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सेमीकंडक्टर से भी कठिन काम है ईंट-सीमेंट जोड़ना? पीएम मोदी ने 12 साल में ये कैसे किया?

Summary
ये वही अमेठी थी जिस पर बीते लगभग 3 दशक से गांधी परिवार या उसके विश्वस्तों का कब्जा था। यहाँ एक दलित बहुल गांव में एक कच्ची झोपड़ी की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल ने मिलीबैंड से कहा था, देखो ये है रियल इंडिया।

साल 1998 में तब एप्पल के CEO रहे स्टीव जॉब्स ने बिजनेसवीक मैगजीन से एक इंटरव्यू में एक लाइन कही थी। ये लाइन थी simple can be harder than complex. यानी जो काम दिखने में जितना आसान दिखाई पड़ता है, उसको करने के लिए कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है। 

अब इस बात को याद रखिए और मेरे एक सवाल पर 10 सेकंड सोचिए। आप अगर ट्विटर चलाते हैं, रेगुलर मीडिया और यहाँ तक कि अंग्रेजी अख़बार भी पढ़ते हैं तो आपको सबसे ज्यादा चर्चा किस बात पर दिखाई देती है? 

आज के समय में सेमीकंडक्टर कैसे बनाए जाएँ, भारत जेट इंजन में कैसे आत्मनिर्भर हो, हम स्मॉल न्यूक्लियर रिएक्टर्स में कैसे आगे बढ़ जाएँ, इन सब बातों पर फैंसी आर्टिकल्स लिखे जाते हैं, वेबिनार होते हैं, बड़े बड़े टेक एक्सपर्ट्स, पालिसी एक्सपर्ट्स से लेकर ख़ुद को बुद्धिजीवी समझने वाला हर आदमी बात करता है। 

लेकिन इन सबसे 1000 गुना सरल काम क्या है, ईंट और सीमेंट जोड़ कर एक मकान बनाना! आपने कभी इस पर चर्चा सुनी है? क्या आपने कभी दिल्ली के किसी आलीशान होटल में हुई किसी बैठक में इस बात पर चर्चा सुनी है कि देश में कुछ सालों पहले तक जो करोड़ों लोग कच्चे मकानों में रहा करते थे, वो अब किस हाल में हैं, आख़िर कैसे एक योजना ने 12 वर्षों में ही उनके लिए वो काम किया है, जिसे पूरा करने में उन्हें ख़ुद शायद पीढ़ियाँ लग जातीं! 

मैं आपको इस बदलाव की कहानी, इससे जुड़े आँकड़ों और तथ्यों के जंगल में ले चलूँ, इससे पहले मैं आपको दो तस्वीरें दिखाना चाहता हूँ। पहली तस्वीर साल 2009 की है, तब कांग्रेस के तख़्त ए ताऊस के लिए तैयार किए जा रहे राहुल गाँधी भारत में ब्रिटिश हाई कमिश्नर डेविड मिलीबैंड को अपने संसदीय क्षेत्र अमेठी ले कर गए थे। 

ये वही अमेठी थी जिस पर बीते लगभग 3 दशक से गांधी परिवार या उसके विश्वस्तों का कब्जा था। यहाँ एक दलित बहुल गांव में एक कच्ची झोपड़ी की तरफ़ इशारा करते हुए राहुल ने मिलीबैंड से कहा था, देखो ये है रियल इंडिया। अब मैं इसकी कोई आलोचना तो नहीं करूँगा लेकिन एक और तस्वीर दिखाऊँगा। 

ये तस्वीर साल 1984 की है जब राहुल गांधी के पिता राजीव गांधी और उनकी पत्नी सोनिया गांधी अमेठी के दौरे पर गए हुए थे। यहाँ राजीव गांधी कच्चे मकानों के बीच चल रहे हैं और एक कच्ची झोपड़ी में झाँक रहे हैं। 

यानी पिता पुत्र की तस्वीरों के आगे से समय की बाधा हटा दी जाए तो कोई बता नहीं सकता था कि ये दोनों घटनाएँ लगभग ढाई दशक के अंतराल पर हुई हैं और राहुल का रियल इंडिया तनिक भी बदला है। और किसी जगह पर हुए बदलाव को पहचानने का सबसे पहला मीट्रिक क्या होता है? 

ये होता है सराउंडिंग्स, यानी आपके आसपास का माहौल। भारत के गांवों और शहरों में ये सराउडनिंग्स हैं मकान। वही मकान जो फ़िल्मों के टाइटल्स, कोर्ट के मुकदमों और आम आदमी के सपनों में एक कॉमन चीज है। और अब मैं आपको इन्हीं मकानों की कहानी बताता हूँ! 

