विकासवादी राजा पृथु

संस्कृति और स्वयंबोध: राजा पृथु ने प्रकृति के साथ तालमेल से कुछ ऐसे बनाई थी विकास की योजना

Summary
राजा पृथु के समय भी पृथ्वी रहने योग्य नहीं थी लेकिन उन्होंने अपने परिश्रम, विजन, नगर नियोजन की सूझ-बूझ से इस पृथ्वी को रहने योग्य बनाया।

हमारे धार्मिक इतिहास में ऐसे कई सम्राट हुए, जिन्होंने आज के विकास के मानकों से भी ज्यादा भौगोलिक, पारिस्थितिक और संरचनात्मक नजरियों का ध्यान रखते हुए अपने साम्राज्यों का विकास किया। हम आज जिन चुनौतियों का सामना अपने आसपास कर रहे हैं, शायद उस से भी कठिन चुनौतियों का सामना अतीत में हमारे राजाओं ने किया है। राजा पृथु के समय भी पृथ्वी रहने योग्य नहीं थी लेकिन उन्होंने अपने परिश्रम, अपने विजन और अपनी नगर नियोजन की सूझ-बूझ से इस पृथ्वी को रहने योग्य बनाया।

उसके बाद हमारे पूर्वजों ने अयोध्या, द्वारका और इंद्रप्रस्थ जैसी सुंदर नगरों की भी स्थापना की। गंगा तक को धरती पर लाकर, भविष्य की पीढ़ियों के कंठ को न केवल तृप्त करने का पुण्य कमाया, अपितु कृषि के लिए ज़मीन को भी ज़्यादा उपजाऊ बनाया। तो आख़िर विकास की ये तमाम गाथाएँ केवल दंत-कथाएँ बनकर क्यों रह गईं? 

दिनकर ने कहा था कि रोटी के बाद मनुष्य की सबसे जरूरी चीज उसकी संस्कृति होती है। यदि मनुष्य अपनी संस्कृति से विमुख हो जाए, तो उसके पास स्वयंबोध नहीं रह जाता।

एक राष्ट्र के रूप में भारत के साथ यही करने का प्रयत्न हजारों वर्षों से होता आया है। पहले तो इस्लामी आक्रमणकारियों ने, फिर अंग्रेजों ने, और उसके बाद मैकाले प्रेरित वाम शैक्षणिक विचारधारा ने हमारी पीढ़ियों को इतना कुंठित कर दिया कि हम खुद ही अपने गौरवशाली अतीत से अपना पीछा छुड़ाते चले गए।

हमें शत्रुओं का तो भान था कि हमारे कौन शत्रु हैं, हम उनसे लड़े भी। हम अशांति, अराजकता और आतंकवाद के विरुद्ध लड़ते आए, लेकिन उनकी समाप्ति के बाद हम शांति की स्थापना के लिए नैतिक मापदंडों को लागू नहीं कर पाए। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे पूछेंगी कि हमने जिन चीज़ों को नाकारा, उनके बदले में क्या अपनाया, और हम जवाब नहीं दे पाएँगे, क्योंकि हमें स्वयं का बोध ही नहीं रहा।

ठीक यही स्थिति समुद्र के सामने खड़े पवनपुत्र हनुमान की भी थी। उनको भी उस समय शत्रुबोध तो था कि उन्हें लंका पार करनी है, लेकिन उनको स्वयंबोध नहीं था। उनको अपने अतीत, अपने बल और अपने सामर्थ्य का भान नहीं था। उस समय जामवंत जी ने उनको, उनकी शक्तियों का भान कराते हुए यह कहा था: 

कवन सो काज कठिन जग माहीं।
जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥

हम जामवंत होने का तो दावा नहीं करते लेकिन कम से कम हम एक गिलहरी प्रयास इस मामले में अवश्य कर सकते हैं कि हम हिंदू समाज को स्वयंबोध कराएँ। 

हम अपने वेद, पुराण, रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों के माध्यम से धर्म ध्यानम के इस प्लेटफार्म पर उन तमाम राजवंशों, उन तमाम राजाओं, इतिहास के उन तमाम अनछुए और रसप्रद पहलुओं से, सुपरहीरोज जैसे पूर्वज, जिनके जेनेटिक्स हम तक पहुँचे हैं, उनके बारे में आपको अवगत कराएँ, जिससे आपको यह भान हो सके कि आपका और हमारा अतीत कितना गौरवशाली और स्वर्णिम रहा है। 

इन सारी व्याख्याओं के बीच हम धर्म की डोरी पकड़े रहेंगे, क्योंकि यह धर्म ही है जो अतीत के उन राजवंशों को और वर्तमान में हम सबको एक धागे में पिरोता है।

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