भारत के विभाजन को 78 साल गुज़र चुके हैं और आज पाकिस्तान का जन्मदिन भी है। ‘अमन की आशा’ वाले लोग शायद इसे शुभकामनाएँ देंगे, लेकिन हम आपको वो पाँच बातें बताएँगे जो आपको याद रखनी हैं। ये इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनका ध्यान रखकर ही हम भविष्य में भारत के किसी और विभाजन को रोक सकते हैं।
सबसे पहले है ‘टू-नेशन थ्योरी’ का गणित। टू-नेशन थ्योरी मोहम्मद अली जिन्ना की उपज नहीं थी, बल्कि इसकी जड़ें इस्लामी विचारधारा में हैं। साल 1876 में सैयद अहमद ख़ान ने कहा था कि हिंदू और मुसलमान एक क़ौम नहीं बन सकते। इससे भी 18 साल पहले, 1854 में कार्ल मार्क्स ने लिखा था कि इस्लाम दुनिया को ‘ईमान वालों’ और ‘काफ़िरों’ में बाँटता है, और यही विचारधारा काफ़िर को दुश्मन मानती है। यानी यह मुस्लिम और नॉन-मुस्लिम का बँटवारा एक ऐसी वैचारिक सच्चाई है, जो तब भी जीवित थी और आज भी है।
दूसरी सीख है कि ‘डरा हुआ मुसलमान’ ही अगला पाकिस्तान बनाता है। भारत का सेक्युलरिज्म कहता है कि यहाँ बहुसंख्यक समाज में रहकर भी अल्पसंख्यक समुदाय ख़ुद को डरा हुआ बताता है। भारत में रहकर ये लोग ‘विक्टिमहुड’ (पीड़ित होने का बोध) का इस्तेमाल करते हैं। ये ख़ुद को डरा हुआ टीचर, डरा हुआ डॉक्टर या डरा हुआ मज़दूर बताते हैं। यह सोच इतनी प्रभावी हो जाती है कि हमें आसानी से इस समुदाय के पीछे छोटे-छोटे पाकिस्तान नज़र आने लगते हैं। पाकिस्तान सिर्फ़ कागज़ों पर हुआ एक विभाजन नहीं था, बल्कि वह आज भी हमारे शहरों में, बस्तियों में और गाँवों में मौजूद है, जो लगातार ख़ुद को डरा हुआ साबित करने में लगा है।
तीसरी सीख है कि हिंदू की एक-एक लाश नए पाकिस्तान के निर्माण की ईंट है। कमलेश तिवारी या कन्हैया लाल जैसी हत्याएँ अक्सर कानून-व्यवस्था के शोर में दब जाती हैं, लेकिन ये पाकिस्तान बनने की प्रक्रिया का एक संकेत हैं। उसी इस्लामी सोच का संकेत, जो ग़ैर-मुसलमानों को अपना दुश्मन मानती है। न्यायव्यवस्था में ढील इस बात की चेतावनी है कि नोआखली का दंगा ज़्यादा दूर नहीं है; मालाबार और डायरेक्ट एक्शन डे जैसे दिन भी इतिहास के पन्नों तक सीमित नहीं हैं, जहाँ हिंदुओं का नरसंहार किया गया था। ‘दारुल इस्लाम’ का विचार भी बहुत दूर नहीं है, जो दुनिया के नक्शे पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। आम जनता को यह कहकर उलझा दिया जाता है कि यह केवल राजनीति है, लेकिन सीख यही है कि हिंदुओं की सुरक्षा का भार हिंदुओं को स्वयं उठाना होगा।
चौथी सीख है—आज का मुस्लिम इलाका, यानी कल का नया पाकिस्तान। आपके घर के आस-पास भी झुग्गियाँ, बस्तियाँ या इलाके होंगे, जो अब धीरे-धीरे मिनी पाकिस्तान में तब्दील हो रहे हैं। जहाँ आबादी उनकी है, मोहल्ला उनका है, वहां आपके मंदिर के पास मस्जिद का विस्तार हो जाता है। वे पहले आपसे जगह माँगते हैं, फिर पैर पसारते हैं और धीरे-धीरे पूरे इलाके पर कब्ज़ा कर लेते हैं। उनकी भावनाएँ आहत न हों, इसके लिए वे पूरे सिस्टम पर पसर जाते हैं। आप भी अक्सर यह सवाल पूछने पर मजबूर हो जाते होंगे कि राम नवमी पर हिंदुओं को मुस्लिम इलाकों से झाँकी क्यों नहीं निकालने दी जाती? या कांवड़ यात्रा उन रास्तों से क्यों नहीं जा सकती? हकीकत यह है कि जहाँ मुस्लिम आबादी अधिक होती है, वहां दूसरों की धार्मिक आज़ादी कम होने लगती है। यहाँ तक कि पाकिस्तान की जीत पर भारत के हर शहर के गली-मोहल्लों में जो जश्न मनता है, वह सिर्फ मुस्लिम इलाकों तक सीमित नहीं रहता।
आख़िरी सीख यह है कि पाकिस्तान से पहले ‘ख़िलाफ़त’ आता है। जैसे गुलाम भारत में वह ख़िलाफ़त आंदोलन पाकिस्तान की शुरुआत बना था, वैसे ही आज भारत में CAA के विरोध के दौरान जामिया की दीवारों पर ‘ख़िलाफ़त 2.0’ के नारे देखने को मिले। ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे स्लोगन्स और ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद-पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के नारे एक और पाकिस्तान बनने से पहले की आहट जैसे हैं। यह सीख हमारे लिए है कि इस्लाम ने दुनिया को जो दो गुटों में बाँटा है, उनका यह बँटवारा हर जगह काफ़िरों के ख़िलाफ़ संघर्ष या अलग राज्य की माँग करता है। भारत में भी इस्लामी सोच के इसी प्रभाव से छोटे-छोटे पाकिस्तान पनप रहे हैं। साल 1946 की हिंसा हो या पहलगाम का हमला, मक़सद एक ही था—काफ़िरों को नीचा दिखाना, उन्हें हराना और उन पर राज करना।





