india navigate middle east crisis

समझौते की ओर बढ़ा ईरान-अमेरिका: मिडिल ईस्ट संकट को भारत ने कैसे सफलतापूर्वक नेविगेट किया?

Summary
कैसे भारत ने ऊर्जा आपूर्ति, पेट्रोल-डीजल और LPG की उपलब्धता बनाए रखी, कूटनीतिक संतुलन साधा और आम नागरिकों को बड़े आर्थिक झटके से बचाया।

मिडिल ईस्ट में जारी वॉर के अब खत्म होने के आसार दिख रहे हैं। अमेरिका और ईरान ने ये कह दिया है कि दोनों देश इस युद्ध को समाप्त करने के लिए एक शुरुआती समझौते पर पहुंच गए हैं जिसकी औपचारिक पुष्टि 19 जून को हो सकती है।

अब अगर ऐसा ही होता है तो भारत के लिए ये बड़ी उपलब्धि होगी उसने इस क्राइसिस को अपेक्षाकृत आसानी से नेविगेट कर दिया। कैसे आइए समझते हैं।

भारत में 14.2 kg के घरेलू LPG सिलेंडर की कीमत लगभग 942 रुपये है।  विभिन्न देशों में LPG की कीमतें इससे अधिक बताई जाती हैं, हालांकि देशों के बीच तुलना करते समय सिलेंडर के आकार, सब्सिडी व्यवस्था और स्थानीय बाजार की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। फिर भी यह तथ्य है कि संघर्ष के दौरान भारत में घरेलू LPG की उपलब्धता बनी रही और व्यापक आपूर्ति संकट देखने को नहीं मिला। इसमें आप ये भी ध्यान रखिए कि भारत में लगभग 33 करोड़ घरेलू गैस कनेक्शन हैं और हमारे पड़ोसी देश इसके आस-पास भी नहीं है फिर भी अपने यहां सप्लाई बाधित नहीं हुई है।

इस साल फरवरी में इजरायल और अमेरिका ने मिलकर जब ईरान पर हमला किया तो उसका असर हमारी जेब पर कैसे पड़ा उसका ये एक एग्जामपल मैंने आपको बताया और इसमें सबसे जरूरी बात कि अन्य देशों के नागरिकों के मुकाबले भारत के आम आदमी के जेब पर सबसे कम असर पड़ा है।

इसी तरह पेट्रोल और डीजल के प्राइसेस को लेकर भी कुछ-कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिलती है। इस टेबल में आप देखो, दिल्ली में पेट्रोल और डीजल का प्राइज है, 102 और 95 रुपये। अब इसी को कंपेयर करके देखो, हमारे पड़ोसी देशों की राजधानियों से। इस्लामाबाद, ढाका, काठमांडू और कोलंबो। कितना ज्यादा अंतर है। संकट के दौरान भारत में ऊर्जा आपूर्ति और ईंधन उपलब्धता अपेक्षाकृत स्थिर रही, जबकि कई देशों में कीमतों और सप्लाई को लेकर अधिक दबाव देखने को मिला।

अब मेरे मन  में जो सवाल उठ रहा था कि अपने यहां क्यों नहीं कोई हंगामा या पैनिक देखने को मिला? उसका जवाब यही है कि इस पैनिक को सरकार ने होने ही नहीं दिया, उसे बेहतर तरीके से मैनेज किया गया, आम आदमी के जेब पर एक दम से और बहुत ज्यादा जोर नहीं दिया गया। जैसा कि हमनें अपने पड़ोसी देशों के संबंध में देखा। यानी घरेलू लेवल पर चीजों को बेहतर ढंग से मैनेज किया गया है।

भारत में घबराहट न होने का एक कारण यह भी है कि देश के पास लगभग 70-75 दिनों के बराबर कुल तेल भंडार उपलब्ध हैं, रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व मौजूद हैं और भारत अपनी तेल जरूरतों के लिए केवल एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। रूस, इराक, सऊदी अरब, यूएई और अमेरिका समेत कई स्रोतों से आयात होने के कारण सप्लाई शृंखला अपेक्षाकृत सुरक्षित रही।

इसी तरह और डिप्लोमेसी के लेवल पर कहीं पीछे नहीं रहे या हमें कोई बड़ा नुकसान देखने को मिला हो कि हमें या तो ईरान की तरफ होना है या फिर इजरायल-अमेरिका की तरफ… भारत न्यूट्रल रहा और हमेशा ये डॉयलॉग की पैरवी करता रहा। हम वो देश हैं जिसने युद्ध के बीच ईरान और अमेरिका के उप विदेश मंत्री को रायसिना डॉयलॉग में आमंत्रित किया। यानी हमारे अपने हित कहीं से भी कॉम्परोमाइज की हालत में नहीं दिखे। 

हां, इस युद्ध के दीर्घकालिक दुष्परिणाम हो सकते हैं और वो इसलिए हैं क्योंकि हम चाहें या ना चाहें लेकिन इससे अछूते नहीं रह सकते हैं लेकिन हम खुद को कितना बचा सकते हैं, सवाल ये है इसका जवाब मैंने आंकड़ों के साथ बताया कि हम फिर भी बेहतर स्थिति में हैं। 

Editorial team:
Production team:

More videos with Jayesh Matiyal as Anchor/Reporter