीर इन दिनों क्षेत्र में नए समीकरण गढ़ने में जुटे हैं। इस्लामाबाद अब एक साथ अमेरिका और तुर्की, दोनों के साथ गठजोड़ बना रहा है।

इसकी मिसाल साफ़ है, एक ओर मुनीर ने अमेरिका को अरब सागर तक पहुँचाने के लिए गहरे पानी वाले ‘पासनी’ बंदरगाह की पेशकश कर दी है। ये वही इलाका है जो चीन निर्मित ‘ग्वादर’ पोर्ट से महज़ 100 किलोमीटर की दूरी पर है, और भारत द्वारा बनाए गए ईरान के चाबहार पोर्ट के ठीक बीच में पड़ता है। यानी ये बंदरगाह अमेरिका को अरब सागर में दो कॉम्पीटीटर्स- भारत और चीन के बीच एक रणनीतिक ठिकाना दिला सकता है।

दूसरी तरफ़, पाकिस्तान ने अपने पुराने दोस्त तुर्की को खुश करने के लिए कराची में एक नए औद्योगिक केंद्र के लिए 1000 एकड़ ज़मीन देने की बात कही है। अमेरिका को और खुश करने के लिए, पाकिस्तान ने अब फ़िलिस्तीन पर अपना पुराना ‘सैद्धांतिक रुख’ छोड़ते हुए ‘अब्राहम समझौते’  में शामिल होने का इशारा भी दिया है, ये वही समझौता है, जो इज़रायल को औपचारिक मान्यता देता है।

इसी क्रम में, पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ भी रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि रियाद और इस्लामाबाद, दोनों इस संवेदनशील मुद्दे पर एकमत रहें और सऊदी शाही परिवार को किसी विपरीत प्रतिक्रिया से बचाया जा सके।

शरीफ़ सरकार पर आरोप है कि वो फ़िलिस्तीनी हितों की कीमत पर अमेरिकियों को खुश करने की कोशिश कर रही है।

एक्सपर्ट मानते हैं कि पाकिस्तान के पास बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में दुर्लभ खनिजों का बड़ा भंडार है और यही इलाक़े आज सबसे ज्यादा अशांत हैं। मुनीर कुछ ही दिन पहले इन खनिजों के सैंपल लेकर अमेरिका पहुँचे थे। उन्होंने शरीफ़ की मौजूदगी में ट्रंप और अमेरिकी अधिकारियों को ये सैंपल दिखाए।इस पर अब्दुल गफ्फार खान के परपोते Senator Aimal Wali Khan ने ये तक कह दिया कि “मुनीर एक सेल्समैन थे, और शरीफ़ ट्रंप के सामने शोरूम के मैनेजर।”

अमेरिका अगर पाकिस्तान में भी लोकतंत्र को बचाने के नाम पर कुछ नई कारस्तानी को जन्म दे रहा हैतो ये ध्यान रखना है कि ये निर्दोष पश्तून या Baloch तो अपना कोई रास्ता देख ही लेंगे, लेकिन दुनिया ये सवाल पूछ रही है कि क्या अमेरिका कभी अपने लोकतांत्रिक डींगों पर अमल करेगा भी? या फिर हमेशा अपने सामरिक स्वार्थ के लिए तानाशाही को बढ़ावा देता रहेगा।

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