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने थे तब भारत के गांवों की और यहाँ तक कि छोटे शहरों और क़स्बों की इमेज में एक चीज डिफ़ॉल्ट होती थी, ये थी झोपड़ी पड़े मिट्टी से बने कच्चे मकान। वैसे ही मकान जिन्हें राहुल गांधी रियल इंडिया मानते थे। 

साल 2011 में कांग्रेस सरकार ने जातीय और आर्थिक जनगणना करवाई थी। इस जनगणना ने बताया था कि देश के गांवों में लगभग 7.9 करोड़ घर ऐसे थे जो कच्चे या अधकच्चे थे, यानी कहीं पूरा घर मिट्टी का बना था तो कहीं छत या दीवाल कच्ची थी। 

इनमें से 5.4 करोड़ घर पूरी तरह से कच्चे थे। इसी सर्वे में देश के गांवों में घरों का टोटल नंबर 17.9 करोड़ बताया गया था। इस हिसाब से साल 2011 में देश के लगभग 44% से ज्यादा ग्रामीण घर कच्चे थे, ये तब था जब देश की आजादी को 60 साल हो चुके थे, नेहरू, इंदिरा, राजीव, मनमोहन… सबके कार्यकाल ये देश देख चुका था। 

और जिस रियल इंडिया की बात राहुल गाँधी करते थे वी सिर्फ़ गांवों तक ही सीमित नहीं था। बल्कि शहरों की हालत भी कोई बहुत अच्छी नहीं थी। यही SECC बताता है कि कम से कम 79 लाख घर ऐसे थे जो मिट्टी, घास या फिर लकड़ी और पॉलीथिन से बने हुए थे, जिन्हें हम आम भाषा में झुग्गी झोपड़ी कहते हैं। 

ऐसे घरों का नंबर भी तब देश के शहरी घरों का लगभग 13% था। शहरों के बाहरी मुहल्लों, रेल की पटरियों और सड़क के किनारे आपको तब इस रियल इंडिया के तुरंत दर्शन हो जाते थे और इसके आगे तो श्रीलाल शुक्ल की राग दरबारी के अनुसार भारतीय देहात का महासागर था ही, जहाँ की पहचान ही ये कच्चे घर थे। 

यानी साल 2011 तक राहुल के रियल इंडिया के विजन में अभी तक देश के हर बाशिंदे के हक में एक पक्का मकान नहीं आया था और क्या गाँव का रामसरन और क्या शहर का सुरेश, दोनों के हिस्से में मिट्टी और पॉलीथिन के कुछ टुकड़े थे, जिन्हें आपस में जोड़ने पर द्वितीय विश्व युद्ध के कच्चे बंकर की तरह कुछ बनता था, जिसे घर कहा गया था। 

लेकिन जिस अवध से मैं आता हूँ, वहाँ एक कहावत है कि 100 साल में घूरे यानी जहाँ गोबर डाला जाता है उसके भी दिन बदल जाते हैं। अब ये तो लोगों के आशियाने थे, उन लोगों के जो हम भारत के लोग वाली प्रस्तावना के हिस्से हैं। इनका जीवन बदलने की बारी भी साल 2015 तक ही आ गई।  

साल 2015 के 25 जून को जब नई दिल्ली में चिलचिलाती गर्मी पड़ रही थी तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विज्ञान भवन से एक योजना का ऐलान किया। योजना का नाम रखा गया प्रधानमंत्री आवास योजना – शहरी। इसका लक्ष्य था कि देश के शहरों से पहले झुग्गी झोपड़ी को हटाया जाए, कच्चे मकानों को पक्के मकानों में बदला जाए। 

जो लोग अपना मकान बनाने में सक्षम नहीं है उनको अपना मकान बनाने में सहायता दी जाए ताकि देश की छवि सुधर सके और स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फ़िल्म बनाने वालों को किसी और जगह का रूख करना पड़े। इस योजना में सरकार ने बेहद साफ़ और सीधा लक्ष्य रखा था कि आप जितना मकान बनाते जाओगे, उतना पैसा हम देते जाएँगे। 

शहरी इलाक़ों में सरकार ने ₹2.5 लाख रुपए देने का वादा किया। इसमें केंद्र और राज्य दोनों की भागीदारी होनी थी। याद रखिए जब सरकार घर बनाने के लिए ₹2.5 लाख देने जा रही थी तब देश की प्रति व्यक्ति आय मात्र ₹94000 थी। यानी मोदी सरकार ने हर आदमी को लगभग ढाई साल का पैसा की कमाई का पैसा देने का बीड़ा उठाया था।   

ये इसलिए भी था क्योंकि अगर मोदी सरकार ये पैसा घर बनाने के लिए नहीं देती तो ये करोड़ों लोग घर बना ही नहीं पाते। सालों साल एक दीवाल के लिए पैसा बचाया जा रहा होता। शहरों में मकानों के साथ ही मोदी सरकार ने गांवों के लिए एक अलग योजना शुरू की क्योंकि रियल इंडिया को बदलना भी जरूरी था। 

प्रधानमंत्री आवास योजना का ग्रामीण वर्जन 20 नवम्बर 2016 को लांच हुआ था। और इन दोनों योजनाओं ने मिल कर वो कर दिखाया है जो शायद दुनिया के और किसी देश ने इतने बड़े स्केल पर नहीं किया है। इन दोनों योजनाओं के तहत 11 वर्षों में देश में 4.05 करोड़ घर बनाए जा चुके हैं। 

और इनमें बड़ा नंबर उन घरों का है जो लोगो को उनकी ज़मीन पर ही मिले हैं। आपको अगर सुनने में ये नंबर छोटा लगता हो तो मैं बता दूँ कि अगर इन घरों को एक साथ कहीं पर बनाया जाए तो ये अमेरिका, चीन और भारत के बाद दुनिया का चौथा सबसे ज्यादा घरों वाला देश बनाएँगे। 

और आपको पता है कि मोदी सरकार ने घरों को बनाने के लिए अब तक कितना खर्च किया है,  इस काम पर अब तक लगभग ₹4.2 लाख करोड़ से ज्यादा केंद्र सरकार के हिस्से से खर्च हो चुका है। आपको ये जान कर हैरानी होगी कि ये रकम इतनी बड़ी है जितना हमारे पड़ोसी देश श्री लंका का पूरे एक साल का बजट है। 

और घर बनाने की कहानी अभी तक रुकी नहीं है, बल्कि अभी देश के गांवों में लगभग 27 लाख एडिशनल घरों के निर्माण को मंज़ूरी केंद्र सरकार दे चुकी है और गांवों में ये 84 लाख घर और बनने हैं। राहुल का जो रियल इंडिया कच्चे घरों वाली झोपड़ी में दिखता था वो अब कुछ ऐसा दिखता है। 

इस नए वाले रियल इंडिया में अब कच्ची झोपड़ी के सामने खड़ा हड्डियों का कोई ढाँचा नहीं होता है, जिससे राहुल गांधी और उनका लिबरल गैंग पुअर इंडिया के अपने टूरिज्म के उद्देश्य पूरे कर सकें बल्कि अब जो तस्वीरें हैं उनमें सशक्त लोग अपने पक्के घरों के सामने खड़े होते हैं। ख़ुशी ख़ुशी फोटो खिंचवाते हैं। 

और आप ये बात भी याद रखिए कि ये 4 करोड़ से ज्यादा घर कोई सदियों में नहीं बल्कि एक दशक में बने हैं, इनके लिए भेजा गया पैसा सीधे DBT मॉडल से उन लोगों के हाथ में पहुँचा है जिन्हें घर बनाना था। लेकिन सवाल उठता है कि अगर मोदी सरकार सिर्फ़ 11 वर्षों में 4 करोड़ से ज्यादा घर बना सकती है तो आख़िर पहले कभी ऐसा क्यों नहीं हुआ? 

इसका भी जवाब है मेरे पास! ऐसा नहीं है कि पहले प्रयास नहीं हुआ। लेकिन पहले के प्रयास ज्यादतार कॉस्मेटिक और आधे अधूरे मन से धीमी स्पीड में किए गए। पीएम आवास योजना से पहले साल 1980 के दशक से ही केंद्र सरकार एक योजना चला रही थी, जिसके अंतर्गत देश के गांवों में घर बनाए जाने थे। 

इसका नाम था इंदिरा आवास योजना। इंदिरा आवास योजना को पहले 1985 के दशक में रोजगार देने के उद्देश्य से और फिर 1996 में एक अलग स्कीम के रूप में चलाया गया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया था कि इस योजना के तहत 29 सालों में 3.25 करोड़ घर बनाए गए थे। 

यानी जहाँ 3 दशक में 3 करोड़ घर इंदिरा आवास योजना में बने तो वहीं मात्र 11 वर्षों में पीएम आवास योजना में घरों का नंबर 4 करोड़ से ऊपर पहुँच चुका है और जल्द ही ये आँकड़ा 5 करोड़ हो जाएगा। ऐसा इसलिए होगा क्योंकि स्कीम प्रधानमंत्री आवास योजना सिर्फ़ दिखावे के लिए नहीं चलाई गई। 

इंदिरा आवास योजना क्यों फेल हुई, इसकी बानगी साल 2014 की एक CAG रिपोर्ट बताती है। एक घर बनाने के लिए सबसे जरूरी कॉम्पोनेंट होता है पैसा और कांग्रेस सरकार इस योजना के अंतर्गत इतना कम पैसा दे रही थी कि इस अमाउंट में कोई घर बन ही नहीं सकता। 

साल 2012 तक इंदिरा आवास योजना में घर बनाने के लिए लोगों को मात्र ₹45000 दिए जाते थे। सोचिए, जिन वर्षों में देश में मुद्रास्फीति 10% पार कर रही थी, तब इस अमाउंट में क्या होता। 

और यही नहीं बल्कि साल 2013 में जब इस धनराशि को बढ़ाने की बात आई तो UPA सरकार के मंत्री आपस में ही लड़ गए, जयराम रमेश ने जहाँ पैसे बढ़ाने की बात की तो वित्त मंत्री पी चिदंबरम इसमें काटपीट की बात पर अड़े रहे। साल 2013 में जब UPA सरकार ने ये पैसा बढ़ाया लेकिन ₹70 हज़ार पर जाकर अटक गए। 

इतने पैसों में पूरी एक घर की यूनिट तैयार करना मुश्किल काम था। लेकिन इस योजना पर सिर्फ़ कम फंडिंग का ही दीमक नहीं लगा था बल्कि यहाँ फंड मिलने के बाद भी समस्याएँ कम नहीं थीं। CAG की साल 2014 की एक रिपोर्ट ने बताया था। CAG को अपनी जाँच में पता चला कि महाराष्ट्र में तो एक नाबालिग के नाम पर इंदिरा आवास योजना का मकान अलॉट कर दिया गया था। 

यही नहीं बल्कि गोवा में एक ही घर के सामने दो लोगों ने फोटो खिंचवाई और पैसा ले लिया था। कर्नाटक में पैसा उनको मिला था जो इसके हकदार ही नहीं थे और झारखंड में जिन घरों को पूरा बता कर पैसा ले लिया गया था वो असल में अभी दीवाल के ढांचे से ज्यादा कुछ नहीं थे।

और तो और जो घर बन भी गए थे, उनकी हालत भी बदतर थी और उनमें क्वालिटी का ध्यान नहीं रखा गया था। कहीं पैसा खर्च नहीं हुआ था तो कहीं गड़बड़ी से खर्च किया गया था। यहाँ तक कि लोगों को पक्के मकान देने के नाम पर योजना चलाई जाने के बाद भी इसके अंतर्गत कच्चे मकान ही बन रहे थे। 

यानी कुल मिलाकर ये योजना एक तरह से डिजास्टर ही थी। ऐसे में जब साल 2016 में पीएम मोदी ने आवास योजना ग्रामीण लांच की थी तो ये सभी समस्याएँ उन्होंने पहले ही ख़त्म कर दी थी, गांवों में भी घर बनाने के लिए मोदी सरकार ने साल 2016 से ही ₹1.20 लाख रुपए देती आई है। यही कारण रहा कि जहाँ इंदिरा आवास योजना में 314 दिनों में एक घर बनता था, वो वहीं पीएम आवास योजना में ये नंबर घट कर 114 दिन हो गया। 

मैंने आपको वीडियो के शुरुआत में स्टीव जॉब्स के हवाले से बताया था कि सिंपल इस काम्प्लेक्स यानी सरल काम सबसे कठिन होता है। मोदी सरकार ने इस आवास योजना के ज़रिए वही काम किया है। सेमीकंडक्टर और जेट इंजन शायद सही फंडिंग और सही टैलेंट को एक जगह पर इकट्ठा करके बनाए जा सकते हों, लेकिन देश के हर आदमी के सिर पर छत इससे भी बड़ा टास्क था। 

और इस टास्क में मोदी सरकार सफल रही है, उसने राहुल की तरह झोपड़ी वाला रियल इंडिया दुनिया को नहीं दिखाया बल्कि रियल इंडिया की तस्वीर बदली है। आज अगर आप गांवों में जाएँगे तो चारों तरफ़ कच्चे घर नहीं बल्कि पक्के मकान दिखेंगे, धूप बारिश के समय कोना पाकर सिकुड़ते बच्चे नहीं बल्कि आराम से आँगन में खेलते हुए बच्चे दिखेंगे। 

ये काम भले कूल ना हो, लेकिन जरूरी था और जो जरूरी था, उसे मोदी सरकार ने किया है। 

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